
क्या आप जानते हैं कि भारत में लिवर से जुड़ी बीमारियां चुपचाप एक बड़ी आबादी को अपनी चपेट में ले रही हैं। रिसर्च के अनुसार हर पांच में से एक भारतीय किसी न किसी रूप में लिवर से जुड़ी समस्या से जूझ रहा है, और बदलती जीवन शैली, बढ़ता मोटापा और शराब का सेवन इस संख्या को और बढ़ा रहे हैं।
सबसे चिंता की बात यह है कि लिवर एक ऐसा अंग है, जो बहुत देर तक बिना शिकायत किए काम करता रहता है; यानी नुकसान तब तक पता ही नहीं चलता जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए। यही वजह है कि इस विषय पर खुलकर बात होना जरूरी है, चाहे यह पढ़ने में थोड़ा भारी लगे। यदि आपको या आपके परिवार में किसी को भी ऊपर बताए गए लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो देर न करें। आप RBH जयपुर के अनुभवी लिवर एवं गैस्ट्रो विशेषज्ञों से अभी अपॉइंटमेंट बुक कर सकते हैं।
लिवर हमारे शरीर का वह अंग है, जो खून को साफ करता है, पाचन में मदद करता है, जरूरी प्रोटीन बनाता है और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालता है। जब लिवर अपने ये सारे काम ठीक से करना बंद कर देता है, तो इस स्थिति को लिवर फेलियर कहा जाता है। लिवर फेलियर दो तरह का होता है।
आमतौर पर ये सिरोसिस (लिवर का स्थायी घाव बनना) की अंतिम अवस्था होती है। लिवर की बीमारी अचानक इस मुकाम तक नहीं पहुंचती, यह पहले सूजन (हेपेटाइटिस), फिर घाव के निशान (फाइब्रोसिस) और उसके बाद सिरोसिस के चरणों से गुजरती है। अगर इनमें से किसी भी चरण पर पहचान हो जाए, तो नुकसान को रोका या धीमा किया जा सकता है।
लिवर फेल होने के लक्षण शुरुआत में इतने आम लगते हैं कि लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते। यही सबसे बड़ी दिक्कत है। शुरुआती दौर में दिखने वाले संकेतों में शामिल हैं -
जैसे-जैसे स्थिति बिगडती है, लिवर फेलियर के लक्षण ज्यादा साफ नजर आने लगते हैं, जैसे आंखों और त्वचा का पीला पड़ना यानी पीलिया, पेशाब का रंग गहरा होना और मल का रंग हल्का पड़ना, बिना किसी रैशेज के शरीर में खुजली होना, और चोट या कट लगने पर आसानी से खून बहना।
लिवर फेल होने पर क्या होता है, यह समझना जरूरी है क्योंकि आगे की स्थिति में पेट में पानी भरना (जलोदर), हाथ-पैरों में सूजन, उल्टी में खून आना, बोलने या सोचने में उलझन होना, और यहां तक कि सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
लिवर फेल कैसे होता है, यह समझने के लिए इसके कारणों को जानना जरूरी है। एक्यूट लिवर फेलियर में मुख्य कारण होते हैं -
क्रॉनिक लिवर फेलियर के पीछे सबसे बड़ी वजह लंबे समय तक और अधिक मात्रा में शराब का सेवन है। भारत में सिरोसिस के लगभग 43 प्रतिशत मामलों के पीछे शराब का सेवन जिम्मेदार होता है। इसके अतिरिक्त फैटी लिवर डिजीज (जिसे अब MASLD कहा जाता है) भी तेजी से बढ़ रहा कारण है, खासकर उन लोगों में जो लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं, नींद पूरी नहीं लेते और तला-भुना खाना ज्यादा खाते हैं। हेपेटाइटिस बी और सी का क्रॉनिक इंफेक्शन, ऑटोइम्यून बीमारियां, और कुछ आनुवंशिक स्थितियां भी लिवर को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती हैं।
लिवर की स्थिति का सही पता लगाने के लिए हम मुख्य रूप से तीन तरह की जांच करते हैं -
इलाज का तरीका पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी किस कारण से हुई है और लिवर कितना डैमेज हो चुका है -
लिवर की बीमारियों की सबसे अच्छी बात यह है कि इन्हें सही सावधानियां बरतकर काफी हद तक रोका जा सकता है। एक स्वस्थ लिवर के लिए इन बातों का ध्यान रखें -

अगर आपको या आपके किसी अपने को आंखों या त्वचा में पीलापन, पेट में असामान्य सूजन, उल्टी में खून, बोलने या सोचने में भ्रम, या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण दिखें, तो यह इंतजार करने का समय नहीं है। ऐसे में तुरंत नजदीकी अस्पताल की इमरजेंसी में जाएं। एक्यूट लिवर फेलियर घंटों और दिनों में जानलेवा बन सकता है, इसलिए हर देरी मरीज के लिए भारी पड़ सकती है।
लिवर फेलियर कोई ऐसा विषय नहीं है जिस पर बात करने से बचा जाए। यह एक ऐसी स्थिति है जो चुपचाप बढ़ती है और अक्सर तब पकड़ में आती है जब स्थिति काफी गंभीर हो चुकी होती है। लेकिन सही जानकारी, समय पर जांच और छोटे-छोटे लाइफस्टाइल बदलावों से इसे रोका जा सकता है या इसकी गति धीमी की जा सकती है। अगर आप या आपका कोई अपना ऊपर बताए गए किसी भी लक्षण से गुजर रहा है, तो कृपया इसे नजरअंदाज न करें। RBH जयपुर में हमारी गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और लिवर केयर टीम पूरी संवेदनशीलता और अनुभव के साथ आपकी मदद के लिए मौजूद है। आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और अपने लिवर की सेहत को प्राथमिकता दें।
एक्यूट लिवर फेलियर कुछ दिनों या हफ्तों में अचानक होता है, जबकि क्रॉनिक लिवर फेलियर महीनों या सालों में धीरे-धीरे विकसित होता है और आमतौर पर सिरोसिस के बाद की अवस्था होती है।
हां, अगर फैटी लिवर का समय पर इलाज न हो, तो यह धीरे-धीरे सूजन, घाव और सिरोसिस से होते हुए लिवर फेलियर तक पहुंच सकता है, इसलिए शुरुआती जांच बहुत जरूरी है।
मुख्य रूप से लिवर फंक्शन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड, फाइब्रोस्कैन या एलास्टोग्राफी, और जरूरत पड़ने पर लिवर बायोप्सी की जाती है ताकि नुकसान की सही स्थिति पता चल सके।
जब लिवर की क्षति इतनी बढ़ जाए कि दवाओं या अन्य इलाज से इसे संभालना मुमकिन न रहे, तब डॉक्टर मरीज को लिवर ट्रांसप्लांट के लिए सुझाव देते हैं।
हां, लंबे समय तक अधिक मात्रा में शराब पीना भारत में क्रॉनिक लिवर फेलियर और सिरोसिस का सबसे बड़ा कारण है।
हल्का, कम तेल वाला, प्रोटीन और फाइबर से भरपूर भोजन लेना चाहिए। नमक और शक्कर की मात्रा सीमित रखें और डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह से ही अपना आहार तय करें।
अगर बीमारी फाइब्रोसिस के चरण में पकड़ में आ जाए, तो समय पर इलाज और जीवनशैली में बदलाव से लिवर काफी हद तक ठीक हो सकता है, लेकिन सिरोसिस की अवस्था स्थाई होती है।
फैटी लिवर और मेटाबोलिक सिंड्रोम वाले मरीजों में हृदय रोग का खतरा भी बढ़ जाता है, इसलिए लिवर की जांच के साथ हृदय की जांच भी करवाना फायदेमंद रहता है।
Written and Verified by:

Dr. Abhinav Sharma is the Director of Gastroenterology Dept. at CK Birla Hospital, Jaipur with over 16 years of experience. He specializes in advanced therapeutic GI endoscopic procedures and the treatment of complex gastrointestinal disorders.
Similar Gastro Science Blogs
Book Your Appointment TODAY
© 2024 RBH Jaipur. All Rights Reserved.