
ज़रूरी सावधानियां:
टॉयलेट के बाद कुर्सी पर बैठने में तकलीफ, टिशू पेपर पर हल्का सा खून, या हफ्तों तक चुपचाप सहा जाने वाला दर्द, यह सब बातें ऐसी हैं, जिन पर अक्सर लोग बात करना तो दूर, खुद से भी स्वीकार नहीं करना चाहते। शर्म और झिझक के चलते फिशर और पाइल्स जैसी आम समस्याएं महीनों तक अनदेखी रह जाती हैं, जबकि सही समय पर पहचान हो जाए तो इनका इलाज बेहद आसान है।
यह ब्लॉग खासतौर पर इसी झिझक को तोड़ने के लिए लिखा गया है, ताकि आप बिना किसी संकोच के अपने लक्षणों को समझें और सही कदम उठा सकें। अगर आपको भी मल त्याग के दौरान दर्द, जलन या रक्तस्राव जैसी समस्या हो रही है, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें, आज ही हमारे अनुभवी कोलोरेक्टल विशेषज्ञ (गुदा रोग विशेषज्ञ) से अपॉइंटमेंट बुक करें और सही जांच करवाएं।
पाइल्स, जिसे बवासीर भी कहा जाता है, गुदा और मलाशय के निचले भाग की रक्त वाहिकाओं में सूजन आने की स्थिति है। यह मलाशय के अंदर (आंतरिक पाइल्स) या गुदा के बाहर त्वचा के नीचे (बाहरी पाइल्स) बन सकती है।
वहीं फिशर एक अलग समस्या है, जिसमें गुदा नलिका की अंदरूनी परत पर एक छोटी सी दरार या चीरा बन जाता है। यह अक्सर सख्त मल त्यागने के दौरान होता है और मल त्याग करते समय तेज, चुभने वाला दर्द इसकी सबसे बड़ी पहचान है।
दोनों ही समस्याएं गुदा क्षेत्र से जुड़ी होने के कारण अक्सर एक-दूसरे से भ्रमित कर दी जाती हैं, जबकि इनके लक्षण अलग-अलग होते हैं। हाल में हुई कई रिसर्च के अनुसार, वयस्क आबादी के एक बड़े हिस्से को जीवन में कभी न कभी पाइल्स की शिकायत होती है, और लंबे समय तक रहने वाली कब्ज इसका सबसे बड़ा कारण मानी जाती है।

पाइल्स के लक्षण रातों-रात नहीं, बल्कि धीरे-धीरे सामने आते हैं। इसकी शुरुआत में अक्सर ये संकेत दिखाई देते हैं -
कृपया ध्यान दें: ज़्यादातर मामलों में पाइल्स में बहुत तेज दर्द नहीं होता, जब तक कि गांठ के अंदर खून का थक्का (Blood Clot) न जम जाए।
फिशर के लक्षण पाइल्स से काफी अलग होते हैं। इसे इसके चुभन भरे दर्द से आसानी से पहचाना जा सकता है। इसके अतिरिक्त भी कुछ लक्षण होते हैं जैसे कि -
सावधानी: कई लोग इस दर्द के डर से टॉयलेट जाने से कतराने लगते हैं। इससे कब्ज की समस्या और बढ़ती है, मल कठोर हो जाता है और साधारण फिशर भी पुराना (क्रॉनिक) रूप ले लेता है।
अगर आपका इलाज सही दिशा में चल रहा है, तो आपका शरीर आपको ऐसे सकारात्मक संकेत दे सकता है -
इन दोनों ही समस्याओं की मुख्य जड़ पेट और पाचन तंत्र का बिगड़ना है। चलिए इन समस्याओं के मुख्य कारण और जोखिम कारक को समझते हैं -
कारण वह प्रत्यक्ष वजह है जो गुदा क्षेत्र को सीधे नुकसान पहुँचाती है -
जोखिम कारक वे स्थितियाँ या जीवनशैली की आदतें हैं जो कब्ज बनाती हैं और ऊपर दिए गए कारणों का खतरा बढ़ाती हैं -
हृदय रोगियों के लिए विशेष जानकारी: यदि आप दिल की बीमारी के मरीज़ हैं और 'ब्लड थिनर' या एस्पिरिन जैसी दवाएं ले रहे हैं, तो मामूली फिशर या पाइल्स से भी सामान्य से ज़्यादा रक्तस्राव हो सकता है। इसे नज़रअंदाज़ न करें और तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।
इसकी जांच बेहद सरल और कम समय में होने वाली प्रक्रिया है:
ये जांचें थोड़ी असहज ज़रूर लग सकती हैं, लेकिन इनमें सिर्फ कुछ मिनट लगते हैं और सही इलाज चुनने में मदद मिलती है।
महत्वपूर्ण सलाह: संकोच या शर्म के कारण इलाज में देरी न करें। समय पर ली गई डॉक्टरी सलाह समस्या को गंभीर होने से बचा सकती है।
पाचन को दुरुस्त रखकर ही इन समस्याओं से स्थायी राहत पाई जा सकती है:
अगर गुदा से खून आना, तेज़ दर्द, गांठ, लगातार खुजली या स्राव जैसी कोई भी समस्या दो हफ्तों से ज़्यादा बनी रहे, तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय विशेषज्ञ से मिलना ज़रूरी है। यह भी ध्यान रखें कि हर रक्तस्राव सिर्फ पाइल्स का संकेत नहीं होता, कोलोरेक्टल कैंसर जैसी गंभीर स्थितियां भी शुरुआत में इसी तरह के लक्षण दिखा सकती हैं, इसलिए समय पर जांच ज़रूरी है।
बचाव के लिए फाइबर युक्त आहार, रोज़ाना पर्याप्त पानी, नियमित हल्की-फुल्की एक्सरसाइज़, मल त्याग के दौरान ज़ोर लगाने से बचना और लंबे समय तक शौचालय में न बैठना, ये आदतें बेहद कारगर साबित होती हैं। जयपुर स्थित हमारे अस्पताल में कोलोरेक्टल टीम ऐसे मरीज़ों के लिए पूरी गोपनीयता और संवेदनशीलता के साथ परामर्श देती है, ताकि किसी को भी झिझक के कारण इलाज में देरी न करनी पड़े और एक बेहतर जीवन जी सके।
फिशर और पाइल्स दोनों ही आम समस्याएं हैं, लेकिन शर्म के कारण इन्हें छुपाना समस्या को और बढ़ा सकता है। दोनों के लक्षण, कारण और इलाज अलग-अलग हैं, इसलिए सही पहचान होना बहुत ज़रूरी है। अगर आप या आपके परिवार में किसी को भी मल त्याग के दौरान दर्द, खून या असुविधा हो रही है, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें। सही समय पर सही सलाह लेकर इस समस्या से पूरी तरह छुटकारा पाया जा सकता है।
हां, फिशर में भी मल त्याग के दौरान हल्की मात्रा में चमकीला लाल खून आ सकता है, हालांकि इसकी मुख्य पहचान तेज़ दर्द है, न कि सिर्फ रक्तस्राव।
फिशर आमतौर पर पाइल्स से कहीं ज़्यादा तेज़ और चुभने वाला दर्द देता है, जबकि पाइल्स में दर्द अक्सर हल्का रहता है जब तक कि उसमें खून का थक्का न जम जाए।
हां, ज़्यादातर नए फिशर सही आहार, पानी, सिट्ज़ बाथ और दवाओं से चार से छह हफ्तों में बिना सर्जरी के ठीक हो जाते हैं। पुराने मामलों में ही सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है।
यह पाइल्स, फिशर या कभी-कभी अधिक गंभीर स्थितियों का संकेत हो सकता है, इसलिए सही कारण जानने के लिए विशेषज्ञ से जांच करवाना ज़रूरी है।
हां, दीर्घकालिक कब्ज और मल त्याग के दौरान बार-बार ज़ोर लगाना, इन दोनों समस्याओं का सबसे बड़ा और सबसे आम कारण माना जाता है।
हां, लंबे समय तक कब्ज रहने पर कुछ मरीज़ों में पाइल्स और फिशर एक साथ भी विकसित हो सकते हैं, ऐसे में इलाज दोनों स्थितियों को ध्यान में रखकर तय किया जाता है।
पाइल्स खुद कैंसर में नहीं बदलता, लेकिन इसके लक्षण कोलोरेक्टल कैंसर जैसे मिल सकते हैं, इसलिए लगातार रक्तस्राव होने पर जांच से पुष्टि करना ज़रूरी है।
हल्की एक्सरसाइज़ और सामान्य यात्रा में कोई खास दिक्कत नहीं होती, लेकिन भारी वज़न उठाने या तेज़ दौड़ने से बचना बेहतर है जब तक लक्षण पूरी तरह ठीक न हो जाएं।
Written and Verified by:

Dr. Mansimrat P Singh is a skilled surgeon specializing in General and Minimal Invasive Surgery with over 11 years of experience.
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