
आज भारत में हर तीसरा वयस्क किसी न किसी स्तर के फैटी लिवर से जूझ रहा है, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि ज्यादातर लोगों को इसका पता तब चलता है जब बीमारी पहले ही आगे बढ़ चुकी होती है। अगर आप भी सोच रहे हैं कि फैटी लिवर का इलाज टाला जा सकता है या यह अपने आप ठीक हो जाएगा, तो यह ब्लॉग आपके लिए है।
हम यहां विस्तार से समझेंगे कि इलाज न कराने पर फैटी लीवर के नुकसान क्या हो सकते हैं, और समय रहते सही कदम उठाकर आप कैसे इसे गंभीर बीमारी बनने से रोक सकते हैं। अगर आपकी हाल की रिपोर्ट में भी फैटी लिवर की पुष्टि हुई है, तो इसे हल्के में न लें, हमारे अनुभवी लिवर स्पेशलिस्ट से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और सही सलाह लें।
यदि आपको लगता है कि सिर्फ आपको ही फैटी लिवर है, तो आप अपने ऑफिस में कुछ लोगों से पूछें कि क्या आपको लिवर की कोई समस्या है। आप पाएंगे कि आप इस कड़ी में अकेले नहीं है, आपके साथ कम से कम 50-60% लोग हैं, जो फैटी लिवर की समस्या से ग्रस्त हैं।
फैटी लिवर तब होता है जब लिवर की कोशिकाओं में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है। एक स्वस्थ लिवर में थोड़ी बहुत चर्बी होना सामान्य है, लेकिन जब यह लिवर के वजन का 5 प्रतिशत से ज्यादा हो जाए, तो इसे फैटी लिवर डिजीज कहा जाता है। इसे मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा जाता है, अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (शराब की वजह से) और नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज या NAFLD (जो शराब न पीने वालों में भी हो सकता है)। दुनियाभर में करीब 25 प्रतिशत आबादी NAFLD से प्रभावित मानी जाती है, और भारत जैसे देशों में मोटापे और डायबिटीज के बढ़ते मामलों के साथ यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ रहा है।
इसे नजरअंदाज करना इसलिए खतरनाक है, क्योंकि लिवर एक ऐसा अंग है, जो शुरुआती नुकसान के बावजूद बिना किसी लक्षण के काम करता रहता है। यही वजह है कि इसे अक्सर "साइलेंट डिजीज" कहा जाता है, समस्या तभी सामने आती है, जब लिवर को होने वाला नुकसान काफी हद तक बढ़ चुका होता है।
अगर फैटी लिवर को अनदेखा किया जाए, तो यह नीचे बताए गए तरीकों से आपको प्रभावित कर सकता है -
राहत की बात यह है कि शुरुआती स्टेज में, जब सिर्फ फैट जमा हुआ हो और सिरोसिस तक नौबत न आई हो, सही इलाज और जीवनशैली में बदलाव से लिवर को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है। यही वजह है कि समय पर पहचान इतनी जरूरी है।

कुछ लोगों में फैटी लिवर के गंभीर होने और तेजी से बढ़ने का खतरा ज्यादा होता है:
क्योंकि शुरुआती फैटी लिवर के लक्षण अक्सर हल्के या न के बराबर होते हैं, जैसे थोड़ी थकान, पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में हल्की असहजता या कमजोरी, इसलिए सही जांच ही इसे पकड़ने का सबसे भरोसेमंद तरीका है। डॉक्टर आमतौर पर इन जांचों की सलाह देते हैं:
अगर आपको बार-बार थकान, पेट में भारीपन या बिना कारण वजन में बदलाव महसूस हो, खासकर अगर आप मोटापे या डायबिटीज से भी जूझ रहे हों, तो सालाना जांच में लिवर टेस्ट को जरूर शामिल करें।
यहां एक जरूरी सच्चाई समझ लेनी चाहिए, फिलहाल कोई ऐसी फैटी लिवर का रामबाण उपाय या फैटी लिवर का रामबाण इलाज मौजूद नहीं है जो एक झटके में सब कुछ ठीक कर दे। असली और सबसे भरोसेमंद इलाज है निरंतरता के साथ अपनाई गई जीवनशैली, और यह असल मायने में सबसे कारगर तरीका साबित होता है।
सीके बिरला अस्पताल, (RBH) जयपुर जैसे हमारे अस्पतालों में हेपेटोलॉजी और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विशेषज्ञों की टीम व्यक्तिगत जांच और डाइट प्लान के साथ मरीजों को सही दिशा दिखाने में मदद करती है।
फैटी लिवर को हल्के में लेना सबसे बड़ी भूल हो सकती है, क्योंकि यह चुपचाप बढ़ता है और समय रहते ध्यान न दिया जाए तो सिरोसिस, लिवर फेलियर या कैंसर तक पहुंच सकता है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि शुरुआती स्टेज में सही डाइट, वजन नियंत्रण और नियमित एक्सरसाइज से इसे न सिर्फ रोका जा सकता है, बल्कि काफी हद तक उलटा भी जा सकता है। अगर आपकी हाल की रिपोर्ट में फैटी लिवर की पुष्टि हुई है, या आपको इससे जुड़े कोई भी लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो इंतजार न करें। हमारे अनुभवी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और समय रहते अपने लिवर को एक नया और स्वस्थ जीवन दें।
हां, शुरुआती स्टेज में वजन घटाकर, सही डाइट अपनाकर और नियमित एक्सरसाइज करके बिना दवा के भी फैटी लिवर को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है। एडवांस स्टेज में डॉक्टर की सलाह जरूरी है।
हां, अगर फैटी लिवर लंबे समय तक अनदेखा रहे और यह सूजन, फाइब्रोसिस से होते हुए सिरोसिस तक पहुंच जाए, तो लिवर कैंसर (हेपेटोसेल्युलर कार्सिनोमा) का खतरा काफी बढ़ जाता है।
तला-भुना खाना, ज्यादा चीनी और मैदे से बनी चीजें, प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड, रेड मीट और शराब से बचना चाहिए, क्योंकि ये लिवर में फैट और सूजन बढ़ाते हैं।
हां, खासकर अगर लिवर में पहले से सूजन, फाइब्रोसिस या सिरोसिस के संकेत मिले हों, तो शराब पूरी तरह छोड़ना जरूरी हो जाता है, क्योंकि यह नुकसान को और तेजी से बढ़ा सकती है।
हां, अगर जीवनशैली में किए गए सुधार बीच में छोड़ दिए जाएं, वजन फिर से बढ़ जाए या डायबिटीज-कोलेस्ट्रॉल अनियंत्रित हो जाएं, तो फैटी लिवर दोबारा हो सकता है। निरंतरता बनाए रखना जरूरी है।
हां, लेकिन यह आमतौर पर एडवांस स्टेज यानी सिरोसिस में होता है, जिसे एसाइटिस कहा जाता है। शुरुआती फैटी लिवर में यह आमतौर पर नहीं होता, लेकिन इलाज में देरी से यह स्थिति बन सकती है
Written and Verified by:

Dr. Abhinav Sharma is the Director of Gastroenterology Dept. at CK Birla Hospital, Jaipur with over 16 years of experience. He specializes in advanced therapeutic GI endoscopic procedures and the treatment of complex gastrointestinal disorders.
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