
किसी फिल्म में जब कोई मुख्य कलाकार सफेद सूट में सिगरेट पीते हुए गाड़ी से बाहर आता है और बैकग्राउंड में एक तेज बीट वाला गाना बजता है, तो वह बहुत 'कूल' लगता है। लेकिन क्या आप वाकिफ हैं कि पर्दे का यह 'स्वैग' असल जिंदगी में हमारे युवाओं पर क्या असर डाल रहा है?
पहले लोग सिर्फ सिगरेट या बीड़ी पीते थे, लेकिन आजकल की नई जनरेशन वेप (Vape) या ई-सिगरेट को 'सेफ' मानकर तेजी से इसकी ओर शिफ्ट हो रही है। युवाओं को लगता है कि इसमें धुआं नहीं, इसलिए नुकसान नहीं। लेकिन सच कहें तो यह स्थिति बिल्कुल 'आगे कुंआ, पीछे खाई' जैसी है।
हकीकत यह है कि सिगरेट हो या वेप, दोनों ही आदतें आपके दिल की सेहत के लिए एक जैसा भारी बोझ बन सकती हैं, बस इनके नुकसान पहुंचाने का तरीका अलग है। क्या वेपिंग सच में सिगरेट से कम खतरनाक है? अगर आपके या आपके किसी अपने के मन में भी यही उलझन है, तो यह ब्लॉग पूरा पढ़ें। इसमें हम मेडिकल रिसर्च और असल मरीजों के अनुभवों के आधार पर इस उलझन को बिल्कुल साफ करेंगे।
स्मोकिंग यानी पारंपरिक सिगरेट में तंबाकू को जलाया जाता है, जिससे धुआं निकलता है। इस धुएं में 6,000 से ज्यादा केमिकल होते हैं, जिनमें कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैस भी शामिल है, ठीक वही गैस जो गाड़ी के धुएं से निकलती है।
वहीं वेपिंग में तंबाकू जलाया नहीं जाता, बल्कि एक तरल (e-liquid) को गर्म करके भाप के रूप में अंदर लिया जाता है। इसी वजह से लोग मान बैठते हैं कि वेपिंग "सुरक्षित" है। लेकिन हकीकत यह है कि इस भाप में भी निकोटीन, हैवी मेटल्स, फ्लेवरिंग केमिकल्स और कुछ मामलों में सिगरेट से भी ज्यादा मात्रा में निकोटीन मौजूद हो सकता है। कई बार तो लोग "निकोटीन-फ्री" बताए गए वेप में भी निकोटीन पाए जाने की शिकायत करते हैं। दोनों में सबसे बड़ा साझा दुश्मन एक ही है, निकोटीन, जो दिल के लिए बराबर खतरनाक है।
स्मोकिंग और वेपिंग का दिल पर असर लगभग एक जैसा ही होता है, बस रास्ता अलग-अलग है।
स्मोकिंग से हार्ट अटैक का खतरा इसलिए बढ़ता है क्योंकि सिगरेट का धुआं खून की नलियों को सख्त और संकरा बना देता है,ब्लड प्रेशर बढ़ाता है, और खून को गाढ़ा (चिपचिपा) कर देता है जिससे थक्का जमने का खतरा बढ़ जाता है। इससे दिल तक ऑक्सीजन कम पहुंचती है और दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है।
दूसरी तरफ, वेपिंग के नुकसान भी कम नहीं हैं। वेप लेने के तुरंत बाद ही दिल की धड़कन तेज हो जाती है और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, साथ ही खून की नलियां अकड़ने लगती हैं। कुछ शोध (रिसर्च) बताते हैं कि वेपिंग से शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड का स्तर करीब 30% तक घट सकता है। यह वही तत्व है, जो खून की नलियों को आराम देने और रक्त के सही बहाव के लिए जरूरी होता है। यही वजह है कि रोजाना वेप लेने वालों में हार्ट अटैक का खतरा लगभग दोगुना पाया गया है।
इसे खुद समझने के लिए एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट करें: यदि आप वेप करते हैं, तो एक दिन इसका इस्तेमाल न करें। शाम को वेप करने से ठीक पहले अपना बीपी (BP) चेक करें और फिर वेप करने के तुरंत बाद दोबारा चेक करें। आपको अपने आप अंतर समझ आ जाएगा।
निकोटीन और हृदय स्वास्थ्य का रिश्ता सीधा और खतरनाक है। निकोटीन शरीर को "फाइट या फ्लाइट" जैसी स्थिति में डाल देता है, यानी दिल को लगातार अलर्ट मोड में रहना पड़ता है। इससे दिल की धड़कन तेज होती है, ब्लड प्रेशर बढ़ता है और नसें सिकुड़ जाती हैं। समय के साथ यह स्थिति दिल पर स्थायी दबाव डालती है और हृदय रोग की नींव तैयार करती है, चाहे निकोटीन सिगरेट से मिले या वेप से।
यह वह सवाल है, जो हर दूसरा मरीज या उनके परिवार वाले पूछते हैं। इसका सीधा जवाब है - नहीं, वेपिंग बिल्कुल सुरक्षित नहीं है।
यदि कोई व्यक्ति सिगरेट छोड़कर वेपिंग पर शिफ्ट होता है, तो उसे सिगरेट के कुछ हानिकारक तत्वों से भले ही थोड़ी राहत मिले, लेकिन दिल का खतरा खत्म नहीं होता। वहीं, जो लोग कभी स्मोकिंग नहीं करते थे और सिर्फ स्टाइल या स्ट्रेस के लिए वेपिंग शुरू करते हैं, वे अपने दिल को एक नए गंभीर जोखिम में डाल रहे होते हैं।
सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब कोई सिगरेट और वेप दोनों का इस्तेमाल करता है। ऐसे 'ड्यूअल यूजर्स' (Dual Users) में कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा देखा गया है, क्योंकि शरीर को दोनों तरफ से निकोटीन और हानिकारक केमिकल्स की डबल डोज मिलती है।
लंबे समय तक स्मोकिंग या वेपिंग करने वालों में नीचे बताई गई हृदय संबंधी समस्याएं आम पाई जाती हैं:

कोलकाता स्थित हमारे अस्पताल (BMB) में हृदय रोग विभाग में हर महीने ऐसे कई युवा मरीज आते हैं जिनकी उम्र 35-40 वर्ष के बीच होती है, यह अपने आप में चिंता की बात है क्योंकि पहले हार्ट डिजीज को "50 के बाद की बीमारी" माना जाता था। स्मोकिंग और वेपिंग दोनों ही इस उम्र को अब पीछे धकेल रहे हैं।
अच्छी खबर यह है कि दिल बहुत कुछ ठीक कर सकता है, बस उसे मौका चाहिए। धूम्रपान छोड़ने के फायदे लगभग तुरंत दिखने लगते हैं -
वेपिंग छोड़ने पर भी शरीर को निकोटीन और हानिकारक केमिकल्स के लगातार असर से राहत मिलती है, भले ही इस पर लंबे समय का रिसर्च अभी सीमित हो, लेकिन एक बात तय है, कुछ भी न पीना (न सिगरेट, न वेप) दिल के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता है।
बहुत से लोग शुरुआती लक्षणों को थकान या तनाव समझ कर टाल देते हैं। अगर आप या आपके परिवार में कोई स्मोकिंग या वेपिंग करता है, तो इन संकेतों को हल्के में न लें -
ऐसे किसी भी लक्षण पर देरी न करें। समय पर ECG, इको और जरूरी जांच से बहुत बड़ी दिक्कत को शुरुआत में ही पकड़ा जा सकता है। सीके बिरला अस्पताल, कोलकाता (BMB) स्थित हमारे हृदय रोग विभाग में अनुभवी कार्डियोलॉजिस्ट ऐसे मरीजों की पूरी जांच के साथ-साथ धूम्रपान और वेपिंग छोड़ने के लिए व्यक्तिगत गाइडेंस भी देते हैं।
तो आखिर स्मोकिंग या वेपिंग, दिल के लिए कौन ज्यादा खतरनाक है? सच यह है कि यह सवाल "कौन कम बुरा है" से आगे बढ़कर सोचने की मांग करता है। दोनों ही आदतें दिल को अलग-अलग रास्तों से एक जैसा नुकसान पहुंचाती है, और वेपिंग को "सुरक्षित विकल्प" मानने की गलती कई बार बहुत महंगी पड़ सकती है। अगर आप या आपका कोई अपना इनमें से किसी भी आदत से जूझ रहा है, तो अकेले इससे लड़ने की जरूरत नहीं। सही मेडिकल सलाह, सही सपोर्ट और समय पर की गई जांच दिल को उस नुकसान से बचा सकती है जो शायद अभी अंदर ही अंदर शुरू हो चुका हो। अपने दिल की सुनें, और उसकी सुरक्षा के लिए आज ही हमारे कार्डियोलॉजी विशेषज्ञ से अपॉइंटमेंट बुक करें।
हां, रोजाना ई-सिगरेट लेने वालों में हार्ट अटैक का खतरा काफी बढ़ा हुआ पाया गया है। इसमें मौजूद निकोटीन और अन्य केमिकल्स ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट बढ़ाकर दिल पर दबाव डालते हैं।
निकोटीन दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ाता है, खून की नलियों को सिकोड़ता है और शरीर को लगातार अलर्ट मोड में रखता है, जिससे समय के साथ हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है।
हां, वेप लेने के तुरंत बाद ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। लंबे समय तक ऐसा होते रहना क्रॉनिक हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों की वजह बन सकता है।
कभी-कभार वेपिंग को पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि निकोटीन की एक खुराक भी दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर पर तुरंत असर डालती है। सबसे सुरक्षित विकल्प है इससे पूरी तरह दूर रहना।
हां, कम उम्र में वेपिंग शुरू करने वाले युवाओं में खून की नलियों की कार्यक्षमता प्रभावित होती देखी गई है, जिससे भविष्य में हृदय रोग और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
पूरी तरह "ठीक" कहना मुश्किल है, लेकिन छोड़ने के बाद दिल की सेहत में लगातार सुधार होता है और हार्ट अटैक व स्ट्रोक का खतरा साल-दर-साल घटता जाता है, खासकर अगर साथ में सही जांच और डॉक्टर की सलाह ली जाए।
Written and Verified by:

Dr. Anil Mishra is the Director of Cardiology Dept. at BM Birla Heart Hospital, Kolkata, with over 33 years of experience. He specializes in complex angioplasties, pacemaker & AICD implantation, CRT-D, TAVI, and was the first in Eastern India to perform rotablation and implant leadless pacemakers.
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