
हर महीने पीरियड्स के दौरान हल्का दर्द या भारीपन महसूस होना आम बात है, लेकिन जब यही दर्द असहनीय होने लगे, पैड बार-बार बदलने पड़े, और पेट का निचला भाग हमेशा भारी-भारी सा महसूस हो, तो यह सिर्फ "सामान्य पीरियड्स की परेशानी" नहीं होती। बहुत सी महिलाएं सालों तक इन लक्षणों को यह सोचकर नजरअंदाज करती रहती हैं कि "सबको ऐसा ही होता है," जबकि असल वजह बच्चेदानी में बनी एक गांठ हो सकती है।
अच्छी खबर यह है कि यूटेराइन फाइब्रॉयड आज के दौर की सबसे ज्यादा समझी जाने वाली और इलाज योग्य गायनेकोलॉजिकल स्थितियों में से एक है। सही जानकारी, समय पर जांच और सही विशेषज्ञ की सलाह से इसे बेहद असरदार तरीके से मैनेज किया जा सकता है। अगर आपको ही हेवी पीरियड्स, पेट में लगातार भारीपन या असामान्य दर्द महसूस हो रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें, जयपुर में सीके बिरला अस्पताल के अनुभवी गायनेकोलॉजी विशेषज्ञों से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और अपनी सेहत को लेकर स्पष्टता पाएं।
यूटेराइन फाइब्रॉयड, जिसे गर्भाशय में रसौली या बच्चेदानी में गांठ भी कहा जाता है, दरअसल गर्भाशय की मांसपेशियों की कोशिकाओं से बनने वाली एक कैंसर न करने वाली गांठ है। यह गर्भाशय की दीवार के अंदर, बाहर या भीतरी परत में बन सकती है, और आकार में यह चावल के दाने जितनी छोटी से लेकर तरबूज जितनी बड़ी भी हो सकती है। यह प्रजनन आयु की महिलाओं में बेहद आम समस्या है, रिसर्च के अनुसार कई महिलाओं में 50 साल की उम्र तक किसी न किसी रूप में फाइब्रॉयड विकसित हो जाता है और कई लोगों को तो इसका पता भी नहीं चलता है।
इसके होने की सटीक वजह अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन कुछ कारक इसके खतरे को बढ़ाते हैं जैसे कि -

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि लगभग 50-60% महिलाओं को इस स्थिति के कोई भी लक्षण नजर नहीं आते हैं, लेकिन इसका पता किसी सामान्य जांच के दौरान ही चलता है। हालांकि कुछ लक्षण हैं, जिनके दिखने पर आपको तुरंत डॉक्टरों से मिलना चाहिए जैसे कि -
गांठ को कब गंभीर माना जाए, यह इसके आकार, स्थान और लक्षणों की तीव्रता पर निर्भर करता है। अगर ब्लीडिंग इतनी ज्यादा हो कि रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, दर्द असहनीय हो जाए, या पेट में तेजी से बढ़ता हुआ द्रव्यमान महसूस हो, तो यह तुरंत विशेषज्ञ से मिलने का संकेत है।
जांच की प्रक्रिया आमतौर पर विस्तृत मेडिकल हिस्ट्री और पेल्विक जांच से शुरू होती है, इसके बाद जरूरत के अनुसार ये टेस्ट किए जाते हैं -
फाइब्रॉयड का इलाज हर महिला के लिए एक जैसा नहीं होता। यह गांठ के आकार, लक्षणों की गंभीरता, उम्र और भविष्य में गर्भधारण की इच्छा पर निर्भर करता है।
सही इलाज तय करने के लिए विशेषज्ञ से विस्तृत चर्चा जरूरी है, ताकि व्यक्तिगत आवश्यक्ताओं के अनुसार सबसे उपयुक्त रास्ता चुना जा सके।
यह सवाल अक्सर सबसे ज्यादा चिंता का कारण बनता है। सच यह है कि ज्यादातर महिलाएं फाइब्रॉयड के साथ भी बिना किसी परेशानी के गर्भधारण कर लेती हैं। लेकिन गांठ का आकार और स्थान कभी-कभी असर डाल सकता है, खासकर अगर गांठ गर्भाशय की भीतरी परत के करीब हो, तो यह भ्रूण के ठीक से जुड़ने में बाधा बन सकती है या गर्भावस्था के दौरान जटिलताएं बढ़ा सकती है। पीरियड्स पर असर भी आम है, भारी और अनियमित ब्लीडिंग फाइब्रॉयड का सबसे जाना-पहचाना लक्षण है।
अगर आप गर्भधारण की योजना बना रही हैं और आपको फाइब्रॉयड का पता चला है, तो घबराने की बजाय विशेषज्ञ से मिलकर यह समझना जरूरी है कि क्या इलाज की जरूरत है और कौन सा विकल्प आपकी फर्टिलिटी को सुरक्षित रखते हुए सबसे बेहतर रहेगा।
हालांकि फाइब्रॉयड को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन सही जीवनशैली इसके खतरे और लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित रख सकती है।
घरेलू उपाय जैसे हल्की एक्सरसाइज, स्ट्रेस मैनेजमेंट और वेट मैनेजमेंट फायदेमंद जरूर हैं, लेकिन इन्हें फाइब्रॉयड के मेडिकल इलाज का विकल्प नहीं समझना चाहिए। सही निगरानी और डॉक्टर की सलाह के साथ ही इन्हें अपनाना चाहिए।
ज्यादातर महिलाएं फाइब्रॉयड को सिर्फ एक गायनेकोलॉजिकल समस्या मानती हैं, लेकिन हाल ही में सामने आए रिसर्च इस सोच को चुनौती देते हैं। जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में पाया गया कि फाइब्रॉयड वाली महिलाओं में हृदय संबंधी बीमारियों, जैसे कोरोनरी आर्टरी डिजीज, स्ट्रोक और पेरिफेरल आर्टरी डिजीज का खतरा उन महिलाओं की तुलना में काफी अधिक था जिन्हें फाइब्रॉयड नहीं था। इसलिए इसे हल्के में न लें।
बच्चेदानी में गांठ एक बेहद सामान्य स्थिति है, और सही जानकारी के साथ इसे समझना डर की बजाय आत्मविश्वास बढ़ाने का काम करता है। हल्के लक्षणों को नजरअंदाज करने की बजाय समय पर जांच करवाना, सही आहार अपनाना और जरूरत पड़ने पर सही इलाज चुनना ही सबसे समझदारी भरा कदम है। अगर आप फाइब्रॉयड से जुड़े किसी भी लक्षण का सामना कर रहे हैं, तो देर न करें, सीके बिरला अस्पताल (RBH) के अनुभवी गायनेकोलॉजी विशेषज्ञों की टीम से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और पूरी सेहत का ध्यान एक साथ रखें।
यह बेहद दुर्लभ है। ज्यादातर फाइब्रॉयड कैंसर में परिवर्तित नहीं होते हैं। फिर भी तेजी से बढ़ती या असामान्य व्यवहार करती गांठ की जांच जरूर करवानी चाहिए।
अगर गांठ छोटी है और कोई लक्षण नहीं हैं, तो अक्सर सिर्फ नियमित निगरानी ही काफी होती है। इलाज की जरूरत लक्षणों और गांठ के बढ़ने पर निर्भर करती है।
हां, मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन का स्तर घटने से ज्यादातर फाइब्रॉयड सिकुड़ जाते हैं और लक्षण भी काफी हद तक कम हो जाते हैं।
अत्यधिक तला-भुना, प्रोसेस्ड भोजन, रेड मीट और अधिक कैफीन-शराब का सेवन सीमित करना बेहतर है, क्योंकि यह हार्मोनल असंतुलन और सूजन बढ़ा सकते हैं।
हां, अगर गांठ बड़ी हो और ब्लैडर पर दबाव डाले, तो बार-बार पेशाब आना या पूरी तरह ब्लैडर खाली न होने जैसा महसूस होना आम लक्षण है।
मायोमेक्टॉमी के बाद नए फाइब्रॉयड बनने की संभावना रहती है, खासकर कम उम्र की महिलाओं में। हिस्टेरेक्टॉमी के बाद दोबारा होने का खतरा नहीं रहता।
Written and Verified by:

Dr. C.P. Dadhich is the Director of Obstetrics and Gynecology Dept. at CK Birla Hospital, Jaipur, with over 25 years of experience. He specializes in high-risk pregnancy management, endo-gynecology, and radical hysterectomy.
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