ल्यूकेमिया क्यों होता है? कारण, लक्षण और इलाज की पूरी जानकारी
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ल्यूकेमिया क्यों होता है? कारण, लक्षण और इलाज की पूरी जानकारी

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Summary

यह ब्लॉग ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) को बहुत सरल भाषा में समझाता है। लक्षण, कारण, जांच से लेकर आधुनिक इलाज तक सब कुछ बताया गया है। इसका मकसद है मरीज़ और परिवार को डर से बाहर लाकर सही समय पर इलाज की ओर बढ़ने की हिम्मत देना।

कैंसर का शक या उसकी पुष्टि, दोनों ही स्थितियां किसी भी इंसान की दुनिया को पूरी तरह से उलट पलट सकता है। जब डॉक्टर “ल्यूकेमिया” शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो मन में डर, असमंजस और सवालों की बाढ़ आ जाती है कि ये कौन सी बीमारी है और इससे क्या होगा? क्या यह जानलेवा है? क्या इसका इलाज संभव है? क्या मैं या मेरा बच्चा ठीक हो पाएगा? इन सवालों के साथ जीना आसान नहीं है। लेकिन सच यह है कि आप अकेले नहीं हैं। 

ल्यूकेमिया, जिसे आमतौर पर ब्लड कैंसर कहा जाता है, आज के समय में पहले जैसा लाइलाज नहीं रहा। सीके बिरला अस्पताल, जयपुर में हमारा विश्वास है कि सही और स्पष्ट जानकारी मरीज और परिवार को डर से बाहर निकालकर इलाज की ओर पहला कदम बढ़ाने में मदद कर सकता है। इसलिए समय रहते और इस ब्लॉग में बताए गए लक्षणों के दिखने पर बिना देरी किए तुरंत एक अनुभवी डॉक्टर से मिलें और इलाज लें।

ल्यूकेमिया क्या है और यह शरीर में क्या बदलाव लाता है?

ल्यूकेमिया को समझने के लिए हमें शरीर के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से, बोन मैरो (Bone Marrow), को समझना होगा। बोन मैरो हमारी हड्डियों के भीतर मौजूद एक नरम ऊतक या टिश्यू होता है, जो शरीर के लिए आवश्यक रक्त कोशिकाओं का निर्माण करता है। बोन मैरो तीन मुख्य प्रकार की कोशिकाएं बनाता है - 

  • लाल रक्त कोशिकाएं (Red Blood Cells) – जो शरीर के हर भाग तक ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य करता है।
  • सफेद रक्त कोशिकाएं (White Blood Cells) – जो संक्रमण और बीमारियों से लड़ती है।
  • प्लेटलेट्स – जो खून को जमाने और रक्तस्राव रोकने में मदद करते है।

ल्यूकेमिया ब्लड कैंसर तब होता है, जब यह प्रक्रिया बिगड़ जाती है। बोन मैरो असामान्य सफेद रक्त कोशिकाएं बनाने लगता है, जो पूरी तरह विकसित नहीं होती और संक्रमण से लड़ने में असमर्थ रहती हैं। यह कैंसर कोशिकाएं तेजी से बढ़ती हैं और स्वस्थ रक्त कोशिकाओं की जगह घेर लेती हैं। यदि ऐसा होता है तो निम्न समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं - 

  • शरीर में ऑक्सीजन की कमी (एनीमिया)
  • बार-बार और गंभीर संक्रमण
  • खून बहने या जल्दी चोट लगने की समस्या

मुख्य रूप से दो प्रकार के ल्यूकेमिया लोगों को प्रभावित करते हैं - 

  • एक्यूट ल्यूकेमिया – जो बहुत तेजी से बढ़ता है और तुरंत इलाज की मांग करता है।
  • क्रॉनिक ल्यूकेमिया – जो धीरे-धीरे बढ़ता है और लंबे समय तक नियंत्रित किया जा सकता है।

इन्हीं दो प्रकार के ल्यूकेमिया को ही बाद में 4 प्रकारों में बांटा जाता है - 

  • एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (ALL)
  • एक्यूट मायलॉइड ल्यूकेमिया (AML)
  • क्रोनिक लिम्फोसाईटिक ल्यूकेमिया (CLL)
  • क्रोनिक मायलॉइड ल्यूकेमिया (CML)

इस स्थिति में इलाज बहुत आवश्यक होता है क्योंकि यह व्यसकों से ज्यादा बच्चों को प्रभावित करती है। भारत में ICMR और Globocan के आंकड़ों के अनुसार, बच्चों में होने वाले कैंसरों में लगभग 29% मामले लिंफाइड ल्यूकेमिया के होते हैं। 

ल्यूकेमिया क्यों होता है? जानिए इसके पीछे के कारण

मरीज और उनके परिवार अक्सर पूछते हैं कि “ल्यूकेमिया हमें ही क्यों हुआ?” सच यह है कि ल्यूकेमिया कोई संक्रमण नहीं है और न ही यह किसी की गलती से होता है। यह बीमारी बोन मैरो कोशिकाओं के DNA में हुए बदलाव या म्युटेशन के कारण होती है। हालांकि हर मरीज में इसका सटीक कारण पता लगाना संभव नहीं होता, लेकिन कुछ जोखिम कारक पहचाने गए हैं - 

ल्यूकेमिया के प्रमुख जोखिम कारक

इसका कोई सटीक कारण नहीं है, लेकिन इस स्थिति के कुछ प्रमुख जोखिम कारक हैं जैसे कि - 

  • जेनेटिक कारण: डाउन सिंड्रोम जैसी कुछ आनुवंशिक स्थितियों में ल्यूकेमिया का जोखिम बढ़ सकता है।
  • रेडिएशन का संपर्क: अत्यधिक रेडिएशन के कारण यह समस्याएं ट्रिगर कर सकती है।
  • केमिकल एक्सपोजर: बेंजीन जैसे रसायन, जो पेट्रोल और केमिकल इंडस्ट्री में पाए जाते हैं।
  • धूम्रपान: यह खासतौर पर एक्यूट ल्यूकेमिया (Acute Myeloid Leukemia - AML) से जुड़ा हुआ है।
  • पहले कराया गया कैंसर इलाज: कुछ कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी भविष्य में ल्यूकेमिया का खतरा बढ़ा सकती हैं।

यह याद रखना जरूरी है कि जोखिम कारक होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति को ल्यूकेमिया होगा, और कई मरीजों में कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता।

ल्यूकेमिया के शुरुआती और गंभीर लक्षणों को पहचानना क्यों ज़रूरी है?

ल्यूकेमिया के लक्षण अक्सर धीरे-धीरे शुरू होते हैं और शुरुआत में सामान्य थकान या वायरल बुखार जैसा लग सकता है। यही कारण है कि कई बार बीमारी देर से पकड़ में आती है। चलिए ल्यूकेमिया के लक्षणों को समझते हैं - 

शुरुआती लक्षण

  • बिना वजह लगातार थकान महसूस होना।
  • कमजोरी और चक्कर आना।
  • बार-बार संक्रमण या लंबे समय तक बुखार।
  • बिना कोशिश किए वजन कम होना।

गंभीर और स्पष्ट लक्षण

  • नाक, मसूड़ों या शरीर के अन्य हिस्सों से खून आना
  • त्वचा पर लाल या बैंगनी छोटे-छोटे धब्बे
  • हड्डियों और जोड़ों में लगातार दर्द
  • गर्दन, बगल या कमर में सूजी हुई गांठ
  • रात में अत्यधिक पसीना आना

यदि यह लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करना बेहद जरूरी है।

ल्यूकेमिया की जांच कैसे की जाती है?

सही जांच ही सही इलाज की दिशा तय करती है। सीके बिरला अस्पताल, जयपुर में ल्यूकेमिया की पहचान के लिए आधुनिक और सटीक जांच सुविधाएं उपलब्ध हैं। इलाज से पहले कुछ जांच की प्रक्रियाएं होती हैं जैसे कि - 

  • ब्लड टेस्ट (CBC): रक्त कोशिकाओं की संख्या और असामान्यता जांचने के लिए यह टेस्ट होता है।
  • बोन मैरो टेस्ट: ल्यूकेमिया की पुष्टि और उसके प्रकार की पहचान के लिए इस टेस्ट को सुझाया जाता है।
  • साइटोजेनेटिक और मॉलिक्यूलर टेस्ट: जीन में हुए बदलाव समझकर टार्गेटेड ट्रीटमेंट चुनने के लिए इसके परिणाम की प्रतीक्षा की जाती है।

ल्यूकेमिया का इलाज: क्या यह पूरी तरह ठीक हो सकता है?

जब 'ब्लड कैंसर' या ल्यूकेमिया का नाम आता है, तो मन में डर आना स्वाभाविक है। लेकिन, मेडिकल विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब इस समस्या का इलाज संभव है। 

ल्यूकेमिया के इलाज का तरीका "सबके लिए एक जैसा" नहीं होता है, बल्कि यह पूरी तरह से पर्सनलाइज्ड या व्यक्तिगत होता है। डॉक्टर मरीज की उम्र, ल्यूकेमिया के प्रकार और बीमारी की स्टेज को बारीकी से समझ कर ही उपचार की योजना बनाई जाती है।

उपलब्ध मुख्य उपचार विकल्प - Treatment Options

ल्यूकेमिया से लड़ने के लिए हमारे पास अब कई आधुनिक मशीनें और दवाएं उपलब्ध है जैसे कि - 

  • कीमोथेरेपी (Chemotherapy): यह सबसे आम उपचार है, जिसमें शक्तिशाली दवाओं का उपयोग करके शरीर में मौजूद कैंसर कोशिकाओं को खत्म किया जाता है।
  • टार्गेटेड थेरेपी (Targeted Therapy): यह एक स्मार्ट तकनीक है। इसमें दवाएं सीधे कैंसर कोशिकाओं की विशिष्ट कमजोरियों पर हमला करती हैं, जिससे स्वस्थ कोशिकाओं को कम से कम नुकसान पहुंचता है।
  • इम्यूनोथेरेपी (Immunotherapy): यह आपके शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर से लड़ने के लिए मजबूत बनाती है।
  • बोन मैरो / स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (Bone Marrow Transplant): जब कीमोथेरेपी काम नहीं करती या बीमारी दोबारा लौट आती है, तो यह प्रक्रिया जीवन रक्षक साबित होती है। इसमें अस्वस्थ बोन मैरो को स्वस्थ स्टेम सेल्स से बदल दिया जाता है।

बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक जटिल प्रक्रिया है, जिसके लिए अत्यधिक सावधानी की जरूरत होती है। सीके बिरला अस्पताल, जयपुर में हमारे पास अत्याधुनिक स्टेराइल यूनिट्स (HEPA Filters युक्त) और अनुभवी हेमेटो-ऑन्कोलॉजिस्ट की टीम है, जो संक्रमण के जोखिम को कम करते हुए इस प्रक्रिया को सफल बनाते हैं।

निष्कर्ष

ल्यूकेमिया ज़रूर जीवन बदल देने वाली बीमारी है, लेकिन यह अब अंतिम चरण नहीं है। मेडिकल साइंस में हुई प्रगति के कारण आज कई मरीज पूरी तरह ठीक हो रहे हैं और कई लोग इसे एक क्रॉनिक बीमारी की तरह ही देखते हैं। सीके बिरला अस्पताल, जयपुर में हम इलाज को सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं रखते। हम मरीज और परिवार दोनों की शारीरिक और मानसिक देखभाल करते हैं। यदि आपको या आपके किसी प्रियजन को ल्यूकेमिया के लक्षण दिख रहे हैं, तो इंतजार न करें। आज ही विशेषज्ञ से सलाह लें और उम्मीद की ओर पहला कदम बढ़ाएं।

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या ल्यूकेमिया जानलेवा है? 

हर मामले में ऐसा ही हो, संभव नहीं। आज आधुनिक तकनीकों और सही समय पर निदान से ल्यूकेमिया के कई मरीज न केवल ठीक होते हैं, बल्कि एक सामान्य और लंबी जिंदगी जीते हैं।

क्या ल्यूकेमिया जेनेटिक रोग होता है?

ज्यादातर मामलों में, नहीं। ल्यूकेमिया DNA में बदलाव के कारण होता है, लेकिन यह बदलाव आमतौर पर जीवन के दौरान होते हैं और माता-पिता से बच्चों में नहीं फैलते।

क्या ल्यूकेमिया पूरी तरह ठीक हो सकता है?

जी हां, विशेष रूप से बच्चों में होने वाले एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (ALL) में पूरी तरह ठीक होने की दर बहुत अधिक है। बड़ों में भी इसे प्रभावी ढंग से मैनेज किया जा सकता है।

ल्यूकेमिया किस उम्र में सबसे ज्यादा होता है?

वैसे तो यह बच्चों में पाया जाने वाला सबसे आम कैंसर है, लेकिन आँकड़े बताते हैं कि 55 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों में इसके मामले सबसे ज्यादा देखे जाते हैं।

ल्यूकेमिया कितने प्रकार का होता है?

मुख्य रूप से इसके चार प्रकार हैं - 

  • एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (ALL)
  • एक्यूट मायलॉइड ल्यूकेमिया (AML)
  • क्रोनिक लिम्फोसाईटिक ल्यूकेमिया (CLL)
  • क्रोनिक मायलॉइड ल्यूकेमिया (CML)

क्या ल्यूकेमिया संक्रामक है?

बिल्कुल नहीं, ल्यूकेमिया किसी वायरल बुखार या जुकाम की तरह नहीं है। यह मरीज के साथ रहने, खाने या छूने से एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलता।

Written and Verified by:

Dr. Umesh Khandelwal

Dr. Umesh Khandelwal

Additional Director Exp: 12 Yr

Medical Oncology

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Dr. Umesh Khandelwal is Additional Director of Medical Oncology Dept. at CK Birla Hospital, Jaipur, with over 13 years in heme-oncology. He treats all types of cancers, with a special focus on leukemia and pediatric oncology, and uses therapies like chemotherapy, immunotherapy, and targeted treatments.

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