
घर के किसी बुज़ुर्ग सदस्य का अचानक गिर जाना और फिर उठ न पाना — यह सिर्फ एक हादसा नहीं, अक्सर यह एक खामोश बीमारी का नतीजा होता है जिसे हम नज़रअंदाज़ करते रहते हैं। भारत में 65 वर्ष से अधिक उम्र के 76% बुज़ुर्ग ऑस्टियोपोरोसिस से पीड़ित हैं — और उनमें से अधिकांश को इसका पता तब चलता है जब हड्डी टूट चुकी होती है।
कल्पना कीजिए, आपके घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य, जो कल तक अपनी छड़ी के सहारे मुस्कुराते हुए पूरे घर में टहलते थे, आज अचानक एक मामूली सी फिसलन के कारण बिस्तर पर असहाय पड़े हैं। उनके चेहरे का वह दर्द और आंखों में फिर से न चल पाने का डर किसी भी परिवार को तोड़ सकता है। बुज़ुर्गों में कूल्हे की हड्डी टूटना सिर्फ एक मेडिकल इमरजेंसी नहीं है, बल्कि यह उनकी आजादी और गरिमा पर भी एक प्रहार है।
अक्सर परिवार इसे उम्र का तकाज़ा मानकर टालने की कोशिश करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिप फ्रैक्चर का इलाज में देरी करना उनके जीवन के लिए कितना "महंगा" (Costly) साबित हो सकता है? आंकड़े बताते हैं कि हिप फ्रैक्चर के बाद अगर सही समय पर चिकित्सा सहायता न मिले, तो यह जानलेवा भी हो सकता है। आज इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि बुजुर्गों में हिप फ्रैक्चर क्यों होता है, इसके शुरुआती लक्षण क्या है और आधुनिक चिकित्सा तकनीक कैसे उन्हें फिर से अपने पैरों पर खड़ा कर सकती हैं। यदि आपके परिवार में कोई भी हिप फ्रैक्चर जैसी समस्या का सामना कर रहा है, तो हम आपको सलाह देंगे कि बिना देर किए हमारे अनुभवी हड्डी रोग विशेषज्ञ से परामर्श लें और तुरंत इलाज लें।
तकनीकी भाषा में कहें तो, कूल्हे की हड्डी का फ्रैक्चर वह स्थिति है जब जांघ की हड्डी (Femur) का ऊपरी हिस्सा टूट जाता है। यह टूटना या तो हड्डी की गर्दन (Neck of Femur) में हो सकता है। यह फ्रैक्चर उस भाग के नीचे के हिस्से में भी हो सकता है।
बुज़ुर्गों में यह समस्या इसलिए भी जटिल हो जाती है, क्योंकि उनकी हड्डियां समय के साथ कमजोर हो जाती हैं और उन्हें ज्यादा केयर की ज़रूरत होती है। कूल्हे की हड्डी टूटने और हिप फ्रैक्चर होने पर मरीज के लिए खड़ा होना या पैर पर वजन डालना लगभग असंभव हो जाता है, इसलिए इसका इलाज बहुत आवश्यक है।
बुज़ुर्गों में हड्डियों का स्वास्थ्य कई कारकों पर निर्भर करता है। यहां कुछ प्रमुख कारण दिए गए हैं जिनकी वजह से बुजुर्गों में हड्डी टूटती है -
कई बार लोग इसे सामान्य मोच या मांसपेशियों का दर्द समझ लेते हैं, लेकिन हिप फ्रैक्चर के लक्षण काफी विशिष्ट होते हैं जैसे कि -
जब आप मरीज को अस्पताल लाते हैं, तो विशेषज्ञ डॉक्टर सबसे पहले शारीरिक परीक्षण करते हैं। इसके बाद निम्नलिखित जांच की जाती हैं -
हिप फ्रैक्चर का इलाज पूरी तरह से मरीज की उम्र, स्वास्थ्य और फ्रैक्चर के प्रकार पर निर्भर करता है। सीके बिरला अस्पताल, जयपुर (RBH) जैसे संस्थानों में इसके लिए आधुनिकतम तकनीकें उपलब्ध हैं -
ज्यादातर मामलों में सर्जरी ही एकमात्र विकल्प होती है ताकि मरीज को लंबे समय तक बिस्तर पर रहने से बचाया जा सके।
यह केवल उन मरीजों के लिए है, जिनकी मेडिकल स्थिति बहुत ज्यादा खराब है और वे सर्जरी सहन नहीं कर सकते। हालांकि, इसमें जटिलताओं का खतरा बहुत अधिक होता है।
एक रिसर्च के अनुसार, चोट लगने के 48 घंटों के भीतर सर्जरी होने से रिकवरी की संभावना 11% तक बढ़ जाती है और जटिलताएं कम हो जाती हैं।
यह एक आम सवाल है कि कूल्हे की हड्डी कितने दिन में जुड़ती है? आमतौर पर सर्जरी के बाद बुजुर्गों में हड्डियों को पूरी तरह जुड़ने में 12 से 24 हफ्ते का समय लग सकते हैं। हालांकि, आधुनिक सर्जरी के बाद मरीज को दूसरे या तीसरे दिन से ही वॉकर की मदद से चलाने की कोशिश शुरू कर दी जाती है।
बचाव ही इलाज का सबसे प्राथमिक और प्रारंभिक रूप है। निम्न बचाव के उपाय आपके लिए कारगर साबित हो सकते हैं -
बुज़ुर्गों में कूल्हे की हड्डी का फ्रैक्चर एक गंभीर स्थिति है, लेकिन सही समय पर लिया गया फैसला उनकी जिंदगी बचा सकता है। यदि आपके घर में किसी बड़े को कूल्हे में दर्द की शिकायत है या वे गिर गए हैं, तो इसे नजरअंदाज न करें। हिप फ्रैक्चर के लक्षण पहचानें और तुरंत आरबीएच (RBH) के ऑर्थोपेडिक सर्जन से परामर्श लें और इस समस्या को हमेशा के लिए अलविदा करें। याद रखिए, उनकी गतिशीलता ही उनके सुखद जीवन का आधार है।
हां, ऑस्टियोपोरोसिस के कारण बुजुर्गों की हड्डियां इतनी कमजोर हो जाती हैं कि बिस्तर से उतरते समय या बाथरूम में हल्का सा फिसलने (Low-energy falls) पर भी हिप फ्रैक्चर हो सकता है।
लगभग सभी मामलों में सर्जरी जरूरी है। बिना सर्जरी के मरीज बेड पर रहता है, जिससे निमोनिया, बेडसोर्स (Bedsores) और पैरों में खून के थक्के (DVT) जमने जैसे जानलेवा जोखिम बढ़ जाते हैं।
आधुनिक सर्जरी के बाद मरीज को अगले 24 से 48 घंटों में वॉकर के सहारे खड़ा किया जा सकता है। पूरी तरह से बिना सहारे के चलने में मरीज की रिकवरी के अनुसार 3 से 6 महीने लग सकते हैं।
बिल्कुल, कैल्शियम हड्डियों की संरचना बनाता है और विटामिन D उसे सोखने में मदद करता है। बुजुर्गों को नियमित रूप से इनका सेवन करना चाहिए ताकि हड्डियों का घनत्व बना रहे।
फिजियोथेरेपी मांसपेशियों को मजबूत बनाने, जोड़ों की जकड़न कम करने और मरीज का आत्मविश्वास वापस लाने के लिए अनिवार्य है। इसके बिना पुरानी गतिशीलता पाना मुश्किल होता है।
भारत में इसका खर्च अस्पताल और इंप्लांट की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। औसतन यह 2.5 लाख से 4 लाख रुपये के बीच हो सकता है। सटीक जानकारी के लिए आप हमारे अनुभवी विशेषज्ञों से परामर्श लें सकते हैं। वह आपकी स्थिति और व्यक्तिगत पसंद के अनुसार सटीक खर्च के बारे में बता सकते हैं।
Written and Verified by:

Dr. Aashish K. Sharma is the Director of Orthopaedics & Joint Replacement Dept. at CK Birla Hospital, Jaipur, with nearly 30 years of experience. He is a leading specialist in joint replacement, arthroscopy and sports medicine, particularly hip & knee surgeries and ACL reconstructions.
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