फिशर और पाइल्स में कैसे पहचान करें? लक्षण, कारण और उपचार
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फिशर और पाइल्स में कैसे पहचान करें? लक्षण, कारण और उपचार

Summary

  • अंतर: पाइल्स में गुदा की नसें सूज जाती हैं (गांठ और रक्तस्राव), जबकि फिशर में दरार पड़ने के कारण मल त्याग के दौरान तेज़ जलन व दर्द होता है।
  • मुख्य कारण: कब्ज़, भोजन में कम फाइबर, कम पानी पीना और मल त्याग के समय ज़ोर लगाना।
  • इलाज: शुरुआती मामले फाइबर, पानी और दवाओं से ठीक हो जाते हैं; गंभीर मामलों में डे-केयर या छोटी सर्जरी की ज़रूरत होती है।

ज़रूरी सावधानियां:

  • दिल के मरीज़: 'ब्लड थिनर' लेने वाले लोग मामूली ब्लीडिंग में भी लापरवाही न बरतें।
  • डॉक्टर से परामर्श: लक्षण 2 हफ्ते से ज़्यादा रहने या खून आने पर विशेषज्ञ को दिखाएं, क्योंकि हर रक्तस्राव पाइल्स नहीं होता।

टॉयलेट के बाद कुर्सी पर बैठने में तकलीफ, टिशू पेपर पर हल्का सा खून, या हफ्तों तक चुपचाप सहा जाने वाला दर्द, यह सब बातें ऐसी हैं, जिन पर अक्सर लोग बात करना तो दूर, खुद से भी स्वीकार नहीं करना चाहते। शर्म और झिझक के चलते फिशर और पाइल्स जैसी आम समस्याएं महीनों तक अनदेखी रह जाती हैं, जबकि सही समय पर पहचान हो जाए तो इनका इलाज बेहद आसान है। 

यह ब्लॉग खासतौर पर इसी झिझक को तोड़ने के लिए लिखा गया है, ताकि आप बिना किसी संकोच के अपने लक्षणों को समझें और सही कदम उठा सकें। अगर आपको भी मल त्याग के दौरान दर्द, जलन या रक्तस्राव जैसी समस्या हो रही है, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें, आज ही हमारे अनुभवी कोलोरेक्टल विशेषज्ञ (गुदा रोग विशेषज्ञ) से अपॉइंटमेंट बुक करें और सही जांच करवाएं।

फिशर और पाइल्स क्या हैं?

पाइल्स, जिसे बवासीर भी कहा जाता है, गुदा और मलाशय के निचले भाग की रक्त वाहिकाओं में सूजन आने की स्थिति है। यह मलाशय के अंदर (आंतरिक पाइल्स) या गुदा के बाहर त्वचा के नीचे (बाहरी पाइल्स) बन सकती है।

वहीं फिशर एक अलग समस्या है, जिसमें गुदा नलिका की अंदरूनी परत पर एक छोटी सी दरार या चीरा बन जाता है। यह अक्सर सख्त मल त्यागने के दौरान होता है और मल त्याग करते समय तेज, चुभने वाला दर्द इसकी सबसे बड़ी पहचान है।

दोनों ही समस्याएं गुदा क्षेत्र से जुड़ी होने के कारण अक्सर एक-दूसरे से भ्रमित कर दी जाती हैं, जबकि इनके लक्षण अलग-अलग होते हैं। हाल में हुई कई रिसर्च के अनुसार, वयस्क आबादी के एक बड़े हिस्से को जीवन में कभी न कभी पाइल्स की शिकायत होती है, और लंबे समय तक रहने वाली कब्ज इसका सबसे बड़ा कारण मानी जाती है।

फिशर और पाइल्स के लक्षण

symptoms of fissure and piles

पाइल्स (बवासीर) के लक्षण

पाइल्स के लक्षण रातों-रात नहीं, बल्कि धीरे-धीरे सामने आते हैं। इसकी शुरुआत में अक्सर ये संकेत दिखाई देते हैं - 

  • रक्तस्राव (Bleeding): मल त्याग के दौरान या बाद में टॉयलेट पेपर पर चमकीला लाल खून दिखना।
  • गुदा के आसपास असुविधा: खुजली, हल्की सूजन और लंबे समय तक बैठने में परेशानी होना।
  • गांठ महसूस होना: गुदा के पास एक नरम उभार या गांठ महसूस हो सकती है।

कृपया ध्यान दें: ज़्यादातर मामलों में पाइल्स में बहुत तेज दर्द नहीं होता, जब तक कि गांठ के अंदर खून का थक्का (Blood Clot) न जम जाए।

फिशर के लक्षण

फिशर के लक्षण पाइल्स से काफी अलग होते हैं। इसे इसके चुभन भरे दर्द से आसानी से पहचाना जा सकता है। इसके अतिरिक्त भी कुछ लक्षण होते हैं जैसे कि - 

  • तेज़ जलन और दर्द: मल त्याग के समय और उसके कुछ घंटों बाद तक लगातार तेज़, जलन जैसा दर्द बना रहना इसका सबसे प्रमुख लक्षण है।
  • रक्त के धब्बे: मल के साथ हल्की मात्रा में चमकीला लाल खून आ सकता है।
  • त्वचा पर दरार: गुदा के पास एक छोटी सी दरार (Cut) साफ नजर आ सकती है।

सावधानी: कई लोग इस दर्द के डर से टॉयलेट जाने से कतराने लगते हैं। इससे कब्ज की समस्या और बढ़ती है, मल कठोर हो जाता है और साधारण फिशर भी पुराना (क्रॉनिक) रूप ले लेता है।

फिशर ठीक होने के लक्षण

अगर आपका इलाज सही दिशा में चल रहा है, तो आपका शरीर आपको ऐसे सकारात्मक संकेत दे सकता है - 

  • मल त्याग के दौरान होने वाला दर्द और जलन धीरे-धीरे कम होने लगते हैं।
  • दर्द का समय घट जाता है और ब्लीडिंग पूरी तरह बंद हो जाती है।
  • प्रभावित जगह की त्वचा का रंग और बनावट सामान्य होने लगती है, जो इसके पूरी तरह ठीक होने का स्पष्ट संकेत है।

फिशर और पाइल्स के कारण और जोखिम कारक

इन दोनों ही समस्याओं की मुख्य जड़ पेट और पाचन तंत्र का बिगड़ना है। चलिए इन समस्याओं के मुख्य कारण और जोखिम कारक को समझते हैं - 

मुख्य कारण

कारण वह प्रत्यक्ष वजह है जो गुदा क्षेत्र को सीधे नुकसान पहुँचाती है -

  • सख्त, सूखा या बड़े आकार का मल: जब मल बहुत कठोर होता है, तो बाहर निकलते समय गुदा की नाजुक त्वचा को छील देता है। यह फिशर का सबसे मुख्य कारण है।
  • मल त्याग के समय अत्यधिक ज़ोर लगाना: टॉयलेट में बहुत ज़्यादा दबाव डालने से गुदा की नसों पर प्रेशर पड़ता है, जिससे नसें सूज जाती हैं। यह पाइल्स का मुख्य कारण है।
  • लगातार दस्त की समस्या होना: बार-बार मल त्याग करने से गुदा मार्ग में रगड़ और जलन होती है, जिससे दोनों स्थितियाँ हो सकती हैं।
  • प्रसव (Delivery) के समय खिंचाव: डिलीवरी के दौरान अत्यधिक शारीरिक दबाव पड़ने से त्वचा फट सकती है (फिशर) या नसें सूज सकती हैं (पाइल्स)।

जोखिम कारक

जोखिम कारक वे स्थितियाँ या जीवनशैली की आदतें हैं जो कब्ज बनाती हैं और ऊपर दिए गए कारणों का खतरा बढ़ाती हैं - 

  • आहार संबंधी आदतें: भोजन में फाइबर की कमी और पर्याप्त पानी न पीना।
  • गलत टॉयलेट हैबिट्स: टॉयलेट सीट पर लंबे समय तक बैठे रहना या फोन इस्तेमाल करना।
  • गर्भावस्था (Pregnancy): गर्भाशय के बढ़ते दबाव और हार्मोनल बदलावों के कारण कब्ज व नसों पर दबाव बढ़ना।
  • मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता: दिनभर बैठे रहने और व्यायाम न करने से आंतों की गतिविधि धीमी हो जाती है।
  • भारी वजन उठाना: भारी सामान उठाने से पेट और गुदा क्षेत्र पर अचानक आंतरिक दबाव बढ़ता है।
  • बढ़ती उम्र: उम्र बढ़ने के साथ गुदा मार्ग के ऊतक (Tissues) और नसें कमजोर होने लगती हैं।

हृदय रोगियों के लिए विशेष जानकारी: यदि आप दिल की बीमारी के मरीज़ हैं और 'ब्लड थिनर' या एस्पिरिन जैसी दवाएं ले रहे हैं, तो मामूली फिशर या पाइल्स से भी सामान्य से ज़्यादा रक्तस्राव हो सकता है। इसे नज़रअंदाज़ न करें और तुरंत डॉक्टर से सलाह लें। 

फिशर और पाइल्स की जांच (Diagnosis) कैसे की जाती है?

इसकी जांच बेहद सरल और कम समय में होने वाली प्रक्रिया है:

  1. शारीरिक जांच: डॉक्टर आपकी मेडिकल हिस्ट्री जानने के बाद प्रभावित हिस्से की सामान्य जांच करते हैं।
  2. आंतरिक जांच: आवश्यकता पड़ने पर डिजिटल रेक्टल एग्ज़ामिनेशन, एनोस्कोपी या प्रोक्टोस्कोपी जैसी सरल प्रक्रियाओं से गुदा नलिका के अंदर की स्थिति देखी जाती है।
  3. कोलोनोस्कोपी: यदि लक्षण असामान्य हों या मरीज़ की उम्र अधिक हो, तो ब्लीडिंग के अन्य कारणों को नकारने के लिए कोलोनोस्कोपी की सलाह दी जा सकती है।

ये जांचें थोड़ी असहज ज़रूर लग सकती हैं, लेकिन इनमें सिर्फ कुछ मिनट लगते हैं और सही इलाज चुनने में मदद मिलती है।

फिशर और पाइल्स का इलाज

पाइल्स का इलाज 

  • शुरुआती अवस्था में: सिर्फ केवल जीवनशैली में सुधार, फाइबर युक्त आहार, पर्याप्त पानी और स्टूल सॉफ्टनर (मल नरम करने की दवाइयों) से ही ठीक हो जाती हैं।
  • एडवांस विकल्प: रबर बैंड लिगेशन, इंजेक्शन थेरेपी, लेजर ट्रीटमेंट और स्टेपलर सर्जरी जैसी आधुनिक डे-केयर (Day-care) प्रक्रियाएं उपलब्ध हैं।
  • गंभीर मामले: केवल बहुत गंभीर और बार-बार होने वाले मामलों में ही पारंपरिक ऑपरेशन (Hemorrhoidectomy) की ज़रूरत पड़ती है।

फिशर का इलाज (Fissure Treatment)

  • प्राथमिक देखभाल: शुरुआती फिशर सही देखभाल से 4 से 6 हफ्तों में अपने आप भर जाता है। गुनगुने पानी में सिकाई (Sitz Bath), फाइबर डाइट और मांसपेशियों को आराम देने वाली क्रीम इसमें बहुत असरदार हैं।
  • क्रॉनिक फिशर: अगर दवाओं से आराम न मिले, तो एक छोटी सी न्यूनतम चीरफाड़ वाली सर्जरी से स्थायी राहत पाई जा सकती है।

महत्वपूर्ण सलाह: संकोच या शर्म के कारण इलाज में देरी न करें। समय पर ली गई डॉक्टरी सलाह समस्या को गंभीर होने से बचा सकती है।

पाइल्स और फिशर में क्या खाना चाहिए?

पाचन को दुरुस्त रखकर ही इन समस्याओं से स्थायी राहत पाई जा सकती है:

  • क्या खाएं (फाइबर युक्त आहार): साबुत अनाज, ओट्स, दलिया, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, पपीता, नाशपाती, इसबगोल और अलसी के बीज। ये मल को नरम रखकर पाचन को सुचारू बनाते हैं।
  • तरल पदार्थ: दिनभर में पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
  • किन चीज़ों से बचें: अत्यधिक तला-भुना, मसालेदार और प्रोसेस्ड फूड न खाएं। शराब और कैफीन (चाय/कॉफी) का सेवन कम करें, क्योंकि ये शरीर में डिहाइड्रेशन बढ़ाकर कब्ज को गंभीर बना सकते हैं।

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए और इनसे कैसे बचाव करें?

अगर गुदा से खून आना, तेज़ दर्द, गांठ, लगातार खुजली या स्राव जैसी कोई भी समस्या दो हफ्तों से ज़्यादा बनी रहे, तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय विशेषज्ञ से मिलना ज़रूरी है। यह भी ध्यान रखें कि हर रक्तस्राव सिर्फ पाइल्स का संकेत नहीं होता, कोलोरेक्टल कैंसर जैसी गंभीर स्थितियां भी शुरुआत में इसी तरह के लक्षण दिखा सकती हैं, इसलिए समय पर जांच ज़रूरी है।

बचाव के लिए फाइबर युक्त आहार, रोज़ाना पर्याप्त पानी, नियमित हल्की-फुल्की एक्सरसाइज़, मल त्याग के दौरान ज़ोर लगाने से बचना और लंबे समय तक शौचालय में न बैठना, ये आदतें बेहद कारगर साबित होती हैं। जयपुर स्थित हमारे अस्पताल में कोलोरेक्टल टीम ऐसे मरीज़ों के लिए पूरी गोपनीयता और संवेदनशीलता के साथ परामर्श देती है, ताकि किसी को भी झिझक के कारण इलाज में देरी न करनी पड़े और एक बेहतर जीवन जी सके।

निष्कर्ष

फिशर और पाइल्स दोनों ही आम समस्याएं हैं, लेकिन शर्म के कारण इन्हें छुपाना समस्या को और बढ़ा सकता है। दोनों के लक्षण, कारण और इलाज अलग-अलग हैं, इसलिए सही पहचान होना बहुत ज़रूरी है। अगर आप या आपके परिवार में किसी को भी मल त्याग के दौरान दर्द, खून या असुविधा हो रही है, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें। सही समय पर सही सलाह लेकर इस समस्या से पूरी तरह छुटकारा पाया जा सकता है।

हां, फिशर में भी मल त्याग के दौरान हल्की मात्रा में चमकीला लाल खून आ सकता है, हालांकि इसकी मुख्य पहचान तेज़ दर्द है, न कि सिर्फ रक्तस्राव।

Written and Verified by:

Dr. Mansimrat P Singh

Dr. Mansimrat P Singh

Consultant Exp: 12 Yr

General and Minimal Access Surgery

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Dr. Mansimrat P Singh is a skilled surgeon specializing in General and Minimal Invasive Surgery with over 11 years of experience.

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