
अचानक दिल का बेहिसाब तेज़ धड़कना या सीने में फड़फड़ाहट महसूस होना... क्या यह महज़ घबराहट है या किसी बड़ी बीमारी का संकेत है?
अगर आपकी धड़कन कभी अचानक तेज़ और कभी बहुत धीमी हो जाती है, तो इसका एक बड़ा कारण एट्रियल फ़िब्रिलेशन (AFib) हो सकता है। यह दिल की अनियमित धड़कन से जुड़ी सबसे आम बीमारी है। AFib में दिल के ऊपरी हिस्से (Atria) ठीक से सिकुड़ने की बजाय कांपने लगते हैं। इससे दिल में खून रुककर थक्का बन सकता है, जो दिमाग तक पहुँचकर स्ट्रोक (लकवा) का रूप ले सकता है।
यानी AFib का असली खतरा सिर्फ धड़कन का अनियंत्रित होना नहीं, बल्कि स्ट्रोक है। अच्छी खबर यह है कि सही समय पर इलाज और डॉक्टरी सलाह से इस खतरे को पूरी तरह टाला जा सकता है।
दिल में चार कक्ष होते हैं: ऊपर दो एट्रिया और नीचे दो वेंट्रिकल। सामान्य स्थिति में दिल का प्राकृतिक "पेसमेकर" (साइनस नोड) एक तय लय में संकेत भेजता है और दिल नियमित रूप से धड़कता है।
AFib में एट्रिया के कई जगहों से तेज बिजली के सिग्नल निकलने लगते हैं। इसके कारण -
AFib के कई प्रकार होते हैं, जिन्हें समझना इलाज की दिशा तय करने में मदद करता है -
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प्रकार |
क्या होता है |
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Paroxysmal (रुक-रुक कर) |
कुछ मिनटों से कुछ दिनों तक रहता है और अपने आप सामान्य हो जाता है। |
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Persistent (लगातार) |
7 दिन से ज्यादा चलता है, अक्सर इलाज की जरूरत पड़ती है। |
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Long-standing persistent |
12 महीने से ज्यादा समय तक बना रहता है। |
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Permanent (स्थायी) |
लय सामान्य करने की कोशिशें रोक दी जाती हैं और धड़कन को नियंत्रित रखने पर ध्यान दिया जाता है। |
अनुमान है कि दुनिया भर में करोड़ों लोग AFib के साथ जी रहे हैं, और उम्र बढ़ने के साथ इसके मामले बढ़ते हैं।
क्या AFib हमेशा तेज धड़कन का कारण बनता है? नहीं। कुछ लोगों में धड़कन तेज होती है, कुछ में सामान्य या हल्की अनियमित, और कुछ में कोई लक्षण ही नहीं दिखता। ऐसे लोगों में यह किसी दूसरी जांच, जैसे ECG या नब्ज देखने के दौरान संयोग से पकड़ में आता है।
आम लक्षण -
ध्यान रखें कि इनमें से कोई भी एक लक्षण अकेले AFib की पुष्टि नहीं करता। एनीमिया, थायरॉइड की समस्या, घबराहट या दिल की दूसरी बीमारियों में भी ऐसा हो सकता है। पक्का पता सिर्फ जांच से चलता है।
AFib के कारण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। कई बार कोई साफ वजह नहीं मिलती। अनियमित दिल की धड़कन के कारण और जोखिम कारक में ये प्रमुख हैं -
क्या उच्च रक्तचाप से एट्रियल फ़िब्रिलेशन का खतरा बढ़ता है? हां। लंबे समय तक बिना नियंत्रण का ब्लड प्रेशर दिल के ऊपरी कक्षों पर दबाव डालता है और उनकी बनावट बदल देता है, जिससे AFib की संभावना बढ़ती है।
चलिए इन दोनों में संबंध को समझते हैं -
अक्सर हमसे पूछा जाता है कि "क्या एट्रियल फ़िब्रिलेशन से हृदय कमजोर हो सकता है?" सरल और साफ शब्दों में कहा जाए तो - हाँ। लंबे समय तक धड़कन अनियंत्रित रहने पर दिल की पंपिंग क्षमता घट सकती है, जिसे Tachycardia-induced Cardiomyopathy कहते हैं। सही समय पर इलाज से इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
डॉक्टर पहले लक्षणों, फैमिली मेडिकल हिस्ट्री और नब्ज की जांच करते हैं। उसके बाद ये टेस्ट कराए जा सकते हैं:
एट्रियल फ़िब्रिलेशन (AFib) का इलाज 3 मुख्य लक्ष्यों पर आधारित है:
1 . स्ट्रोक से बचाव (खून पतला करना):
जोखिम, उम्र, वाल्व व किडनी की स्थिति के अनुसार डॉक्टर खून पतला करने वाली दवाएं (Anticoagulants) देते हैं। इन्हें बिना डॉक्टरी सलाह के शुरू या बंद न करें।
2. धड़कन और लय पर नियंत्रण:
3. बिना ओपन सर्जरी के आधुनिक विकल्प:
4. मूल कारणों व जीवनशैली में सुधार:
नोट: सही इलाज का चयन मरीज की स्थिति के आधार पर कार्डियोलॉजिस्ट या इलेक्ट्रोफिज़ियोलॉजिस्ट (Cardiologist/Electrophysiologist) ही करते हैं।
इन स्थितियों में जल्द जांच कराएं:
तुरंत इमरजेंसी में जाएं अगर इनमें से कोई दिखे:
स्ट्रोक में हर मिनट कीमती होता है, इसलिए इंतजार न करें।
CK Birla Hospital में कार्डियोलॉजी विशेषज्ञ ECG, Holter और Echo जैसी जांचों के साथ AFib के पूरे मूल्यांकन और इलाज की योजना में मदद कर सकते हैं। ऐसी शिकायत होने पर अपॉइंटमेंट लेकर सलाह लेना बेहतर रहता है।
एट्रियल फ़िब्रिलेशन में अनियमित धड़कन अपने आप में जानलेवा नहीं होती, लेकिन इसके साथ बनने वाला थक्का स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा देता है। समय पर जांच, सही दवा और जीवनशैली में सुधार से यह खतरा काफी हद तक घटाया जा सकता है। लक्षण दिखने पर इंतजार करने के बजाय ECG करवाकर विशेषज्ञ की राय लेना सबसे समझदारी भरा कदम है।
नहीं, कुछ लोगों में धड़कन तेज होती है, पर कई में सामान्य या हल्की अनियमित रहती है। कुछ मरीजों में कोई लक्षण नहीं दिखता और यह जांच में पकड़ में आता है।
क्योंकि ऊपरी कक्ष ठीक से सिकुड़ नहीं पाते और खून वहां धीमा पड़ जाता है। रुका हुआ खून, खासकर left atrial appendage में, जमकर थक्का बना सकता है।
AFib में स्ट्रोक का जोखिम सामान्य लोगों से लगभग 5 गुना तक ज्यादा हो सकता है। असली खतरा उम्र और बीमारियों के अनुसार हर व्यक्ति में अलग होता है।
हां, लंबे समय तक अनियंत्रित तेज धड़कन से दिल की पंपिंग क्षमता घट सकती है। समय पर इलाज से कई मामलों में सुधार संभव है।
हां। लंबे समय तक नियंत्रण में न रहने वाला ब्लड प्रेशर दिल के ऊपरी कक्षों पर दबाव डालता है और AFib की संभावना बढ़ाता है।
कई मरीजों में हाँ। दवाओं और जीवनशैली में बदलाव से नियंत्रण संभव है। जरूरत पड़ने पर ablation जैसी नस के रास्ते की प्रक्रिया की जाती है, जो ओपन सर्जरी नहीं है।
ECG सबसे उपयोगी बुनियादी जांच है। अगर AFib कभी-कभी आता है, तो Holter या event recorder से लय लंबे समय तक रिकॉर्ड की जाती है।
यह दवा थक्के बनने का खतरा घटाकर स्ट्रोक से बचाव करती हैं। इसकी जरूरत CHA₂DS₂-VASc जैसे स्कोर और मरीज की स्थिति देखकर डॉक्टर तय करते हैं।
Written and Verified by:

Dr. Anil Mishra is the Director of Cardiology Dept. at BM Birla Heart Hospital, Kolkata. He specializes in complex angioplasties, pacemaker & AICD implantation, CRT-D, TAVI, and was the first in Eastern India to perform rotablation and implant leadless pacemakers.
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