
फेफड़ों पर धूम्रपान के प्रभाव को दो श्रेणियों में समझा जा सकता है। अस्थायी प्रभावों में श्वसन संक्रमण और आवाज में बदलाव प्रमुख हैं, जिन्हें शुरुआती चेतावनी माना जाना चाहिए। वहीं, इसके स्थायी परिणामों में फेफड़ों का कैंसर और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) शामिल हैं, जो फेफड़ों की कार्यक्षमता को पूरी तरह नष्ट कर सकते हैं।
क्या आप जानते हैं कि एक इंसान दिन में लगभग 20,000 बार सांस लेता है? हर एक सांस हमारे जीवन के लिए ईंधन का काम करता है। लेकिन, जरा सोचिए कि यदि इस ईंधन में धीमा जहर मिला दिया जाए तो क्या होगा?
धूम्रपान और आजकल की खराब हवा (Poor Air Quality) मिलकर ठीक यही काम कर रहे हैं। वह धीरे-धीरे हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग, फेफड़ों, को एक ऐसे रास्ते पर ले जा रहे हैं, जहां से लौटना बेहद मुश्किल हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के हाल के आंकड़ों के अनुसार, तंबाकू हर साल दुनिया भर में 80 लाख से अधिक लोगों की जान ले रहा है। इंसान इस प्रकार की मृत्यु के बाद एक आंकड़ा ही बन कर रह जाता है।
अक्सर लोग सोचते हैं, "मैं तो दिन में बस एक-दो सिगरेट पीता हूं, मुझे कुछ नहीं होगा," लेकिन हकीकत यह है कि स्मोकिंग से होने वाले नुकसान की शुरुआत पहली कश से ही हो जाती है। यह फेफड़ों की बीमारियों का गंभीर संकेत हो सकता है। हमारे विशेषज्ञ डॉक्टर्स आपकी मदद के लिए हमेशा तत्पर हैं, लेकिन उसके लिए आपको हमारे विशेषज्ञों से परामर्श लेना होगा।
जब आप सिगरेट के धुएं को अंदर खींचते हैं, तो आप केवल निकोटीन ही नहीं, बल्कि 7,000 से अधिक रसायनों को अपने शरीर में आमंत्रित कर रहे होते हैं। इनमें से कम से कम 69 रसायन ऐसे हैं, जो कैंसर का कारण बन सकते हैं।
फेफड़ों पर इसका असर तीन मुख्य चरणों में होता है:
आज के दौर में हम केवल सिगरेट के धुएं से ही नहीं जूझ रहे हैं, बल्कि खराब एयर क्वालिटी भी एक बड़ी चुनौती है। जब प्रदूषित हवा (जिसमें PM 2.5 कण होते हैं) और सिगरेट का धुआं मिलते हैं, तो यह फेफड़ों के लिए एक 'जहरीला कॉकटेल' बन जाता है।
प्रदूषण से पहले से ही कमजोर फेफड़े, सिगरेट के धुएं को झेलने में असमर्थ हो जाते हैं। इसलिए, यदि आप प्रदूषित शहर में रहते हैं, तो सिगरेट छोड़ना आपके लिए कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक मजबूरी बन जाता है। इसके अतिरिक्त खराब हवा से भी लड़ने के उपायों को खोजना पड़ता है।
शरीर हमेशा बीमारी के संकेत देता है, जरूरत है, उन्हें समय रहते पहचाना जाए। स्मोकिंग से होने वाले नुकसान अक्सर इन लक्षणों के रूप में सामने आते हैं -
आजकल युवाओं में ई-सिगरेट या वेपिंग (Vaping) का चलन बहुत बढ़ गया है। कई लोग इसे सिगरेट का सुरक्षित विकल्प मानते हैं, लेकिन रिसर्च बताते हैं कि यह धारणा गलत है। चलिए समझते हैं कि यह सुरक्षित विकल्प क्यों नहीं है -
याद रखें, धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, चाहे वह पारंपरिक सिगरेट हो, हुक्का हो या फिर फैंसी ई-सिगरेट।
ज्यादा स्मोकिंग के नुकसान केवल खांसी तक सीमित नहीं हैं। लंबे समय तक धूम्रपान कई जानलेवा बीमारियों को जन्म देता है -
यदि आप धूम्रपान करते हैं या आपने हाल ही में छोड़ दिया है, तो फेफड़ों की नियमित जांच करवाना अनिवार्य है। CMRI जैसे अस्पतालों में अत्याधुनिक तकनीक से यह जांचें की जाती हैं -
अच्छी खबर यह है कि मानव शरीर में खुद को ठीक करने की अद्भुत क्षमता होती है। जैसे ही आप आखिरी सिगरेट पीते हैं, रिकवरी शुरू हो जाती है। चलिए समझते हैं कि सिगरेट छोड़ने पर धीरे-धीरे क्या असर पड़ता है -
फेफड़ों को स्वस्थ रखने और डिटॉक्स (Detox) करने के लिए आप निम्नलिखित उपाय अपना सकते हैं -
सांस लेना जीवन का सबसे बुनियादी कार्य है। स्मोकिंग से होने वाले नुकसान केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहते, यह आपके पूरे शरीर को खोखला कर देते हैं। याद रखें, धूम्रपान छोड़ने की कोई उम्र नहीं होती। चाहे आपने 10 साल स्मोकिंग की हो या 40 साल, छोड़ने के बाद सेहत में सुधार निश्चित है।
आपके फेफड़े खुद को ठीक करने के लिए तैयार हैं, बस उन्हें एक मौका दीजिए। यदि आप स्मोकिंग छोड़ना चाहते हैं या फेफड़ों की बीमारियों के लक्षणों का सामना कर रहे हैं, तो आज ही CK Birla Hospitals (CMRI), कोलकाता में हमारे पल्मोनोलॉजी विभाग में संपर्क करें।
काफी हद तक सुधार होता है। सूजन कम होती है और सिलिया वापस आते हैं, लेकिन एल्वियोली (Emphysema) को हुआ नुकसान स्थायी हो सकता है। हालांकि, समय के साथ कैंसर का खतरा काफी कम हो जाता है।
जी हां, वेपिंग में मौजूद रसायन फेफड़ों में सूजन और 'पॉपकॉर्न लंग' जैसी गंभीर बीमारी पैदा कर सकते हैं। यह बिल्कुल भी सुरक्षित विकल्प नहीं है।
लगातार खांसी, सांस फूलना या सीने में दर्द होने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें। 'लो-डोज सीटी स्कैन' (Low-dose CT scan) शुरुआती जांच के लिए सबसे प्रभावी तरीका है।
बिल्कुल, इसे 'स्मोकर्स कफ' कहते हैं। यह क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस या COPD का शुरुआती लक्षण हो सकता है। इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
भारी धूम्रपान करने वालों (विशेषकर 50 वर्ष से अधिक) को साल में कम से कम एक बार फेफड़ों की स्क्रीनिंग करवानी चाहिए। डॉक्टर की सलाह अनिवार्य है।
जी हां, सेकंड हैंड स्मोक में भी 7000 से ज्यादा रसायन होते हैं। यह बच्चों और गैर-धूम्रपान करने वालों में अस्थमा, संक्रामक और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
Written and Verified by:

Dr. Raja Dhar is the Director & Head of Pulmonology Dept. at BM Birla Heart Hospital and CMRI Hospital, Kolkata, with over 27 years of experience. He specializes in interstitial lung disease, asthma & allergy, COPD, sleep medicine, advanced lung function services, interventional & diagnostic pulmonology, rare stroke & orphan lung diseases, and all disciplines of respiratory medicine.
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