
क्या आपको भी दोपहर के खाने के बाद अचानक नींद और सुस्ती घेर लेती है? क्या पेट के आसपास की चर्बी कम होने का नाम नहीं लेती, जबकि आप खान-पान पर ध्यान देने की कोशिश कर रहे हैं? बहुत लोग इसे "काम का स्ट्रेस" या "उम्र का असर" मानकर टाल देते हैं। लेकिन कई बार इसके पीछे एक खामोश समस्या होती है, जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं, और यह अक्सर डायबिटीज से सालों पहले शुरू हो जाती है।
अच्छी बात यह है कि शुरुआती दौर में इसे संभालना संभव है। अगर आपको ऐसे संकेत दिख रहे हैं, तो इंतजार न करें। सीके बिरला अस्पताल (CMRI) के अनुभवी विशेषज्ञ से अपॉइंटमेंट बुक करें और अपनी सेहत की सही तस्वीर जानें।
खाना खाने के बाद हमारा शरीर कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज (शुगर) में बदलता है, जो खून में पहुंचता है। तब पैंक्रियास (अग्न्याशय) इंसुलिन नाम का हार्मोन बनाता है। इंसुलिन को आप एक चाबी समझ सकते हैं, जो कोशिकाओं का दरवाजा खोलती है, ताकि ग्लूकोज अंदर जाकर ऊर्जा बन सके।
इंसुलिन सेंसिटिविटी का मतलब है कि यह दरवाजा कितनी आसानी से खुलता है। जब सेंसिटिविटी अच्छी होती है, तो थोड़े से इंसुलिन में ही शुगर कोशिकाओं में चली जाती है और ब्लड शुगर संतुलित रहता है। यही वजह है कि यह ऊर्जा, वजन, हार्मोन संतुलन और दिल की सेहत के लिए जरूरी है।
जब कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति "सुस्त" पड़ जाती हैं, तो शुगर अंदर नहीं जा पाती और खून में जमा होने लगती है। तब पैंक्रियास पर दबाव पड़ता है और वह और ज्यादा इंसुलिन बनाने लगता है। कुछ समय तक यह तरीका काम करता है, इसलिए रिपोर्ट सामान्य दिख सकती है। लेकिन सालों तक ऐसा चलने पर पैंक्रियास थक जाता है, ब्लड शुगर बढ़ने लगता है और प्रीडायबिटीज या टाइप 2 डायबिटीज सामने आती है।
भारत में यह चिंता और बड़ी है। ICMR-INDIAB रिसर्च (The Lancet Diabetes & Endocrinology, 2023) के अनुसार देश में लगभग 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज और करीब 13 करोड़ से ज्यादा लोग प्रीडायबिटीज के साथ जी रहे हैं। CDC के अनुसार प्रीडायबिटीज वाले ज्यादातर लोगों को अपनी स्थिति की जानकारी ही नहीं होती।

इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण एक नहीं, कई होते हैं और अक्सर एक साथ काम करते हैं -
इंसुलिन सेंसिटिविटी कम होने के लक्षण शुरुआत में हल्के होते हैं, इसलिए पहचानना मुश्किल होता है। इन पर नजर रखें -
ध्यान रहे, कई लोगों में शुरुआती दौर में कोई लक्षण नहीं होता। इसलिए 30 की उम्र के बाद, या जोखिम होने पर उससे पहले भी, जांच कराना समझदारी है।
इंसुलिन रेजिस्टेंस की कोई एक "फाइनल" जांच नहीं है। डॉक्टर आमतौर पर इन टेस्ट को मिलाकर तस्वीर समझते हैं -
ध्यान दें: फास्टिंग इंसुलिन और HOMA-IR की जांच मुख्य रूप से विशेष डॉक्टरी मूल्यांकन के लिए की जाती है, रूटीन डायग्नोसिस के लिए HbA1c और फास्टिंग शुगर ही मानक हैं।
इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाने के लिए आप नीचे दिए गए 9 असरदार तरीके अपना सकते हैं -
ध्यान दें, कोई सप्लीमेंट या घरेलू नुस्खा (जैसे दालचीनी या सिरका) अपने आप में इलाज नहीं है। कोई भी दवा या सप्लीमेंट डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू न करें।
इन स्थितियों में देर न करें और तुरंत डॉक्टर से मिलें -
इंसुलिन सेंसिटिविटी आपके पूरे मेटाबॉलिज्म की नींव है। यह कमजोर पड़ने लगे तो शरीर संकेत देता है, बस हमें उन्हें समय पर सुनना होता है। रोज की सैर, संतुलित थाली, पूरी नींद और तनाव पर नियंत्रण जैसे छोटे बदलाव लंबे समय में बड़ा फर्क लाते हैं। अपनी स्थिति को समझने और सही योजना बनाने के लिए सीके बिरला अस्पताल (CMRI) के विशेषज्ञ से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और इलाज लें।
इंसुलिन सेंसिटिविटी बताती है कि कोशिकाएं इंसुलिन पर कितना अच्छा जवाब देती हैं। इंसुलिन रेजिस्टेंस इसका उल्टा है, जिसमें कोशिकाएं कम जवाब देती हैं और शरीर को ज्यादा इंसुलिन बनाना पड़ता है।
फाइबर वाली सब्जियां, दालें, साबुत अनाज, प्रोटीन और नट्स बढ़ाएं। मैदा, चीनी, मिठाई और मीठे पेय कम करें। भोजन की शुरुआत सलाद से करें और हिस्से का ध्यान रखें।
जब पैंक्रियास ज्यादा इंसुलिन बनाकर भी शुगर को संभाल नहीं पाता, तब ब्लड शुगर बढ़ने लगता है। लंबे समय तक अनदेखी, मोटापा और निष्क्रियता इस खतरे को तेजी से बढ़ाते हैं।
हां, खासकर पेट की चर्बी घटाने से इंसुलिन का असर सुधरता है। शरीर का 5 से 7% वजन कम करना भी ब्लड शुगर में अच्छा सुधार ला सकता है।
शुरुआती अवस्था में जीवनशैली सुधारकर इसे काफी हद तक पलटा जा सकता है। इसके लिए व्यायाम, डाइट और वजन नियंत्रण में निरंतरता जरूरी है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवा भी देते हैं।
हां, भारतीयों में "पतले दिखने पर भी पेट के अंदर चर्बी" होना आम है, इसलिए कम BMI में भी रेजिस्टेंस हो सकती है।
हां, PCOS वाली कई महिलाओं में इंसुलिन रेजिस्टेंस होती है, जो पीरियड्स की अनियमितता और वजन बढ़ने का कारण बन सकती है।
जामुन, सेब, अमरूद, पपीता और संतरे जैसे फल सीमित मात्रा में खाए जा सकते हैं। साबुत फल चुनें, जूस नहीं।
इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई बीपी, ट्राइग्लिसराइड्स और पेट की चर्बी मिलकर मेटाबॉलिक सिंड्रोम बनाते हैं, जिससे धमनियों में जमाव और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है। इसलिए, इंसुलिन सेंसिटिविटी सुधारना दिल को सुरक्षित रखने की सबसे सीधी शुरुआत है।
Written and Verified by:

Dr. Tamal Kumar Bhaumik is a Senior Consultant in Internal Medicine Dept. at CMRI, Kolkata. He specializes in acute and chronic medical conditions, including infectious diseases, metabolic disorders, and lifestyle diseases.
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