
क्या आपने कभी सोचा था कि दही खाने से आपका दिल भी खुश हो सकता है? यह सुनने में थोड़ा अटपटा लगता है, लेकिन पिछले कुछ सालों में दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने जो खोज की है, वो सच में चौंकाने वाली है। हम सबने सुना है कि प्रोबायोटिक्स पाचन के लिए अच्छे होते हैं, लेकिन अब रिसर्च यह कहने लगी है कि ये छोटे-छोटे जीवाणु (microorganisms) हमारे दिल की सेहत पर भी असर डाल सकते हैं।
भारत में हर साल 30 लाख से ज्यादा लोग हृदय रोग का सामना करते हैं। यदि खानपान की सिर्फ एक आदत इस खतरे को थोड़ा भी कम कर सके, तो यह आपके जीवन पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। इस ब्लॉग में हम विज्ञान की भाषा को सरल भाषा में समझाएंगे और बताएंगे कि प्रोबायोटिक्स क्या है, यह दिल को कैसे प्रभावित करते हैं, और आपको क्या करना चाहिए। अगर आप या आपके परिवार में किसी को दिल की बीमारी, हाई कोलेस्ट्रॉल, या हाई ब्लड प्रेशर है, तो आज ही सीके बिरला अस्पताल, BMB के अनुभवी हृदय रोग विशेषज्ञ से अपॉइंटमेंट लें।
“प्रोबायोटिक्स क्या होता है” यह सवाल आपके मन में भी जरूर उठा होगा। सीधे शब्दों में कहें तो प्रोबायोटिक्स वे जीवित सूक्ष्मजीव हैं, जो सही मात्रा में लेने पर हमारे स्वास्थ्य को फायदा पहुंचाते हैं। इन्हें 'अच्छे बैक्टीरिया' भी कहा जाता है।
हमारी आंत में करीब 100 ट्रिलियन से भी ज्यादा बैक्टीरिया रहते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से 'गट माइक्रोबायोम' कहते हैं। ये बैक्टीरिया भोजन पचाने, विटामिन बनाने, और इम्यून सिस्टम को संतुलित रखने में मदद कर सकते हैं। जब इस माइक्रोबायोम का संतुलन बिगड़ता है, तो न सिर्फ पाचन बल्कि पूरे शरीर पर असर पड़ता है।
प्रोबायोटिक्स के सबसे आम और रिसर्च के द्वारा प्रमाणित प्रकार -
ये सूक्ष्मजीव आंत की परत को मजबूत रखते हैं, हानिकारक बैक्टीरिया को पनपने से रोकते हैं, और शरीर में सूजन (inflammation) को कम करते हैं। यही काम जब बड़े स्तर पर होता है, तो दिल तक भी इसका असर पहुंचता है।
यहीं से बात दिलचस्प होती है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि आंत और हृदय के बीच एक मजबूत दो-तरफा संपर्क होता है - जिसे 'गट-हार्ट एक्सिस' (Gut-Heart Axis) कहा जाता है। यानी, आपकी आंत में क्या हो रहा है, यह सीधे आपके दिल को प्रभावित कर सकता है।
जब आंत में स्वस्थ बैक्टीरिया होते हैं, तो वे फाइबर और पॉलीफेनॉल से 'शॉर्ट-चेन फैटी एसिड्स (SCFAs)' बनाते हैं। ये SCFAs खून में मिलकर सूजन को कम करते हैं और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में मदद करते हैं। जब गट माइक्रोबायोम असंतुलित होता है, तो शरीर के भीतर हल्की लेकिन लंबे समय तक रहने वाली सूजन (chronic low-grade inflammation) शुरू होती है, जिससे हृदय रोग का खतरा काफी बढ़ जाता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ यूटा के नोरा एक्लेस हैरिसन कार्डियोवैस्कुलर रिसर्च इंस्टीट्यूट के रिसर्च के अनुसार, हार्ट फेलियर, थ्रोम्बोसिस और आर्टेरियल हाइपरटेंशन से पीड़ित लोगों में गट माइक्रोबायोम का असंतुलन देखा गया है। यह एक बड़ा संकेत है कि दिल की देखभाल के लिए पेट की सेहत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
कुछ प्रोबायोटिक स्ट्रेन, खासकर लैक्टोबैसिलस प्लांटारम और बिफिदोबैक्टीरियम लैक्टिस (Bifidobacterium lactis), कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में सहायक पाए गए हैं। चलिए समझते हैं कि ये कैसे काम करते हैं?
नोट: अकरमंशिया बैक्टीरिया (Akkermansia bacteria): यह विशेष बैक्टीरिया आंत की म्यूकस परत में रहता है और वर्तमान में इस बैक्टीरिया पर रिसर्च जारी है, जिसमें इस बात की पुष्टि की जा रही है कि ये हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
बिफिदोबैक्टीरियम लैक्टिस और लैक्टोबैसिलस रैम्नोसस (Lactobacillus rhamnosus) स्ट्रेन पर हुई एक महत्वपूर्ण स्टडी में पाया गया कि ये दोनों ब्लड प्रेशर को कम करने में सहायक हो सकते हैं।
एक मेटा-एनालिसिस की रिपोर्ट के अनुसार, जिन लोगों ने 8 सप्ताह या उससे अधिक समय तक प्रोबायोटिक्स लिए, उनमें सिस्टोलिक और डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर में मामूली लेकिन कमी देखी गई।
प्रोबायोटिक फूड लेने के लिए आपको महंगे सप्लीमेंट्स की हमेशा जरूरत नहीं पड़ती। भारतीय रसोई तो वैसे भी प्रोबायोटिक्स खाद्य पदार्थों का खजाना है:
बाजार में कैप्सूल, पाउडर और लिक्विड के रूप में प्रोबायोटिक सप्लीमेंट्स उपलब्ध हैं। अगर आप इन्हें लेना चाहते हैं, तो याद रखें - हर सप्लीमेंट में अलग-अलग स्ट्रेन होते हैं और हर किसी पर हर स्ट्रेन एक जैसा काम नहीं करता। इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना कोई भी प्रोबायोटिक सप्लीमेंट शुरू न करें।
प्रोबायोटिक्स ज्यादातर लोगों के लिए सुरक्षित है, लेकिन यह सभी के लिए एक जैसे फायदेमंद नहीं होते। इसे अपनाते समय कुछ जरूरी बातें जानना आवश्यक है-
सामान्य साइड इफेक्ट्स: शुरुआत में गैस, पेट फूलना या हल्की पाचन समस्या हो सकती है। आंतों के नए बैक्टीरिया के साथ तालमेल बिठाने पर यह समस्या एक-दो हफ्ते में ठीक हो जाती है। परेशानी बढ़ने पर डॉक्टर से मिलें।
दिल के मरीजों के लिए जरूरी बात: प्रोबायोटिक्स आपकी दिल की मुख्य दवाइयों का विकल्प नहीं हैं। यदि आपको हाई बीपी, हाई कोलेस्ट्रॉल या दिल की बीमारी है, तो कार्डियोलॉजिस्ट की सलाह के बाद ही इन्हें सही डाइट और व्यायाम के साथ एक सहायक उपाय के रूप में शुरू करें।
प्रोबायोटिक्स दिल को स्वस्थ रखने में सहायक भूमिका निभाते हैं, लेकिन यह कोई जादू की दवा नहीं हैं। विज्ञान मानता है कि आंत और दिल का रिश्ता गहरा है। सही प्रोबायोटिक्स फूड और एक्टिव लाइफस्टाइल मिलकर कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और सूजन को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
याद रखें, प्रोबायोटिक्स मुख्य दवाओं का ऐड-ऑन हैं, उनका रिप्लेसमेंट नहीं। अपने दिल की सेहत के प्रति गंभीर रहें, नियमित जांच करवाएं और किसी भी सप्लीमेंट को शुरू करने से पहले विशेषज्ञ से बात करें। सही समय पर सही कदम उठाना ही सबसे बड़ी स्वास्थ्य नीति है। सीके बिरला अस्पताल (BMB) के हृदय रोग विशेषज्ञों से मिलकर आप अपने दिल की सेहत का सही मूल्यांकन करवा सकते हैं।
हां, प्रोबायोटिक्स गट-हार्ट एक्सिस के जरिए दिल की सेहत में सहायक भूमिका निभा सकते हैं — सूजन कम करके और कोलेस्ट्रॉल को संतुलित रखने में मदद करके। लेकिन यह दवाइयों का विकल्प नहीं है।
कुछ स्ट्रेन जैसे L. plantarum और B. lactis LDL कोलेस्ट्रॉल को मध्यम रूप से कम करने में सहायक पाए गए हैं। यह असर तभी होता है जब कोलेस्ट्रॉल सामान्य सीमा के करीब हो और नियमित रूप से लिया जाए।
स्वस्थ व्यक्तियों के लिए रोजाना दही जैसे प्राकृतिक प्रोबायोटिक फूड लेना सुरक्षित है। सप्लीमेंट्स के लिए डॉक्टर की सलाह जरूर लें, खासकर अगर आप कोई दवा ले रहे हों।
शोध बताते हैं कि 8 सप्ताह या उससे अधिक समय तक प्रोबायोटिक्स लेने वालों में ब्लड प्रेशर में हल्की लेकिन मापनीय कमी देखी गई। यह हाई बीपी की मुख्य दवा का विकल्प नहीं है।
शुरुआत में गैस या पेट फूलना हो सकता है, जो सामान्यतः 1-2 हफ्तों में ठीक हो जाता है। कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों को इसके गंभीर साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। ऐसे में डॉक्टर की सलाह अनिवार्य है।
प्रोबायोटिक्स जीवित लाभकारी बैक्टीरिया हैं, जबकि प्रीबायोटिक वह फाइबर है जो इन बैक्टीरिया का भोजन है। दोनों मिलकर (जिसे 'सिंबायोटिक' कहते हैं) दिल और पाचन दोनों के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं।
दही, छाछ, और किमची सुरक्षित विकल्प हैं। हार्ट पेशेंट को सप्लीमेंट शुरू करने से पहले अपने कार्डियोलॉजिस्ट से सलाह लेनी चाहिए क्योंकि कुछ स्ट्रेन दवाओं के साथ इंटरेक्शन कर सकते हैं।
बड़े बच्चों को दही जैसे प्राकृतिक स्रोत दिए जा सकते हैं। छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं के लिए प्रोबायोटिक सप्लीमेंट देने से पहले बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह अनिवार्य है।
Written and Verified by:

Dr. Sabyasachi Pal is a Senior Consultant in Cardiology Dept. at BM Birla Heart Hospital, Kolkata, with over 11 years of experience. He specializes in coronary interventions and heart failure management.
© 2024 BMB Kolkata. All Rights Reserved.