
सुबह उठते ही मोबाइल की स्क्रीन थोड़ी धुंधली लगी। आपने सोचा, नींद पूरी नहीं हुई होगी। दो-तीन दिन बाद भी वही धुंधलापन बना रहा, तो आपने आंखों की एक्सरसाइज करना शुरू कर दिया। लेकिन असल में दिक्कत आंखों में नहीं, आपके ब्लड प्रेशर में हो सकती है। यह सुनने में अजीब लगता है, मगर सच यही है कि हमारा दिल और हमारी आंखें एक ही रक्त-तंत्र से जुड़े होते हैं, और जब यह तंत्र दबाव में आता है, तो सबसे पहले असर इन्हीं नाजुक अंगों पर पड़ता है।
इसी स्थिति को डॉक्टर हाइपरटेंसिव रेटिनोपैथी कहते हैं, एक ऐसी बीमारी जिसके बारे में ज्यादातर लोग तब जानते हैं जब बहुत देर हो चुकी होती है। सबसे चिंता की बात यह है कि इसके शुरुआती लक्षण इतने मामूली होते हैं कि लोग इन्हें थकान या उम्र का असर समझकर टाल देते हैं। अगर आप या आपके परिवार में कोई लंबे समय से हाई बीपी का मरीज है, तो यह ब्लॉग आपके लिए ही लिखा गया है। यदि पढ़ते-पढ़ते आपको अपने या किसी परिचित के लक्षण हाई बीपी के लक्षण जैसे महसूस हो, तो देर न करें, हमारे हृदय रोग विशेषज्ञों से अपॉइंटमेंट बुक करें और सही समय पर सही जांच करवाएं।
हमारी आंख के पिछले हिस्से में एक बेहद पतली परत होती है, जिसे रेटिना कहा जाता है। यह परत कैमरे की फिल्म की तरह काम करती है, जो बाहर की रोशनी को पकड़कर दिमाग तक भेजती है। रेटिना तक खून पहुंचाने के लिए बहुत महीन रक्त वाहिकाएं होती हैं, और जब ब्लड प्रेशर लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो इन्हीं महीन वाहिकाओं पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ता है। धीरे-धीरे इनकी दीवारें सख्त और मोटी होने लगती हैं, कहीं-कहीं ये सिकुड़ जाती हैं और कहीं से रिसाव भी होने लगता है। इसी क्षति को मेडिकल भाषा में हाइपरटेंसिव रेटिनोपैथी कहा जाता है।
यह कोई अचानक होने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि सालों की अनियंत्रित हाई बीपी की देन है। खास बात यह है कि जिन मरीजों को पांच साल या उससे अधिक समय से हाई बीपी है, उनमें यह खतरा साफ तौर पर बढ़ जाता है। यानी यह सीधा-सीधा संकेत है कि बीपी जितना लंबा और जितना अनियंत्रित रहेगा, आंखों पर उतना ही गहरा असर पड़ेगा।
बहुत से मरीज़ हमसे पूछते हैं, "डॉक्टर साहब, बीपी का दिल से रिश्ता तो समझ आता है, पर आंखों से क्या लेना-देना?" जवाब सीधा है, शरीर की हर रक्त वाहिका एक ही तंत्र का हिस्सा है। हाई ब्लड प्रेशर से आंखों पर असर कई तरह से पड़ सकता है:
यही वजह है कि नेत्र रोग विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि आंख की जांच के दौरान रेटिना को देखकर ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति का बीपी कितने समय से और कितना अनियंत्रित रहा है। एक बात और साफ कर दें, कई मरीज हमसे पूछते हैं कि क्या हाई बीपी से चेहरे पर सूजन आती है। हां, गंभीर या अनियंत्रित हाई बीपी में चेहरे और आंखों के आसपास हल्की सूजन देखी जा सकती है, खासकर अगर इसके साथ किडनी पर भी असर पड़ रहा हो। ऐसे लक्षण को हल्के में न लें और तुरंत जांच करवाएं।
इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शुरुआती दौर में इसके लगभग कोई लक्षण नजर नहीं आते। रेटिना धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होता रहता है और मरीज को इसका आभास तक नहीं होता, जब तक कि नुकसान गंभीर स्तर तक न पहुंच जाए। फिर भी, कुछ संकेतों पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है -

अगर इनमें से कोई भी लक्षण आपको या आपके परिवार के किसी हाई बीपी के मरीज को महसूस हो, तो इसे सामान्य थकान समझकर टालें नहीं। हमारे पास ऐसे कई मरीज आ चुके हैं जो लंबे समय से हाई बीपी के साथ जी रहे थे, नियमित दवा भी ले रहे थे, लेकिन कभी बीपी की जांच के साथ आंखों की जांच नहीं करवाई। जब उन्हें अचानक धुंधलापन महसूस हुआ और जांच करवाई गई, तब पता चला कि रेटिना में बदलाव पहले से ही शुरू हो चुके थे।
अच्छी बात यह है कि हाई बीपी में आंखों की जांच बेहद आसान और दर्द रहित होती है। नेत्र विशेषज्ञ आमतौर पर इन तरीकों से रेटिना की स्थिति जांचते हैं -
डॉक्टर आमतौर पर रेटिना में हुए बदलाव को हल्के से लेकर गंभीर स्तर तक की श्रेणियों में बांटते हैं। शुरुआती श्रेणी में सिर्फ रक्त वाहिकाओं में हल्का संकुचन दिखता है, जबकि गंभीर श्रेणी में रेटिना में सूजन, रक्तस्राव और यहां तक कि ऑप्टिक नर्व को नुकसान भी शामिल हो सकता है। इसलिए हम हमेशा कहते हैं, हाई बीपी के हर मरीज को साल में कम से कम एक बार आंखों की जांच अवश्य करवानी चाहिए, भले ही उन्हें कोई लक्षण महसूस न हो रहा हो। जब आप किसी हृदय रोग विशेषज्ञ के पास जाते हैं, तो वह भी जांच की सूची में आपको आंखों की जांच का सुझाव देंगे।
यहां एक जरूरी बात समझनी होगी, हाइपरटेंसिव रेटिनोपैथी का कोई सीधा "आंखों का इलाज" नहीं है। इसका असली इलाज है, अपने ब्लड प्रेशर को जड़ से नियंत्रण में लाना। जब बीपी काबू में आता है, तो रेटिना की रक्त वाहिकाओं को ठीक होने का मौका मिलता है और आगे होने वाला नुकसान रुक जाता है। इसके लिए कुछ जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं -
समय पर सही इलाज मिलने से न सिर्फ आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है, बल्कि हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसे बड़े खतरों से भी बचाव होता है।
हालांकि हल्के और थोड़े गंभीर मामलों में ये उपाय कर सकते हैं। लेकिन गंभीर मामलों (जैसे रेटिना में सूजन, ब्लीडिंग या रेटिनल डिटैचमेंट) में केवल बीपी कंट्रोल काफी नहीं होता; इनके लिए लेज़र थेरेपी या एंटी-VEGF इंजेक्शन जैसे सीधे नेत्र उपचारों की आवश्यकता होती है।
हाई ब्लड प्रेशर सिर्फ एक नंबर नहीं है, जिसे आप दवा लेकर भूल सकते हैं, यह शरीर के हर उस अंग को प्रभावित करता है जहां तक खून पहुंचता है, और आंखें इसका बहुत संवेदनशील हिस्सा हैं। हाइपरटेंसिव रेटिनोपैथी के संबंध में सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह चुपचाप अपने विकराल रूप में आता है। अच्छी खबर यह है कि अगर समय रहते बीपी को नियंत्रण में ले लिया जाए, तो आंखों की रोशनी को होने वाले ज्यादातर नुकसान को रोका जा सकता है। अगर आप लंबे समय से हाई बीपी के साथ जी रहे हैं, या आपके परिवार में इसका इतिहास रहा है, तो इंतजार न करें। कोलकाता में सीके बिरला अस्पताल (बीएमबी हार्ट रिसर्च सेंटर) के हमारे अनुभवी हृदय रोग विशेषज्ञों से मिलें, अपनी पूरी जांच करवाएं, और अपने दिल के साथ-साथ अपनी आंखों की रोशनी को भी सुरक्षित रखें।
हां, लंबे समय तक अनियंत्रित हाई बीपी रेटिना की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाकर धीरे-धीरे आंखों की रोशनी कम कर सकता है। समय पर बीपी नियंत्रित करने से यह खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।
जी हां, अगर बीपी अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो रेटिना में सूजन या रक्तस्राव के कारण अचानक धुंधलापन महसूस हो सकता है। ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
बिल्कुल, बीपी जितना जल्दी और जितना बेहतर नियंत्रित होता है, रेटिना को होने वाला नुकसान उतना ही कम होता है, और शुरुआती स्तर पर तो यह क्षति काफी हद तक ठीक भी हो सकती है।
आमतौर पर साल में एक बार आंखों की जांच पर्याप्त मानी जाती है, लेकिन अगर बीपी अनियंत्रित रहता है या कोई लक्षण महसूस हो, तो डॉक्टर की सलाह पर जांच जल्दी भी करवाई जा सकती है।
अगर स्थिति बहुत बढ़ जाए और इलाज में देरी हो, तो हां, इससे स्थायी दृष्टि हानि हो सकती है। इसलिए शुरुआती लक्षणों पर ध्यान देना और समय पर जांच करवाना बेहद ज़रूरी है।
जिन लोगों को पांच साल से अधिक समय से हाई बीपी है, जिनका बीपी अनियंत्रित रहता है, जो 60 साल से अधिक उम्र के हैं, या जिन्हें डायबिटीज और किडनी की समस्या भी है, उनमें यह खतरा ज्यादा होता है।
हां, चूंकि रेटिना की रक्त वाहिकाएं शरीर की अन्य वाहिकाओं जैसी ही होती हैं, इसलिए इनकी स्थिति देखकर डॉक्टर दिल और रक्त वाहिकाओं की सेहत का भी अंदाज़ा लगा सकते हैं।
Written and Verified by:

Dr. Dhiman Kahali is the Director of Interventional Cardiology Dept. at BM Birla Heart Hospital, Kolkata, with over 37 years of experience. He specializes in angioplasty, mitral balloon dilation, and peripheral vascular interventions, and has been honored with the Gandhi Centenary and Mother Teresa International Awards.
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