5 संकेत जो बताते हैं कि आपके शिशु को चाहिए स्पेशल हार्ट स्कैन
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5 संकेत जो बताते हैं कि आपके शिशु को चाहिए स्पेशल हार्ट स्कैन

Summary

  • नवजात की हर हरकत पर नजर रखें; थकान और सांस फूलना सामान्य नहीं हैं।
  • हार्ट स्कैन और हृदय परीक्षण जटिलताओं को रोकने के सबसे प्रभावी तरीके हैं।
  • लक्षणों के दिखने का इंतजार न करें; उच्च जोखिम वाले मामलों में गर्भावस्था के दौरान ही फीटल इको टेस्ट कराएं।
  • यदि नवजात शिशु की त्वचा नीली पड़ रही है, उसे सांस लेने में अत्यधिक मेहनत करनी पड़ रही है या दूध पीते समय वह बहुत जल्दी थक जाता है, तो यह बच्चों में दिल की बीमारी का संकेत हो सकता है।
  • आधुनिक चिकित्सा पद्धति से बच्चों में दिल की बीमारी का सफल उपचार संभव है, बशर्ते पहचान समय पर हो।

एक छोटे बच्चे की किलकारी आपके परिवार को खुशियों में सराबोर कर सकती है। लेकिन कभी-कभी, इस खुशी के बीच कुछ ऐसी बारीक आहटें छिपी होती हैं, जिन्हें पहचानना बेहद जरूरी होता है। क्या आपने कभी गौर किया है कि आपका बच्चा दूध पीते हुए बहुत जल्दी थक तो नहीं जाता? क्या उसकी सांसें बाकी बच्चों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही तेज चलती हैं?

दिल की धड़कन ही जीवन का आधार है, और जब बात एक नवजात की हो, तो यह और भी संवेदनशील हो जाती है। ऊपर बताए गए लक्षण जन्मजात हृदय रोग (Congenital Heart Disease) की तरफ इशारा कर सकते हैं, जिसके साथ कई बच्चे जन्म लेते हैं। लेकिन अच्छी खबर यह है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, विशेषकर हार्ट स्कैन और एडवांस हार्ट टेस्ट की मदद से, अब इन समस्याओं का समाधान समय रहते संभव है। इस ब्लॉग में हम गहराई से समझेंगे कि वह कौन से लक्षण हैं, जिन्हें आपको कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, ताकि आपके बच्चे का नन्हा दिल हमेशा सुरक्षित रहे। यदि कोई समस्या दिखे तो बिना देर किए बाल हृदय रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।

शिशुओं के लिए स्पेशल हार्ट स्कैन क्या होता है?

जब हम 'स्पेशल हार्ट स्कैन' की बात करते हैं, तो मुख्य रूप से हमारा अर्थ 'इकोकार्डियोग्राम' (Echocardiogram) या गर्भावस्था के दौरान किए जाने वाले फीटल इको टेस्ट से होता है। यह साधारण अल्ट्रासाउंड से कहीं अधिक एडवांस होता है। यह एक ऐसी इमेजिंग तकनीक है, जो ध्वनि तरंगों (Sound waves) का उपयोग करके बच्चे के दिल की संरचना और उसके काम करने के तरीके की स्पष्ट तस्वीर दिखाता है।

सी.के. बिरला हॉस्पिटल (BM Birla) के विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में दिल की बीमारी का पता लगाने के लिए यह सबसे सटीक तरीका है। यह स्कैन डॉक्टर को यह देखने में मदद करता है कि दिल के वाल्व सही तरह से खुल रहे हैं या नहीं, रक्त का प्रवाह सही दिशा में है या कहीं बच्चे के दिल में छेद के लक्षण तो नजर नहीं आ रहे हैं। यदि प्रेगनेंसी के 18वें से 24वें सप्ताह के बीच हार्ट जांच की जाए, तो जन्म से पहले ही कई जटिलताओं को सुलझाया जा सकता है।

5 संकेत जो बताते हैं कि आपके शिशु को इलाज की आवश्यकता है

इन 5 मुख्य लक्षणों को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए - 

  1. तेज़ सांस लेना (Tachypnea): यदि नवजात शिशु के दिल की धड़कन और सांस लेने की गति सामान्य से अधिक है या सांस लेते समय उसकी पसलियां अंदर धंस रही हैं, तो यह बच्चों में दिल की बीमारी का संकेत हो सकता है।
  2. त्वचा या होंठों का नीला पड़ना (Cyanosis): रोते या दूध पीते समय यदि शिशु के होंठ, जीभ या नाखून नीले पड़ने लगे, तो यह रक्त में ऑक्सीजन की कमी दर्शाता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर तुरंत हार्ट स्कैन की सलाह देते हैं।
  3. दूध पीने में कठिनाई और कम वजन: यदि बच्चा दूध पीते समय बहुत जल्दी थक जाता है या उसका वजन उम्र के अनुसार नहीं बढ़ रहा, तो यह बच्चे के दिल में छेद के लक्षण हो सकते हैं। हृदय पर अधिक दबाव होने के कारण बच्चा शारीरिक विकास के लिए ऊर्जा नहीं बचा पाता।
  4. अत्यधिक पसीना आना: सोते समय या विशेष रूप से फीडिंग के दौरान यदि शिशु के माथे पर बहुत अधिक पसीना आता है, तो यह संकेत है कि उसके दिल को रक्त पंप करने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है।
  5. बार-बार छाती में संक्रमण: जिन बच्चों को बार-बार निमोनिया या सर्दी-खांसी की शिकायत रहती है, उनके लिए हृदय परीक्षण जरूरी है। अक्सर फेफड़ों में बार-बार होने वाला संक्रमण दिल की किसी अंतर्निहित समस्या से जुड़ा हो सकता है।

गर्भावस्था के दौरान जोखिम कारक: कब पहले से सतर्क रहें?

कभी-कभी लक्षण जन्म के बाद दिखते हैं, लेकिन कुछ जोखिम कारक प्रेगनेंसी के दौरान ही यह संकेत दे देते हैं कि शिशु को फीटल इको टेस्ट की आवश्यकता हो सकती है। एक बड़ी रिसर्च फर्म के रिसर्च और आंकड़ों के अनुसार, यदि नीचे दी गई स्थितियां हैं, तो विशेष सावधानी बरतनी चाहिए जैसे कि - 

  • फैमिली हिस्ट्री: यदि परिवार में पहले किसी को जन्मजात हृदय रोग रहा हो, तो आपका बच्चा इसके जोखिम दायरे में आता है।
  • मैटरनल डायबिटीज: यदि मां को गर्भावस्था के दौरान अनियंत्रित शुगर की समस्या है।
  • IVF प्रेगनेंसी: IVF गर्भाधान के मामलों में हृदय संबंधी बारीकियों की जांच अक्सर जरूरी होती है।
  • दवाओं का प्रभाव: गर्भावस्था के दौरान कुछ विशेष दवाओं का सेवन भी शिशु के हृदय विकास को प्रभावित कर सकता है।

सी.के. बिरला हॉस्पिटल्स में उपलब्ध एडवांस डायग्नोस्टिक सुविधाएं ऐसे मामलों में शुरुआती पहचान (Early Diagnosis) में मदद करती हैं, जो सफल इलाज के लिए बहुत ज़रूरी है। आपको समझना होगा कि जन्मजात हृदय रोगों (CHD) के समय पर इलाज से 90% से अधिक बच्चों को पूरी तरह स्वस्थ किया जा सकता है। देरी केवल जानकारी के अभाव में होती है। इसीलिए बच्चों में दिल की बीमारी को लेकर जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।

कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है?

यदि आपको ऊपर बताए गए संकेतों में से एक भी नज़र आता है, तो इंतजार करने की बजाए जल्द से जल्द कदम उठाएं। निम्नलिखित स्थितियों में तुरंत बाल हृदय रोग विशेषज्ञ (Pediatric Cardiologist) से संपर्क करें - 

  • यदि बच्चे की छाती से असामान्य आवाज (Heart Murmur) सुनाई दे।
  • यदि बच्चा बार-बार छाती के संक्रमण (Pneumonia) का शिकार हो रहा हो।
  • यदि खेलकूद के दौरान बच्चा बहुत जल्दी नीला पड़ जाता है या बेहोश होने लगता है।
  • समय पर किया गया हृदय परीक्षण न केवल बच्चे की जान बचा सकता है, बल्कि उसे भविष्य की जटिल सर्जरी से भी बचा सकता है।

निष्कर्ष

आपके बच्चे का स्वास्थ्य आपकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। बच्चों में दिल की बीमारी का नाम सुनकर घबराना स्वाभाविक है, लेकिन आज की तकनीक और विशेषज्ञों की टीम के साथ, यह अब कोई लाइलाज समस्या नहीं रही। हार्ट स्कैन, हार्ट जांच, और फीटल इको टेस्ट जैसे उपकरण माता-पिता को वह मानसिक शांति देते हैं, जिसकी उन्हें जरूरत होती है।

याद रखें, एक जागरूक माता-पिता ही बच्चे का सबसे अच्छा रक्षक होता है। यदि आप अपने शिशु में कोई भी असामान्य लक्षण देखते हैं, तो विशेषज्ञों से परामर्श लें। सी.के. बिड़ला हॉस्पिटल्स (BM Birla Hospital) जैसे संस्थानों में न केवल आधुनिक तकनीक उपलब्ध है, बल्कि वहां का मानवीय दृष्टिकोण और मरीजों की देखभाल का अनुभव आपकी इस कठिन यात्रा को आसान बना सकता है।

अपने बच्चे के नन्हे दिल को सुरक्षा का कवच दें और उसे एक स्वस्थ कल की ओर ले जाएं।

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न

फीटल इकोकार्डियोग्राफी टेस्ट क्या होता है?

यह एक विशेष अल्ट्रासाउंड है, जो गर्भ में पल रहे शिशु के दिल की संरचना और कार्यप्रणाली की जांच करता है। यह साधारण स्कैन से अधिक विस्तृत होता है और हृदय दोषों की सटीक पहचान करता है।

गर्भ में बच्चे का हार्ट स्कैन कब किया जाता है?

आमतौर पर यह स्कैन गर्भावस्था के 18वें से 24वें सप्ताह के बीच किया जाता है। यदि मां को डायबिटीज है या परिवार में दिल की बीमारी का इतिहास है, तो डॉक्टर इसे अनिवार्य बताते हैं।

क्या सभी नवजात शिशुओं को हार्ट स्कैन की जरूरत होती है?

नहीं, सभी को इसकी जरूरत नहीं होती। लेकिन यदि डॉक्टर को दिल की धड़कन में कोई असामान्यता महसूस होती है या बच्चा नीला पड़ रहा है, तो इसकी सलाह दी जाती है।

नवजात में नीला पड़ना क्या दिल की समस्या का संकेत हो सकता है?

हां, इसे सायनोसिस कहते हैं। यह रक्त में ऑक्सीजन की कमी को दर्शाता है, जो अक्सर दिल में छेद या रक्त वाहिकाओं की गड़बड़ी के कारण होता है।

शिशु के दिल की जांच कब करानी चाहिए?

यदि शिशु को सांस लेने में दिक्कत हो, वह दूध पीते समय बहुत थकता हो, या उसका वजन ठीक से न बढ़ रहा हो, तो तुरंत जांच करानी चाहिए।

क्या दिल में छेद का इलाज बिना सर्जरी संभव है?

आजकल कई तरह के छेद (जैसे ASD/VSD) को 'हार्ट स्कैन' की मदद से पहचान कर कैथेटर आधारित तकनीक (बिना चीरा लगाए) से बंद किया जा सकता है, जो बहुत सुरक्षित है।

Written and Verified by:

Dr. Madhurima Ghosh

Dr. Madhurima Ghosh

Associate Consultant Exp: 3 Yr

Paediatric Cardiology

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Dr. Madhurima Ghosh specializes in complex congenital cardiac malformations and trans-catheter cardiac interventions in children. Awarded the Presidential Gold Medal in Paediatric Cardiology and certified by Sick Kids, Toronto.

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