
अगर आपके मन में भी यही सवाल घूम रहा है कि क्या लो ब्लड प्रेशर के कारण हार्ट अटैक आता है या नहीं, तो यकीन मानिए आप अकेले नहीं हैं। ज्यादातर लोग हाई बीपी को दिल की बीमारी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन लो ब्लड प्रेशर को अक्सर हल्के में लिया जाता है, जबकि सच्चाई इतनी सीधी नहीं है।
इस ब्लॉग में हम लो ब्लड प्रेशर और हार्ट अटैक के बीच के असली रिश्ते को विस्तार से समझेंगे, यह भी जानेंगे कि लो ब्लड प्रेशर के क्या लक्षण है और किन हालातों में यह वाकई खतरनाक बन सकता है। अगर आपको या आपके परिवार में किसी को बार-बार चक्कर आना, कमजोरी या बेहोशी जैसी शिकायत रहती है, तो देर न करें, आज ही हमारे अनुभवी हृदय रोग विशेषज्ञ से अपॉइंटमेंट बुक करें और अपने दिल की सही जांच करवाएं।
मेडिकल भाषा में जब किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर लगातार 90/60 mmHg से नीचे रहता है, तो इसे हाइपोटेंशन (hypotension) कहा जाता है। सामान्य स्वस्थ वयस्क का बीपी करीब 120/80 mmHg माना जाता है। जब यह आंकड़ा इससे काफी नीचे चला जाता है, तो शरीर के महत्वपूर्ण अंगों, खासकर दिमाग और दिल तक खून का दबाव कम पहुंचने लगता है। आपको एक खास बात बता दें कि लो ब्लड प्रेशर कोई रोग नहीं है, ये एक शरीर के एक स्थिति है, जिसमें बीपी एक सीमा के नीचे चला जाता है।
लो बीपी के पीछे कई वजहें हो सकती हैं जैसे कि -
दिलचस्प बात यह है कि कुछ लोगों का सामान्य बीपी ही 90/60 के आसपास होता है और उन्हें कोई तकलीफ भी नहीं होती, ऐसे मामलों में चिंता की जरूरत नहीं होती। असली खतरा तब शुरू होता है, जब बीपी अचानक गिरता है या साथ में लक्षण भी दिखने लगते हैं।
यह सवाल जितना सुनने में सीधा लगता है, जवाब उतना ही बारीक है। मेडिकल रिसर्च और कार्डियोलॉजी एक्सपर्ट्स की मानें तो लो ब्लड प्रेशर सीधे तौर पर हार्ट अटैक का कारण नहीं बनता, लेकिन यह एक ऐसी स्थिति जरूर बना सकता है जैसे कि -
यह रिश्ता दोनों तरफ से काम करता है-
हमारे यहां BMB कोलकाता में एक ऐसा ही केस सामने आया था, जहां एक 62 वर्षीय मरीज बार-बार चक्कर और कमजोरी की शिकायत लेकर आई थी। शुरुआती जांच में उनका बीपी 80/50 mmHg मिला। गहन जांच करने पर पता चला कि उन्हें साइलेंट इस्केमिया की समस्या थी, यानी हृदय तक खून की आपूर्ति कम हो रही थी, लेकिन सीने में दर्द जैसा कोई स्पष्ट लक्षण नहीं था। समय पर पहचान और इलाज से उनकी स्थिति बड़ी दुर्घटना बनने से पहले ही संभल गई। ऐसे मामले यह दिखाते हैं कि लो बीपी के लक्षणों को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है।
हर लो बीपी खतरनाक नहीं होता, लेकिन कुछ स्थितियों में सतर्क रहना जरूरी है जैसे कि -
अगर आपको बार-बार चक्कर, धुंधला दिखना, ठंडा पसीना आना, सांस फूलना या सीने में हल्की बेचैनी महसूस हो, तो इसे सामान्य कमजोरी समझकर टालें नहीं। यह जानना जरूरी है कि लो ब्लड प्रेशर कब खतरनाक होता है, ताकि सही समय पर मदद ली जा सके।
लो बीपी की सही वजह जाने बिना इलाज शुरू करना सही नहीं है। इसलिए डॉक्टर आमतौर पर इन जांचों की सलाह देते हैं -
इलाज पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि लो बीपी की जड़ में क्या है। अगर डिहाइड्रेशन वजह है, तो पर्याप्त पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स से सुधार आ सकता है। अगर किसी दवा का साइड इफेक्ट है, तो डॉक्टर खुराक बदल सकते हैं।

रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ आसान बदलाव लो बीपी को नियंत्रित रखने और दिल को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं -
एक बात हमेशा याद रखें, दिल की सेहत सिर्फ हाई बीपी को नियंत्रित करने से नहीं, बल्कि बीपी को संतुलित रखने से जुड़ी है।
तो क्या लो ब्लड प्रेशर हार्ट अटैक का सीधा कारण है? पूरी तरह नहीं, लेकिन यह जरूर एक ऐसी कड़ी बन सकता है जो दिल तक खून की सप्लाई कम करके खतरे को बढ़ा देती है, खासकर उन लोगों में जिन्हें पहले से हृदय संबंधी समस्याएं हैं। शरीर के छोटे-छोटे संकेतों को नजरअंदाज करना कभी-कभी भारी पड़ सकता है। अगर आपको या आपके किसी अपने को बार-बार चक्कर, कमजोरी या बेहोशी जैसी शिकायत रहती है, तो इसे सामान्य समझने की भूल न करें। सही समय पर सही जांच और विशेषज्ञ की सलाह ही आपके दिल को सुरक्षित रख सकती है। हमारे अनुभवी हृदय रोग विशेषज्ञों से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और अपने दिल की पूरी जांच करवाएं।
तुरंत लेट जाएं और पैरों को ऊपर उठाएं, थोड़ा नमक या नमकीन तरल पदार्थ लें और आराम करें। अगर बेहोशी, सीने में दर्द या सांस फूलने जैसे लक्षण हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
हां, कई बार बार-बार लो बीपी हृदय रोग, हार्मोनल असंतुलन, एनीमिया या नर्वस सिस्टम की समस्या का संकेत हो सकता है। बेहतर है कि विशेषज्ञ से जांच करवाई जाए।
पर्याप्त पानी, नारियल पानी, नमकीन तरल पदार्थ, केला, नट्स और आयरन युक्त भोजन जैसे हरी सब्जियां बीपी संतुलित रखने में मदद करते हैं। डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
हां, डिहाइड्रेशन से शरीर में खून का आयतन घटता है, जिससे बीपी गिरता है और दिल तक ऑक्सीजन युक्त रक्त पहुंचने में रुकावट आ सकती है, जो हृदय पर अतिरिक्त दबाव डालती है।
90/60 mmHg से कम रीडिंग को हाइपोटेंशन माना जाता है, जबकि 120/80 mmHg को सामान्य स्वस्थ बीपी माना जाता है।
हां, खासकर ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन बुजुर्गों में ज्यादा देखा जाता है, क्योंकि उम्र के साथ धमनियों की लचक और नर्वस सिस्टम की प्रतिक्रिया क्षमता कम हो जाती है।
हां, कुछ मरीजों में बीपी दिनभर में उतार-चढ़ाव दिखाता है, कभी हाई तो कभी लो। यह अक्सर दवाओं के असर, नर्वस सिस्टम की गड़बड़ी या हृदय की अनियमित धड़कन से जुड़ा होता है, इसलिए नियमित मॉनिटरिंग जरूरी है।
अगर चक्कर, बेहोशी, धुंधला दिखना, सीने में बेचैनी या सांस फूलना बार-बार हो रहा है, तो तुरंत हृदय रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें, देर करना जोखिम भरा हो सकता है।
Written and Verified by:

Dr. Anil Mishra is the Director of Cardiology Dept. at BM Birla Heart Hospital, Kolkata, with over 33 years of experience. He specializes in complex angioplasties, pacemaker & AICD implantation, CRT-D, TAVI, and was the first in Eastern India to perform rotablation and implant leadless pacemakers.
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