
बदलते मौसम में प्रदूषण फेफड़ों, दिल और आंखों को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। PM 2.5 का खतरा कम करने के लिए N95 मास्क पहनें, घर में एयर प्यूरीफायर का उपयोग करें, और एंटीऑक्सीडेंट युक्त भोजन लें। इसके अतिरिक्त भी कई चीजें हैं, जो आपको जाननी चाहिए, जिसे आप इस ब्लॉग से पढ़ सकते हैं।
क्या बाहर निकलते ही आपकी आंखें बिना कारण लाल हो जाती हैं और गले में असहनीय जलन होने लगती है? अगर हां, तो यह सिर्फ मौसम में बदलाव का असर नहीं है, यह हमारे वातावरण में घुले बदलते मौसम में प्रदूषण के अदृश्य जहर का हमला है। हम सब मिलकर एक ऐसी हवा में साँस ले रहे हैं जो धीरे-धीरे हमारे जीवन को छीन रही है।
2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत, दुनिया की पांचवीं सबसे प्रदूषित जगह, और इस स्थिति में दिवाली के बाद वाले समय को हम आपात स्थिति भी कह सकते हैं। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि इस समय हवा में घुले PM2.5 के कण WHO की सुरक्षित सीमा से 10 गुना ज़्यादा होते हैं। यह केवल सरकारी आंकड़े नहीं हैं; यह हर उस माता-पिता की चिंता है, जो अपने बच्चे को खेलने के लिए बाहर भेजने से वर्तमान में डर रहे हैं।
हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं, वह अब हमारी फेफड़ों की सुरक्षा के तरीके, प्रदूषण से दिल की सुरक्षा, और यहाँ तक कि हमारी आँखों की रोशनी को भी खतरे में डाल रही है। इस ब्लॉग की मदद से आप अपनी आंखों के साथ-साथ अपने पूर्ण स्वास्थ्य को दुरुस्त रख सकते हैं। यदि आपको सांस लेने में दिक्कत हो रही है, या फिर सीने में दर्द इस मौसम में बढ़ता जा रहा है, तो तुरंत हमारे इंटरनल मेडिसिन के डॉक्टर से परामर्श लें और पता करें कि आपकी समस्या का समाधान क्या है।
वायु प्रदूषण केवल आपकी सांसों तक ही सीमित नहीं है; यह आपके शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों जैसे कि फेफड़ों और दिल को अंदर से खोखला कर रहा है। प्रदूषण से शरीर पर असर सबसे पहले फेफड़ों और हृदय प्रणाली पर दिखता है, खासकर जब मौसम में बदलाव होता है और ठंडी, स्थिर हवा प्रदूषकों को जमीन के करीब फंसा लेती है। चलिए प्रदूषण के सभी कारकों को एक-एक करके समझते हैं।
हवा में मौजूद सबसे खतरनाक प्रदूषक कण PM 2.5 यानि 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे कण होते हैं। यह इतने छोटे होते हैं कि साधारण सर्जिकल मास्क इन्हें रोक नहीं पाते हैं। यह कण जब सांस के साथ फेफड़ों में गहराई तक पहुंचते हैं, तो वहां सूजन (Inflammation) पैदा करते हैं। इससे भी ज्यादा खतरनाक बात यह है कि यह कण फेफड़ों की झिल्लियों को पार करके सीधे आपके रक्त प्रवाह (प्रदूषण से शरीर पर असर) में प्रवेश कर जाते हैं। एक बार खून में पहुंचने के बाद, यह पूरे शरीर में पहुंचकर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन को बढ़ाते हैं।
फेफड़े प्रदूषण के सीधे शिकार होते हैं। डॉ. राकेश गोदारा, एडिशनल डायरेक्टर – पल्मोनोलॉजी, CK बिरला हॉस्पिटल्स, जयपुर, कहते हैं कि, "अल्पकालिक प्रदूषण और ख़राब वायु गुणवत्ता COPD, अस्थमा और अन्य क्रोनिक सांस की समस्या के लक्षणों को और बदतर कर सकते हैं।"
प्रदूषण अब केवल फेफड़ों का ही नहीं, बल्कि हृदय रोग का भी एक प्रमुख कारण बन गया है।
हमारी आंखें वातावरण के सीधे संपर्क में होती हैं, और वायु प्रदूषण के प्रति सबसे संवेदनशील अंगों में से एक है। प्रदूषण केवल आंखों में जलन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह दृष्टि को भी लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है।
प्रदूषण का दीर्घकालिक संपर्क अधिक गंभीर नेत्र रोगों से जुड़ा हुआ है -
आंखों की देखभाल प्रदूषण में एक अनिवार्य दैनिक आदत बनानी चाहिए। अपनी आंखों की सुरक्षा के लिए, निम्नलिखित उपाय आप अपना सकते हैं -
आप खुद बाहर के प्रदूषण को कम नहीं कर सकते हैं, लेकिन आप कुछ उपायों को अपना सकते हैं, जिससे आपको बहुत मदद मिलेगी। चलिए सभी को एक-एक करके समझते हैं -
उपयों की शुरुआत AQI (Air Quality Index) को जानने से होती है।
डॉ. गोदारा सलाह देते हैं कि, प्रदूषित क्षेत्रों में एक्सपोज़र को सीमित करें, ट्रिगर से दूर रहें, और एक्यूट दवाएं जैसे कि इनहेलर और नेबुलाइजर घर पर तैयार रखें या बाहर निकलते समय अपने साथ रखें।
मौसम में बदलाव न केवल प्रदूषण को बढ़ाता है, बल्कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी चुनौती देता है। एंटीऑक्सीडेंट युक्त भोजन और सही जीवन शैली अपनाकर हम प्रदूषण से शरीर पर असर को कम कर सकते हैं।
बदलते मौसम में प्रदूषण के दौरान बाहर तेज़ गतिविधि वाले व्यायाम हानिकारक हो सकते हैं। इसके बजाय, इनडोर फेफड़ों के व्यायाम करें। अनुलोम-विलोम और मेडिटेशन को घर के अंदर ही करें, जिससे आपको लाभ मिल सकता है।
प्रदूषण से लड़ाई थोडी मुश्किल हो सकती है, लेकिन नामुमकिन नहीं है। इसके लिए नियमित स्वास्थ्य जांच और दीर्घकालिक प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
डॉ. अरूप हलदर के अनुसार, "विशेष रूप से छोटे बच्चे संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनके फेफड़े अभी भी विकसित हो रहे होते हैं।" ऐसे में बच्चों और बुजुर्गों को बचाना पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए। प्रदूषण के दौरान, बच्चों और बुजुर्गों को घर के अंदर ही रखें।
अस्थमा, COPD, या हृदय रोग वाले मरीजों के लिए, निर्धारित इनहेलर या दवाओं का पालन आवश्यक है। पहले से मौजूद फेफड़े या हृदय की समस्या वाले वयस्कों को थकान, ऑक्सीजन के स्तर में कमी, और क्रोनिक लक्षणों के बिगड़ने का अनुभव हो सकता है।
प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों का शुरुआती चरण में पता लगाने के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच अनिवार्य है। सबसे पहले डॉक्टर इस स्थिति में पलमोनरी फंक्शन टेस्ट (PFT) का सुझाव देते हैं, जिससे फेफड़ों की कार्यक्षमता को मापी जाती है। इसके अतिरिक्त ब्लड प्रेशर चेक किया जाता है।
वायु प्रदूषण अब एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि एक स्थायी स्वास्थ्य संकट बन चुका है, जो अक्सर त्योहारों के बाद एक विकराल रूप ले लेता है। हमने देखा है कि कैसे PM 2.5 का खतरा हमारे फेफड़ों, दिल और आंखों पर आक्रमण करता है। इस चुनौतीपूर्ण समय में, हमारा एकमात्र समाधान है, सतर्कता और सक्रिय उपाय जो आपको इस ब्लॉग में मिल जाएंगे।
हमारे विशेषज्ञ डॉक्टर आपकी किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधित सहायता के लिए उपलब्ध हैं, इसलिए किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर बिना देर किए हमारे डॉक्टरों से मिलें और इलाज के सभी विकल्पों पर विचार करें।
प्रदूषण से बच्चों में अस्थमा अटैक, बार-बार श्वसन संक्रमण (ब्रोंकाइटिस), निमोनिया और फेफड़ों के कार्य का कमज़ोर होना जैसी बीमारियां बढ़ सकती हैं।
यह हानिकारक है क्योंकि सुबह के समय प्रदूषण का स्तर (AQI) अक्सर सबसे ज्यादा होता है। इस दौरान, खासकर 200 से अधिक AQI पर, बाहर टहलने से बचना चाहिए।
विटामिन C (आँवला, नींबू), विटामिन E (नट्स), और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर एंटीऑक्सीडेंट युक्त भोजन प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर क्षति को कम करता है।
HEPA फिल्टर वाले एयर प्यूरीफायर PM 2.5 कणों को प्रभावी ढंग से हटाकर इनडोर हवा को शुद्ध करते हैं। अपनी कमरे की साइज के अनुसार सही CADR रेटिंग वाला मॉडल चुनें।
खिड़कियां बंद रखें, और स्नेक प्लांट (Sansevieria), एरेका पाम, पीस लिली और तुलसी जैसे पौधे लगाएं जो हवा से विषाक्त पदार्थों को फिल्टर करने में मदद करते हैं।
AQI हवा की गुणवत्ता मापने का एक इंडेक्स है (0-500+)। 300+ यानी 'बहुत ख़राब', जो स्वस्थ लोगों को भी प्रभावित करता है, और 400+ यानी 'गंभीर' (Severe), जो वर्तमान में कई शहरों का सामान्य AQI है। चलिए इसे टेबल से समझते हैं -
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AQI रेंज |
श्रेणी (रंग) |
स्वास्थ्य निहितार्थ |
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0-50 |
अच्छी (Good) |
न्यूनतम जोखिम। |
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51-100 |
संतोषजनक (Satisfactory) |
संवेदनशील लोगों को हल्की परेशानी। |
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101-200 |
मध्यम (Moderate) |
अस्थमा/हृदय रोगियों को बेचैनी। |
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201-300 |
ख़राब (Poor) |
अधिकांश लोगों को साँस की तकलीफ। |
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301-400 |
बहुत ख़राब (Very Poor) |
स्वस्थ लोगों को भी तकलीफ; गंभीर प्रभाव। |
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401-500+ |
गंभीर (Severe) |
हर व्यक्ति के लिए जोखिम; स्वास्थ्य आपातकाल। |
हाँ, PM 2.5 कण और गैस त्वचा में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे जलन, एलर्जी, खुजली और समय से पहले बुढ़ापा (Premature Aging) जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
हाँ, नींबू, शहद, और हल्दी में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। यह श्वसन मार्ग की सूजन को शांत करने और प्रतिरक्षा को बढ़ाने में सहायक होते हैं।
Written and Verified by:
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Dr. Rakesh Godara is Additional Director of Pulmonology Dept. at CK Birla Hospital, Jaipur with over 18 years of experience. He specializes in ARDS, bronchoscopic management of hemoptysis, central airway obstruction, endobronchial ultrasound, and medical thoracoscopy/pleuroscopy.
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