
कल्पना कीजिए कि एक नन्हा सा दिल, जो जन्म के समय एक छोटी सी खामी के साथ धड़कना शुरू करता है, वह दशकों तक बिना किसी शोर के काम करता रहता है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर की जरूरतें बदलती हैं और वह पुराना 'छोटा सा डिफेक्ट' एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। दिल से जुड़ी बीमारियां अक्सर हमें बुढ़ापे या खराब लाइफस्टाइल की याद दिलाती हैं, लेकिन एडल्ट जन्मजात हृदय रोग (ACHD) की कहानी थोड़ी अलग और जज्बाती है।
यदि आप या आपका कोई अपना अक्सर थकान महसूस करता है या बचपन में दिल का कोई ऑपरेशन हुआ था, तो यह जानकारी आपके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है। सही समय पर विशेषज्ञ की सलाह और उचित देखभाल के जरिए आप एक सामान्य और खुशहाल जीवन जी सकते हैं।
एडल्ट जन्मजात हृदय रोग, जिसे संक्षेप में ACHD (Adult congenital heart disease) कहा जाता है, उन हृदय दोषों को संदर्भित करता है, जो व्यक्ति के जन्म के समय से ही उसके दिल में मौजूद होते हैं। मेडिकल जगत में इसे अक्सर 'वयस्क जन्मजात हृदय रोग' भी कहा जाता है। "जन्मजात" का अर्थ ही है 'जन्म से'। पहले के समय में, हृदय दोष के साथ पैदा होने वाले अधिकांश बच्चे वयस्क होने तक जीवित नहीं रह पाते थे। लेकिन मेडिकल साइंस की प्रगति और आधुनिक सर्जरी तकनीकों की बदौलत, आज लगभग 90% से अधिक बच्चे वयस्कता की दहलीज पार कर रहे हैं। लेकिन बच्चों में दिल की समस्या (congenital heart disease in child) का इलाज बहुत आवश्यक है क्योंकि भारत में, एक अनुमान के मुताबिक, हर साल लगभग 2 लाख से अधिक बच्चे जन्मजात हृदय दोष के साथ पैदा होते हैं।
जब यही बच्चे बड़े होकर 18 वर्ष की आयु पूरी कर लेते हैं, तो जिस स्थिति का सामना वो करते हैं, उसे एडल्ट जन्मजात हृदय रोग कहा जाता है। यहां यह समझना जरूरी है कि भले ही बचपन में कोई सर्जरी हुई हो, फिर भी दिल की संरचना सामान्य दिल से अलग हो सकती है, जिसे जीवन भर निगरानी की आवश्यकता होती है।
अक्सर लोग भ्रमित हो जाते हैं कि क्या बुढ़ापे में होने वाला हार्ट अटैक और ACHD एक ही हैं? इसका जवाब है - नहीं। ACHD बनाम सामान्य हृदय रोग के बीच के अंतर को समझना आपके इलाज के लिए बहुत जरूरी है। चलिए दोनों के बीच के अंतर को समझते हैं -
कई बार बच्चों का हार्ट डिफेक्ट वयस्कों में तब तक पता नहीं चलता जब तक कि शरीर पर काम का बोझ न बढ़े। इसके लक्षण सामान्य हृदय रोगों से मिलते-जुलते हो सकते हैं, लेकिन इनकी गंभीरता अलग होती है। निम्नलिखित लक्षणों को हमेशा ध्यान में रखने की सलाह दी जाती है -
जन्मजात हृदय रोग वयस्कों में कई रूपों में मौजूद हो सकता है। कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं -
निदान की प्रक्रिया एक साधारण शारीरिक जांच से शुरू होती है, जहां डॉक्टर स्टेथोस्कोप की मदद से 'मर्मर' (हृदय की असामान्य ध्वनि) को सुनते हैं। इसके बाद निम्नलिखित टेस्ट किए जा सकते हैं -
उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या कितनी गंभीर है। जरूरी नहीं कि हर ACHD मरीज को सर्जरी की आवश्यकता हो। इलाज और मैनेजमेंट के लिए निम्न विकल्प मौजूद हैं -
ACHD के साथ जीने का मतलब यह नहीं है कि आप अपनी इच्छाओं को मार दें। बस आपको थोड़ा अधिक जागरूक रहने की जरूरत है -
एडल्ट जन्मजात हृदय रोग (ACHD) कोई सजा नहीं है, बल्कि एक ऐसी स्थिति है, जिसे सही प्रबंधन और प्यार भरी देखभाल के साथ संभाला जा सकता है। विज्ञान ने हमें वह शक्ति दी है कि हम इन जन्मजात चुनौतियों के बावजूद एक लंबा और गुणवत्तापूर्ण जीवन जी सकें। यदि आपको अपने बचपन की मेडिकल हिस्ट्री के बारे में पता है या ऊपर बताए गए लक्षण महसूस होते हैं, तो आज ही एक विशेषज्ञ से मिलें और परामर्श लें। आपका दिल अनमोल है, इसकी धड़कनों को थमने न दें।
हां, जन्मजात हृदय रोग जन्म से ही होता है, लेकिन कई मामलों में इसके लक्षण वयस्क होने तक प्रकट नहीं होते। साथ ही, जिन बच्चों की बचपन में सर्जरी हुई थी, वे भी वयस्क होने पर ACHD की श्रेणी में आते हैं।
सामान्य हार्ट डिजीज अक्सर लाइफस्टाइल और उम्र (ब्लॉकेज) से जुड़ी होती है। इसके विपरीत, ACHD दिल की बनावट या संरचना में जन्मजात खराबी (जैसे दीवार में छेद या वाल्व की खराबी) के कारण होती है।
उन लोगों को अधिक खतरा होता है, जिनके परिवार में हार्ट डिफेक्ट का इतिहास रहा हो, या जिनकी माता को गर्भावस्था के दौरान जर्मन खसरा (Rubella) या मधुमेह जैसी बीमारियां रही हों। इसके अतिरिक्त धूम्रपान से भी यह समस्या ट्रिगर हो सकती है।
बिल्कुल, आधुनिक चिकित्सा तकनीकों और नियमित चिकित्सा फॉलो-अप की मदद से ACHD के मरीज शादी कर सकते हैं, करियर बना सकते हैं और एक सक्रिय व सामान्य जीवन जी सकते हैं। बस हमेशा डॉक्टरों के साथ टच में रहें।
हां, क्योंकि उम्र के साथ दिल में नए बदलाव आ सकते हैं। नियमित चेकअप से भविष्य में होने वाली जटिलताओं जैसे कि हार्ट फेलियर या एरिद्मिया को रोका जा सकता है।
Written and Verified by:

Dr. Satarupa Mukherjee is an Associate Consultant in Pediatric Cardiology at BM Birla Heart Hospital, Kolkata with over 3 years of experience. She specializes in post-op care after neonatal & pediatric cardiac surgery, extracorporeal life support, and pediatric cardiac transplantation.
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