
चाबी कहाँ है? ये किसी फेमस मूवी का डायलॉग नहीं है। यदि नाम याद रखने में समस्या होना या मीटिंग से निकलते समय रास्ता भूल जाने जैसी स्थितियाँ बार-बार बनती है, तो ये एक अनचाहे और अनकहे डर की तरफ इशारा कर सकता है और वह है - अल्जाइमर।
यह सवाल आज बहुत सारे घरों में चुपचाप पूछा जा रहा है, पर खुलकर बात कोई नहीं करता। भारत में उम्रदराज आबादी तेजी से बढ़ रही है, और उसी के साथ भूलने की बीमारी और डिमेंशिया से जुड़े मामलों में भी वृद्धि देखी जा रही है। सबसे मुश्किल बात यह है कि शुरुआती लक्षणों को अक्सर "उम्र का असर" समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि सही समय पर पहचान और इलाज से मरीज और परिवार दोनों की जिंदगी बेहतर बनाई जा सकती है। अगर आप या आपके घर में कोई बुजुर्ग बार-बार भूलने की शिकायत कर रहा है, तो इसे टालें नहीं। हमारे अनुभवी न्यूरोलॉजिस्ट से अभी अपॉइंटमेंट बुक करें और सही जांच के साथ इस चिंता को दूर करें।
सीधा जवाब है: नहीं। रोज की भागदौड़ में दिमाग पर काम, नींद की कमी, तनाव और लगातार मोबाइल स्क्रीन देखने का दबाव पड़ता रहता है। इसका सीधा असर याददाश्त पर पड़ता है। जब दिमाग एक साथ कई काम करने की कोशिश करता है, तो कुछ जानकारी ठीक से दर्ज ही नहीं हो पाती और थोड़ी देर के लिए भूल जाती है। यही वजह है कि "याददाश्त कमजोर होना" शब्द सुनते ही घबराने की ज़रूरत नहीं है।
असली फर्क इस बात में है कि भूली हुई चीज दोबारा याद आती है या नहीं। अगर आप कुछ भूलकर बाद में खुद-ब-खुद याद कर लेते हैं, तो यह सामान्य बात है। लेकिन अगर वही जानकारी दोबारा याद ही नहीं आती, आप एक ही सवाल बार-बार पूछते हैं या रोजमर्रा के काम जैसे बिल भरना, खाना बनाना या रास्ता पहचानना मुश्किल होने लगे, तो यह सिर्फ याददाश्त कमजोर होना नहीं बल्कि अल्जाइमर रोग के लक्षण की तरफ इशारा कर सकता है।
उम्र बढ़ने के साथ दिमाग की गति थोड़ी धीमी होना स्वाभाविक है। कभी-कभार नाम भूल जाना, चश्मा कहां रखा यह याद न आना, ये सामान्य उम्र से जुड़े बदलाव माने जाते हैं। ऐसे मामलों में व्यक्ति खुद अपनी भूल को पहचान लेता है और थोड़ी देर बाद उसे सुधार भी लेता है।
वहीं अल्जाइमर रोग के लक्षण इससे कहीं आगे जाते हैं। इसमें व्यक्ति को अपनी भूल का एहसास ही नहीं होता, वह जगह और समय को लेकर उलझन में रहने लगता है, फैसले लेने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है और रोजमर्रा के सामान्य काम भी चुनौतीपूर्ण लगने लगते हैं। एक आसान तरीका समझने का यह है कि सामान्य भूलने में जानकारी दिमाग में मौजूद रहती है, बस समय पर सामने नहीं आती, जबकि अल्जाइमर में मस्तिष्क की कोशिकाएं वाकई क्षतिग्रस्त होने लगती है, खासकर हिप्पोकैंपस नामक हिस्सा, जो सीखने और याद रखने का काम करता है।
अल्जाइमर एसोसिएशन द्वारा बताए गए इन 10 संकेतों को समझना हर परिवार के लिए जरूरी है, ताकि सही समय पर मदद ली जा सके -

यदि परिवार में किसी को इनमें से दो या तीन संकेत लगातार कई महीनों तक दिखें, तो इसे नजरअंदाज करने की बजाय न्यूरोलॉजिस्ट से मिलना बेहतर रहता है।
अल्जाइमर की पहचान के लिए कोई एक टेस्ट काफी नहीं होता, डॉक्टर कई तरीकों को मिलाकर तस्वीर साफ करते हैं। सबसे पहले मरीज़ और परिवार से विस्तार से बातचीत की जाती है, ताकि लक्षणों का पैटर्न समझा जा सके। इसके बाद कॉग्निटिव टेस्ट यानी याददाश्त, ध्यान और सोचने की क्षमता जांचने वाले सवाल पूछे जाते हैं।
अगर भूलने की समस्या इतनी बढ़ जाए कि रोज़ के काम, नौकरी या रिश्तों पर असर पड़ने लगे, तो देर न करें। खासकर तब जब परिवार के लोग खुद बदलाव महसूस करने लगें, भले ही मरीज को खुद इसका एहसास न हो। बार-बार रास्ता भूलना, पैसों के हिसाब में गड़बड़ी करना, जानी-पहचानी चीजों को पहचानने में दिक्कत होना या अचानक स्वभाव में बदलाव आना, ये सभी संकेत हैं कि अब विशेषज्ञ की राय लेने का समय आ गया है।
याददाश्त कमजोर होने का कारण हमेशा अल्जाइमर नहीं होता, कई बार यह नींद की कमी, डिप्रेशन, विटामिन की कमी या थायराइड जैसी वजहों से भी होता है, और इनका इलाज संभव है। यही वजह है कि सही जांच के बिना खुद से कोई नतीजा निकालना ठीक नहीं। जितनी जल्दी सही वजह पता चलेगी, इलाज की दिशा भी उतनी ही साफ होगी।
बार-बार चीजें भूलना डरावना लग सकता है, लेकिन हर बार इसका मतलब अल्जाइमर नहीं होता। ज्यादातर मामलों में यह तनाव, नींद की कमी या जीवनशैली से जुड़ा होता है, जिसे सुधारा जा सकता है। फिर भी अगर ऊपर बताए गए 10 चेतावनी संकेतों में से कुछ लगातार दिखें और रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित होने लगे, तो इसे नजरअंदाज करना सही नहीं। सही समय पर न्यूरोलॉजिस्ट से मिलना, जरूरी जांच कराना और दिल व दिमाग दोनों की सेहत का ध्यान रखना मरीज और परिवार दोनों के लिए बेहतर भविष्य की नींव रखता है। यह विषय भले ही घरों में खुलकर न बोला जाता हो, पर जागरूकता ही इस चुप्पी को तोड़ने का पहला कदम है।
हां, थोड़ी-बहुत भूलने की समस्या उम्र के साथ सामान्य है। जैसे नाम या चीजें रखने की जगह भूल जाना, बशर्ते बाद में याद आ जाए और रोजमर्रा के काम प्रभावित न हों।
यह एक चेतावनी संकेत हो सकता है, खासकर जब यह बार-बार हो और व्यक्ति को याद न रहे कि उसने पहले भी वही सवाल पूछा था। ऐसे में डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है।
हाँ, लगातार तनाव दिमाग पर दबाव डालता है जिससे ध्यान केंद्रित करना और चीज़ें याद रखना मुश्किल हो जाता है। यह अस्थायी होता है और तनाव कम होने पर सुधर सकता है।
बिल्कुल, नींद के दौरान दिमाग दिनभर की जानकारी को व्यवस्थित करता है। पूरी नींद न लेने से यह प्रक्रिया बाधित होती है और याददाश्त कमजोर होने लगती है।
हाँ, विटामिन बी12 की कमी नसों और दिमाग के कामकाज को प्रभावित करती है, जिससे याददाश्त कमजोर होना, थकान और भ्रम जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ब्लड टेस्ट से इसका पता चल सकता है।
याददाश्त से जुड़ी समस्या के लिए न्यूरोलॉजिस्ट सबसे उपयुक्त विशेषज्ञ है। ज़रूरत पड़ने पर वे मनोचिकित्सक या जेरिएट्रिक विशेषज्ञ की भी सलाह दे सकते हैं।
ओमेगा-3 युक्त मछली, हरी पत्तेदार सब्जियां, अखरोट, बेरीज और साबुत अनाज दिमाग की सेहत के लिए फायदेमंद माने जाते हैं। साथ ही पानी और नींद पूरी लेना भी ज़रूरी है।
हाँ, हाई बीपी, कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज़ जैसी हृदय संबंधी समस्याएं दिमाग तक खून की सप्लाई कम करती हैं, जिससे अल्जाइमर और डिमेंशिया का खतरा बढ़ जाता है।
Written and Verified by:

Prof. Dr. Pahari Ghosh is a Senior Consultant Neurologist in the Neuro Sciences Department at CMRI, Kolkata with over 40 years of experience. He specializes in general neurology, stroke, multiple sclerosis, and epilepsy.
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