
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल 50,000 से ज़्यादा लोग ब्लैडर कैंसर से प्रभावित होते हैं, और यह दुनिया भर में पाए जाने वाले सबसे आम कैंसर की सूची में दसवें स्थान पर आता है, जो इसे और भी ज्यादा खतरनाक बनाता है। इसके बावजूद, इस विषय पर खुलकर बात कम ही होती है, क्योंकि पेशाब से जुड़े लक्षणों को लोग अक्सर शर्म के चलते नजरअंदाज कर देते हैं या मामूली इन्फेक्शन समझकर टाल देते हैं। यह देरी बीमारी को आगे बढ़ने का मौका दे देती है।
इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि आखिर धूम्रपान और ब्लैडर कैंसर के बीच क्या संबंध है, इसके शुरुआती लक्षण क्या है, कौन-कौन से अन्य कारण इसके पीछे जिम्मेदार हो सकते हैं, और बचाव के लिए क्या किया जा सकता है। अगर आपको पेशाब में खून आना या इससे जुड़ी कोई भी असामान्य तकलीफ महसूस हो रही है, तो देर न करें, हमारे अनुभवी ब्लैडर कैंसर के विशेषज्ञों से अभी अपॉइंटमेंट बुक करें और समय रहते सही जांच कराएं।
इसका जवाब स्पष्ट रूप से हां है, और यह सिर्फ एक आम धारणा नहीं बल्कि व्यापक वैज्ञानिक रिसर्च पर आधारित तथ्य है। कैंसर रिसर्च यूके के अनुसार, दुनिया भर में होने वाले लगभग आधे ब्लैडर कैंसर के मामलों के पीछे धूम्रपान ज़िम्मेदार होता है, और जो लोग धूम्रपान करते हैं, उनमें कभी धूम्रपान न करने वालों की तुलना में ब्लैडर कैंसर का खतरा चार गुना तक ज्यादा पाया गया है। यही कारण है कि हम भी हर तरफ चेतावनी देखते हैं कि धूम्रपान छोड़ें।
इसके पीछे के कारण को समझना ज़रूरी है। जब कोई व्यक्ति सिगरेट, बीड़ी या हुक्का पीता है, तो धुएं में मौजूद हानिकारक केमिकल, जिनमें एरिलामाइन्स (Arylamines) जैसे तत्व शामिल हैं, खून में मिल जाते हैं। यह केमिकल किडनी द्वारा खून से छानकर पेशाब में पहुंचा दिए जाते हैं, और जब पेशाब कुछ समय के लिए मूत्राशय में जमा रहता है, तो यह विषैले तत्व सीधे मूत्राशय की भीतरी परत के संपर्क में आते हैं। समय के साथ यह बार-बार का संपर्क मूत्राशय की कोशिकाओं में असामान्य बदलाव यानी कैंसर की शुरुआत का कारण बन सकता है।
जो लोग कम उम्र से धूम्रपान शुरू करते हैं, ज़्यादा मात्रा में और लंबे समय तक धूम्रपान करते हैं, उनमें यह खतरा सबसे अधिक होता है। यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि सिर्फ सिगरेट ही नहीं, बीड़ी, हुक्का और चबाने वाला तंबाकू भी इस जोखिम को उतनी ही गंभीरता से बढ़ाते हैं।
ब्लैडर कैंसर के लक्षण शुरुआत में इतने मामूली लग सकते हैं कि उन्हें आम यूरिन इन्फेक्शन समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इन्हें पहचानना और समय पर जांच कराना बेहद जरूरी है -

यहां एक बात बेहद ज़रूरी है, पेशाब में खून दिखना हमेशा ब्लैडर कैंसर का मतलब नहीं होता, यह यूरिन इन्फेक्शन, किडनी स्टोन या अन्य कारणों से भी हो सकता है। लेकिन किसी भी स्थिति में इन लक्षणों को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, इसकी वजह जानने के लिए जांच कराना जरूरी है।
धूम्रपान सबसे बड़ा जोखिम कारक ज़रूर है, लेकिन ब्लैडर कैंसर के कारण इसी तक सीमित नहीं हैं। कुछ और कारक भी इस बीमारी के खतरे को बढ़ा सकते हैं, जैसे कि -
अगर लक्षणों के आधार पर डॉक्टर को ब्लैडर कैंसर की आशंका होती है, तो निदान के लिए कई जांच एक साथ की जाती हैं जैसे कि -
ब्लैडर कैंसर से बचाव के लिए सबसे प्रभावी और सबसे ज़्यादा असर डालने वाला कदम है धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाना। इसके अतिरिक्त कुछ और आदतें भी जोखिम को काफी हद तक कम कर सकती हैं जैसे कि -
यह ध्यान रखना जरूरी है कि धूम्रपान का नुकसान सिर्फ मूत्राशय तक सीमित नहीं है, यह हृदय की धमनियों को भी नुकसान पहुंचाकर हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को भी काफी हद तक बढ़ा देता है। यही वजह है कि धूम्रपान छोड़ने का फैसला एक साथ मूत्राशय, फेफड़ों और दिल, तीनों की सेहत की दिशा में एक बड़ा कदम बन जाता है। कोलकाता में रहने वाले लोगों के लिए, अगर ब्लैडर कैंसर या इससे जुड़ी किसी भी शंका के साथ-साथ हृदय स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता हो, तो CMRI जैसे मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल में यूरोलॉजी और कार्डियोलॉजी दोनों विशेषज्ञताओं की टीम एक साथ उपलब्ध होने से समग्र जांच और देखभाल मिलना आसान हो जाता है।
धूम्रपान और ब्लैडर कैंसर के बीच का संबंध वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट और गंभीर है, फिर भी यह एक ऐसा विषय है जिस पर खुलकर बात कम होती है। पेशाब में खून आना, बार-बार पेशाब आना या पेशाब में जलन जैसे लक्षणों को शर्म या झिझक के चलते नजरअंदाज न करें। समय पर पहचान और सही जांच से इस बीमारी का इलाज कहीं ज़्यादा असरदार साबित होता है।
धूम्रपान छोड़ने के कुछ साल बाद ही ब्लैडर कैंसर का खतरा घटना शुरू हो जाता है, और समय के साथ यह उन लोगों के जोखिम स्तर के करीब पहुंच सकता है जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया।
हां, हालांकि सक्रिय धूम्रपान की तुलना में इसका खतरा कम माना जाता है, लेकिन लंबे समय तक सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क में रहना भी शरीर में उन्हीं हानिकारक रसायनों को पहुंचा सकता है जो जोखिम बढ़ाते हैं।
ई-सिगरेट अपेक्षाकृत नई हैं, इसलिए इनके दीर्घकालिक प्रभावों पर शोध अभी जारी है। हालांकि इनमें भी हानिकारक रसायन मौजूद होते हैं, इसलिए इन्हें पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
यह किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन 55 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में इसकी दर काफी अधिक पाई जाती है, खासकर लंबे समय से धूम्रपान करने वालों में।
नहीं, पेशाब में खून यूरिन इन्फेक्शन, किडनी स्टोन या अन्य कारणों से भी आ सकता है। लेकिन यह लक्षण कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, सही कारण जानने के लिए जांच जरूरी है।
आमतौर पर यूरिन टेस्ट, सिस्टोस्कोपी, इमेजिंग जैसे CT यूरोग्राम या अल्ट्रासाउंड, और जरूरत पड़ने पर बायोप्सी के ज़रिए निदान की पुष्टि की जाती है।
Written and Verified by:

Dr. Sayoni Bhanja is a highly skilled Medical Oncologist at CMRI Hospital with over a decade of experience in evidence-based cancer therapy and patient-focused care.
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