हार्ट ब्लॉकेज का पता कैसे चलता है? जानें CABG कब जरूरी होती है
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हार्ट ब्लॉकेज का पता कैसे चलता है? जानें CABG कब जरूरी होती है

Cardiology | by Dr. Dhiman Kahali on 07/08/2026

Summary

  • हार्ट ब्लॉकेज तब होता है, जब दिल की धमनियों में चर्बी और कोलेस्ट्रॉल जमा होकर खून का बहाव रोकने लगता है।
  • शुरुआती दौर में अक्सर कोई लक्षण नजर नहीं आता, इसलिए इसे "साइलेंट किलर" कहा जाता है।
  • सीने में दर्द, सांस फूलना और थकान जैसे संकेतों को नजरअंदाज न करें।
  • ECG, ECHO, TMT और एंजियोग्राफी से ब्लॉकेज की सही स्थिति पता चलती है
  • जब ब्लॉकेज 70% से ज्यादा हो या कई धमनियां प्रभावित हों, तब डॉक्टर CABG (बायपास सर्जरी) की सलाह देते हैं
  • सही समय पर इलाज और जीवनशैली में बदलाव से मरीज पूरी तरह सामान्य जिंदगी जी सकते हैं

हर साल भारत में हृदय रोग लाखों लोगों की जान ले रहा है, और सबसे चिंता की बात यह है कि अब यह समस्या सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि 30-40 साल के युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि हार्ट ब्लॉकेज का पता कैसे चलता है और किन परिस्थितियों में CABG यानी बायपास सर्जरी ही एकमात्र सुरक्षित रास्ता बचता है।

अगर आप या आपके परिवार में किसी को सीने में दर्द, सांस फूलना या बार-बार थकान जैसे लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है। समय पर सही जांच और सही डॉक्टर की सलाह जिंदगी बचा सकती है। हमारे अनुभवी हृदय रोग विशेषज्ञों से सीके बिरला अस्पताल (BM Birla Hospital) के ओपीडी में अपॉइंटमेंट बुक करें और अपने दिल की सेहत को नजरअंदाज करना आज ही बंद करें।

हार्ट ब्लॉकेज क्या है और यह क्यों होता है?

दिल की मांसपेशियों तक खून पहुंचाने का काम कोरोनरी धमनियां करती हैं। जब इन धमनियों की अंदरूनी दीवारों पर धीरे-धीरे कोलेस्ट्रॉल, चर्बी और कैल्शियम जमा होने लगता है, तो इसे "प्लाक" कहा जाता है। समय के साथ यह प्लाक मोटा होता जाता है और धमनी का रास्ता संकरा कर देता है, जिससे दिल तक खून और ऑक्सीजन कम पहुंचने लगती है। इसी स्थिति को हार्ट ब्लॉकेज या कोरोनरी आर्टरी डिजीज कहा जाता है।

हार्ट ब्लॉकेज कैसे होता है?

यह समझने के लिए इसके पीछे के मुख्य कारणों को जानना जरूरी है - 

  • अनियंत्रित डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर
  • खराब कोलेस्ट्रॉल यानी LDL का बढ़ा हुआ स्तर
  • मोटापा और पेट के आसपास जमा चर्बी
  • धूम्रपान और तंबाकू का सेवन
  • लगातार तनाव और नींद की कमी
  • शारीरिक गतिविधि की कमी और गलत खानपान
  • हृदय रोग की फैमिली मेडिकल हिस्ट्री होना

भारत में शहरी आबादी में मोटापा और पेट की चर्बी की समस्या तेजी से बढ़ी है, और यह हृदय रोग के बढ़ते मामलों की एक बड़ी वजह मानी जा रही है। इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर भी कोरोनरी आर्टरी डिजीज के एक बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार पाया गया है। कोलकाता जैसे बड़े शहरों में बदलती जीवनशैली, अनियमित खानपान और बढ़ता तनाव इस जोखिम को और बढ़ा रहे हैं।

हार्ट ब्लॉकेज का पता कैसे चलता है? लक्षण और जरूरी जांच

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती दौर में हार्ट ब्लॉकेज के लक्षण बेहद हल्के होते हैं या दिखते ही नहीं हैं। यही कारण है कि इसे "साइलेंट किलर" कहा जाता है। फिर भी कुछ संकेत हैं जिन्हें कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए जैसे कि - 

  • सीने में दबाव, जकड़न या भारीपन महसूस होना, खासकर चलने या सीढ़ी चढ़ने पर
  • सांस फूलना, भले ही मामूली मेहनत के बाद हो
  • बिना किसी वजह के अत्यधिक थकान महसूस होना
  • चक्कर आना या पसीना छूटना
  • बांह, गर्दन, जबड़े या पीठ में दर्द फैलना
  • दिल की धड़कन का अनियमित होना

अगर आप सोच रहे हैं कि हार्ट ब्लॉकेज के शुरुआती लक्षण क्या हैं, तो याद रखें कि यह अक्सर हल्की बेचैनी या थकान के रूप में शुरू होता है, जिसे लोग आमतौर पर उम्र या काम के दबाव से जोड़कर टाल देते हैं। यही टालमटोल कई बार भारी पड़ जाती है। खासकर अगर परिवार में पहले से हृदय रोग रहा हो, डायबिटीज हो या उम्र 40 पार कर चुकी हो, तो साल में एक बार दिल की जांच जरूर करानी चाहिए।

हार्ट ब्लॉकेज की पुष्टि के लिए कौन-कौन से टेस्ट किए जाते हैं?

लक्षणों के आधार पर शक होने पर डॉक्टर कुछ खास जांचों की सलाह देते हैं, ताकि ब्लॉकेज की सही स्थिति और गंभीरता का पता चल सके जैसे कि - 

tests for heart blockage examination

  1. ECG (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम): दिल की विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड करता है और असामान्यता का शुरुआती संकेत देता है।
  2. इको कार्डियोग्राफी (ECHO): दिल की मांसपेशियों और वाल्व की कार्यक्षमता को अल्ट्रासाउंड के जरिए दिखाता है।
  3. TMT (ट्रेडमिल टेस्ट): मेहनत के दौरान दिल पर पड़ने वाले असर की जांच करता है।
  4. कोरोनरी एंजियोग्राफी: यह सबसे सटीक जांच मानी जाती है, जिसमें एक पतली नली के जरिए धमनियों की तस्वीर ली जाती है और यह साफ पता चलता है कि कितने प्रतिशत ब्लॉकेज है।
  5. CT एंजियोग्राफी: यह एक ऐसी तकनीक है जिससे गैर-सर्जिकल तरीके से धमनियों की स्थिति जानने में मदद मिलती है।
  6. ब्लड टेस्ट: कोलेस्ट्रॉल, ट्रोपोनिन और शुगर लेवल की जांच से जोखिम का अंदाजा लगाया जाता है।

इन जांचों के जरिए यह भी पता चलता है कि हार्ट ब्लॉकेज खोलने के तरीके क्या हो सकते हैं, यानी क्या दवाइयों से काम चल जाएगा, एंजियोप्लास्टी की जरूरत होगी या फिर बायपास सर्जरी ही एकमात्र सुरक्षित विकल्प है।

CABG (बायपास सर्जरी) क्या है और किन मरीजों के लिए यह जरूरी होती है?

CABG यानी कोरोनरी आर्टरी बायपास ग्राफ्टिंग एक ऐसी सर्जरी है, जिसमें शरीर के किसी दूसरे हिस्से, आमतौर पर पैर, बांह या सीने की धमनी से एक ग्राफ्ट लेकर ब्लॉक हुई धमनी के आसपास एक नया रास्ता बनाया जाता है, ताकि खून का बहाव फिर से सामान्य हो सके। यह सर्जरी खासतौर पर उन मरीजों के लिए सुझाई जाती है जिनमें - 

  • कई कोरोनरी धमनियों में गंभीर ब्लॉकेज हो (मल्टी-वेसल डिजीज)
  • दिल की मुख्य धमनी (लेफ्ट मेन आर्टरी) में ब्लॉकेज हो
  • डायबिटीज के साथ कई धमनियों में रुकावट हो
  • दिल की पंपिंग क्षमता (Ejection Fraction) पहले से कमजोर हो
  • एंजियोप्लास्टी या स्टेंट से सुधार की संभावना कम हो

इसके अतिरिक्त आप अपने डॉक्टर से भी परामर्श ले सकते हैं कि आप इस सर्जरी को करा सकते हैं या नहीं।

CABG के बाद रिकवरी और जीवनशैली में बदलाव

बायपास सर्जरी के बाद पहले कुछ हफ्ते आराम और सावधानी के होते हैं, लेकिन ज्यादातर मरीज 6 से 8 हफ्तों में सामान्य दिनचर्या में लौट आते हैं। रिकवरी को बेहतर बनाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है - 

  • डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाइयां समय पर लें और खुद से बंद न करें
  • हल्की सैर से शुरुआत करें और धीरे-धीरे शारीरिक गतिविधि बढ़ाएं
  • तला-भुना, नमक और चीनी की अधिकता वाला खाना कम करें
  • धूम्रपान और शराब से पूरी तरह दूरी बनाएं
  • नियमित रूप से कार्डियोलॉजिस्ट से फॉलो-अप कराते रहें
  • तनाव प्रबंधन और पर्याप्त नींद को प्राथमिकता दें

सही देखभाल के साथ बायपास सर्जरी करा चुके ज्यादातर मरीज एक सक्रिय और सामान्य जीवन जी पाते हैं। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि सर्जरी के बाद भी अगर जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया, तो नई धमनियों में भी समय के साथ रुकावट बनने का खतरा बना रहता है।

निष्कर्ष

हार्ट ब्लॉकेज धीरे-धीरे बढ़ने वाली एक ऐसी समस्या है, जो अक्सर बिना चेतावनी के गंभीर रूप ले लेती है। लेकिन सही जानकारी, समय पर जांच और सही विशेषज्ञ की सलाह से इसे न सिर्फ पहचाना जा सकता है, बल्कि प्रभावी ढंग से नियंत्रित भी किया जा सकता है। चाहे इलाज दवाइयों से हो, एंजियोप्लास्टी से हो या CABG जैसी सर्जरी से, हर मरीज की स्थिति अलग होती है और इसलिए विशेषज्ञ की सलाह के बिना कोई भी फैसला नहीं लेना चाहिए।

अगर आपको या आपके किसी अपने को सीने में दर्द, सांस फूलना या असामान्य थकान जैसी शिकायत है, तो इंतजार न करें। हमारे अनुभवी कार्डियक सर्जन और हृदय रोग विशेषज्ञों की टीम से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और अपने दिल की पूरी जांच कराएं। समय पर लिया गया एक छोटा कदम, आगे चलकर एक बड़ी जिंदगी बचा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

जी हां, शुरुआती दौर में हार्ट ब्लॉकेज अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ता रहता है। इसलिए 40 की उम्र के बाद और जोखिम वाले लोगों को नियमित हृदय जांच करानी चाहिए, भले ही कोई तकलीफ महसूस न हो।

Written and Verified by:

Dr. Dhiman Kahali

Dr. Dhiman Kahali

Director Exp: 47 Yr

Interventional Cardiology

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Dr. Dhiman Kahali is the Director of Interventional Cardiology Dept. at BM Birla Heart Hospital, Kolkata, with over 37 years of experience. He specializes in angioplasty, mitral balloon dilation, and peripheral vascular interventions, and has been honored with the Gandhi Centenary and Mother Teresa International Awards.

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