
मानसून का मौसम आते ही घर के बड़े-बुजुर्ग एक बात जरूर दोहराते हैं, "पानी उबालकर पियो, बाहर का मत खाओ।" बचपन में यह सलाह बस एक नियम लगती थी, लेकिन असल में यह हमें एक ऐसी बीमारी से बचाती है जिसका नाम बहुत कम लोग जानते हैं, हेपेटाइटिस ई।
यह कोई नई बीमारी नहीं है, फिर भी इस पर बात कम होती है। शायद इसलिए क्योंकि ज्यादातर लोग इसे मामूली फूड पॉइजनिंग या पीलिया समझ कर टाल देते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि यह वायरस सीधे लिवर पर हमला करता है, और गर्भवती महिलाओं के लिए यह जानलेवा भी साबित हो सकता है।
अगर आपको या आपके परिवार में किसी को थकान, पीली आंखें, पेट दर्द या भूख न लगने जैसी शिकायत हो रही है, तो इसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। हमारे अस्पताल में लिवर और गैस्ट्रो विशेषज्ञों की अनुभवी टीम इस तरह के मामलों को समझने और समय रहते सही इलाज देने में माहिर है।
हेपेटाइटिस ई एक वायरल संक्रमण है, जो हेपेटाइटिस ई वायरस (HEV) की वजह से होता है और लिवर में सूजन पैदा करता है। यह वायरस मुख्य रूप से दूषित पानी के जरिए शरीर में प्रवेश करता है और मल-मूत्र मार्ग (fecal-oral route) से फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार हर साल दुनियाभर में करीब दो करोड़ लोग इस वायरस से संक्रमित होते हैं, जिनमें से लाखों लोगों में इसके लक्षण भी दिखाई देते हैं। दक्षिण एशिया में, जिसमें भारत भी शामिल है, यह संक्रमण खासतौर पर अधिक देखा जाता है, क्योंकि पानी की सफाई और सैनिटेशन से जुड़ी चुनौतियां अब भी बनी हुई है। भारत में हुए रिसर्च बताते हैं कि यहां लगभग हर चौथे व्यक्ति में इस वायरस के संपर्क में आने के निशान मिल सकते हैं, यानी यह हमारे आसपास सोचे से कहीं ज्यादा मौजूद है।
हेपेटाइटिस ई के फैलने का सबसे बड़ा कारण दूषित पानी है। जब सीवेज का पानी, पीने के पानी में मिल जाता है, खासकर बारिश के मौसम में या बाढ़ जैसी स्थितियों में, तब संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ते हैं। इसके अलावा कुछ और कारण भी इसके फैलने में भूमिका निभाते हैं -
यहां एक बात समझना जरूरी है: यह वायरस सामान्य सर्दी-जुकाम की तरह हवा से या छूने भर से नहीं फैलता। यही वजह है कि साफ पानी और स्वच्छता की आदतें इस बीमारी के खिलाफ सबसे मजबूत हथियार हैं।

हेपेटाइटिस ई के लक्षण अक्सर संक्रमण के दो से छह हफ्तों बाद दिखना शुरू होते हैं, और शुरुआत में यह किसी सामान्य वायरल बुखार जैसा ही लगता है। यही कारण है कि लोग अक्सर इसे शुरुआती दौर में पहचान नहीं पाते और घरेलू नुस्खों पर भरोसा करते रह जाते हैं। ध्यान देने वाले लक्षणों में शामिल हैं -
सही जांच से समय पर सही इलाज मिलता है। डॉक्टर आमतौर पर निम्न जांच की सलाह देते हैं -
गर्भवती महिलाओं, पहले से लिवर की बीमारी वाले मरीजों या गंभीर लक्षणों वाले मामलों में यह जांच और भी जरूरी हो जाती है, क्योंकि इनमें जटिलताओं का खतरा ज्यादा होता है।
हेपेटाइटिस ई के इलाज के बारे में सबसे पहली और राहत भरी बात यह है कि इसका कोई खास एंटीवायरल इलाज जरूरी नहीं होता, क्योंकि ज्यादातर स्वस्थ लोगों में शरीर खुद ही वायरस से लड़कर ठीक हो जाता है। इलाज का मुख्य फोकस लक्षणों को नियंत्रित करने और लिवर को आराम देने पर होता है -
लेकिन जिन मरीजों की इम्यूनिटी कमजोर है, जिन्हें पहले से लिवर की बीमारी है, या जो गर्भवती हैं, उनमें स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है और यह एक्यूट लिवर फेलियर तक पहुंच सकती है। ऐसे मामलों में अस्पताल में भर्ती होकर करीबी निगरानी और कभी-कभी एंटीवायरल दवा की जरूरत पड़ सकती है। यही कारण है कि लक्षण दिखते ही लिवर रोग विशेषज्ञ (हेपेटोलॉजिस्ट) से सलाह लेना सबसे सुरक्षित कदम है।
भारत में वयस्कों के लिए हेपेटाइटिस ई की वैक्सीन (HEV 239) को हाल ही में मंजूरी मिली है, जो 18 से 65 साल के लोगों में उपयोग के लिए स्वीकृत है। यह उन लोगों के लिए खासतौर पर फायदेमंद हो सकती है जो हाई-रिस्क क्षेत्रों में रहते हैं या काम करते हैं। वैक्सीन लेने से पहले अपने डॉक्टर से यह जरूर पूछें कि यह आपके लिए कितनी उपयुक्त है।
बचाव ही इस बीमारी के खिलाफ सबसे असरदार तरीका है, क्योंकि इसका फैलना ज्यादातर हमारी रोजमर्रा की आदतों पर निर्भर करता है।
रोजमर्रा में अपनाएं ये आदतें -
इन लोगों को रखनी चाहिए खास सावधानी:
एक दिलचस्प लेकिन जरूरी बात यह भी है कि लिवर की सेहत सीधे दिल की सेहत से भी जुड़ी होती है। जब लिवर लंबे समय तक तनाव में रहता है, तो शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर और इन्फ्लेमेशन (सूजन) बढ़ने लगती है, जिसका असर हृदय पर भी पड़ सकता है। इसलिए लिवर से जुड़ी किसी भी समस्या के साथ नियमित हार्ट चेकअप कराना भी समझदारी है, खासकर अगर परिवार में हृदय रोग का इतिहास रहा हो।
हेपेटाइटिस ई एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में जागरूकता की सबसे ज्यादा जरूरत है, क्योंकि इसके लक्षण अक्सर शुरुआत में नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। साफ पानी, स्वच्छता और समय पर जांच, इन तीन आदतों से इस बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है। अगर आपको या आपके किसी अपने को थकान, पीलापन या पेट दर्द जैसे लक्षण महसूस हों, तो इसे हल्के में न लें। हमारे अस्पताल में लिवर रोग विशेषज्ञों की अनुभवी टीम सही जांच और व्यक्तिगत इलाज योजना के साथ आपकी पूरी मदद के लिए मौजूद है।
आमतौर पर यह मुख्य रूप से दूषित पानी और भोजन से फैलता है। नजदीकी संपर्क से फैलने का खतरा कम है, लेकिन साफ-सफाई की कमी हो तो संक्रमित व्यक्ति से यह फैल सकता है।
हां, अगर समय पर इलाज न मिले तो कुछ मामलों में, खासकर गर्भवती महिलाओं या कमजोर इम्यूनिटी वालों में, यह एक्यूट लिवर फेलियर जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।
एक बार संक्रमण ठीक होने पर शरीर में एंटीबॉडी बनते हैं, जिससे दोबारा संक्रमण का खतरा कम हो जाता है, लेकिन कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में दोबारा संक्रमण की संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता।
हां, भारत में वयस्कों के लिए एक स्वदेशी वैक्सीन को हाल ही में मंजूरी मिली है। उपयुक्तता के लिए डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
आमतौर पर लिवर एंजाइम सामान्य होने तक, यानी कुछ हफ्तों से लेकर एक-दो महीने तक, डॉक्टर नियमित फॉलो-अप जांच की सलाह देते हैं।
हां, बच्चों को भी यह संक्रमण हो सकता है, हालांकि उनमें अक्सर लक्षण हल्के होते हैं। फिर भी लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
संक्रमण के दौरान साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखना जरूरी है। अलग बर्तन इस्तेमाल करना और हाथ धोने की आदत अपनाना संक्रमण फैलने का खतरा काफी कम कर देते हैं।
दोनों ही दूषित पानी और भोजन से फैलते हैं और लक्षण मिलते-जुलते हैं, लेकिन हेपेटाइटिस ई गर्भवती महिलाओं में अधिक गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है, जबकि हेपेटाइटिस ए के लिए बच्चों के लिए नियमित टीकाकरण/वैक्सीन उपलब्ध है।
Written and Verified by:

Dr. Abhinav Sharma is the Director of Gastroenterology Dept. at CK Birla Hospital, Jaipur with over 16 years of experience. He specializes in advanced therapeutic GI endoscopic procedures and the treatment of complex gastrointestinal disorders.
Similar Gastro Science Blogs
Book Your Appointment TODAY
© 2024 RBH Jaipur. All Rights Reserved.