
किसी अपने को कैंसर की खबर सुनना शायद सबसे भारी पलों में से एक होता है। यही वह डर होता है, जो पूरे परिवार को हिला देता है। लेकिन क्या हो अगर कैंसर के कुछ सबसे जानलेवा प्रकारों को आने से पहले ही रोका जा सके, सिर्फ एक टीके की मदद से?
यह बात सुनने में जितनी उम्मीद जगाती है, उतनी ही वैज्ञानिक रूप से सच भी है। पिछले कुछ सालों में मेडिकल साइंस ने यह साबित किया है कि कैंसर की रोकथाम अब सिर्फ जांच और इलाज तक सीमित नहीं, बल्कि वैक्सीन इसमें एक मजबूत हथियार बनकर उभरी है। इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि कैंसर वैक्सीन असल में काम कैसे करती है, किन टीकों से किस तरह के कैंसर का खतरा घटता है, और इनकी सीमाएं क्या हैं। यदि आप या आपके परिवार में कोई कैंसर से बचाव के सही तरीके जानना चाहता है, तो देर न करें, CMRI कोलकाता के अनुभवी ऑन्कोलॉजिस्ट से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें।
यह सवाल अक्सर लोगों के मन में उलझन पैदा करता है, क्योंकि आम धारणा यही है कि वैक्सीन सिर्फ फ्लू या पोलियो जैसी बीमारियों के लिए होती है। सच यह है कि कैंसर वैक्सीन दो तरह की होती हैं, प्रिवेंटिव (रोकथाम वाली) और थेरेप्यूटिक (इलाज में मदद करने वाली)।
रोकथाम वाली वैक्सीन उन वायरस से बचाव करती है, जो शरीर में लंबे समय तक रहकर कोशिकाओं को असामान्य बना देते हैं और आगे चलकर कैंसर का रूप ले लेते हैं। यानी यह सीधे कैंसर को नहीं रोकती, बल्कि उस वायरल संक्रमण को रोकती है, जो कैंसर की जड़ बनता है या उसे ट्रिगर करता है।
दूसरी तरफ थेरेप्यूटिक वैक्सीन उन मरीजों के लिए बनाई जाती हैं, जिन्हें पहले से कैंसर है और यह वैक्सीन शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर कोशिकाओं को पहचान कर नष्ट करने के लिए ट्रेन करती है। मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर जैसे बड़े संस्थानों के अनुसार, प्रोस्टेट कैंसर, ब्लैडर कैंसर और मेलानोमा के लिए ऐसी कुछ थेरेप्यूटिक वैक्सीन को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है, जबकि पैनक्रिएटिक और फेफड़ों के कैंसर के लिए mRNA आधारित वैक्सीन पर अभी रिसर्च चल रही है।

क्या कोई ऐसी वैक्सीन है जो कैंसर को रोक सके?" हमारी ओपीडी (OPD) में अक्सर मरीज यह सवाल पूछते हैं। राहत की बात यह है कि विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि आज हमारे पास कैंसर से बचाने वाली और कैंसर का इलाज करने वाली, दोनों तरह की वैक्सीन मौजूद हैं।
आइए इसे आसान और सही भाषा में समझते हैं:
ये वैक्सीन किसी व्यक्ति को कैंसर पैदा करने वाले वायरस से संक्रमित होने से पहले दी जाती हैं, ताकि भविष्य में कैंसर का खतरा टाला जा सके।
नोट: 9 से 14 साल की उम्र में (संक्रमण के खतरे से पहले) लगने वाली यह वैक्सीन HPV टाइप 16 और 18 के खिलाफ 90% से ज़्यादा असरदार है।
ये वैक्सीन उन लोगों को दी जाती हैं, जिन्हें पहले से कैंसर है। यह कोई आम वैक्सीन नहीं है; यह मरीज के इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को ट्रेनिंग देती है ताकि वह कैंसर सेल्स को पहचान कर उन्हें नष्ट किया जा सके।
एचपीवी और हेपेटाइटिस B वैक्सीन जैसी रोकथाम वाली वैक्सीन की सफलता दर वाकई प्रभावशाली है, लेकिन इन्हें समझना ज़रूरी है। यह वैक्सीन सिर्फ उन कैंसर से बचाती हैं जो किसी वायरस के कारण होते हैं, यानी यह हर तरह के कैंसर की गारंटी नहीं देती। इसके अलावा वैक्सीन का असर सबसे ज्यादा तब होता है जब इसे संक्रमण होने से पहले, यानी कम उम्र में लगवाया जाए। जिन लोगों को पहले से HPV या हेपेटाइटिस B संक्रमण हो चुका है, उनमें वैक्सीन का फायदा सीमित रह जाता है। थेरेप्यूटिक वैक्सीन की भी अपनी चुनौतियां हैं, कैंसर कोशिकाएं कई बार इम्यून सिस्टम को चकमा देने के तरीके ढूंढ लेती हैं, जिससे वैक्सीन का असर कम हो जाता है, खासकर बड़े ट्यूमर के मामलों में। इसलिए डॉक्टर हमेशा वैक्सीन को बचाव की एक कड़ी मानते हैं, पूरा समाधान नहीं।
वैक्सीन अकेले पूरी सुरक्षा नहीं दे सकती, इसलिए जीवनशैली और जांच उतनी ही जरूरी हैं। धूम्रपान और तंबाकू से दूरी, संतुलित आहार, नियमित शारीरिक सक्रियता और शराब का सीमित सेवन, ये आदतें कई तरह के कैंसर का खतरा घटाती हैं। महिलाओं के लिए नियमित पैप स्मीयर और HPV DNA टेस्ट सर्वाइकल कैंसर को शुरुआती स्टेज में पकड़ने में मदद करते हैं, भले ही वैक्सीन लग चुकी हो। इसी तरह लिवर की सेहत के लिए नियमित लिवर फंक्शन टेस्ट फायदेमंद है।
कैंसर की रोकथाम में वैक्सीन ने पिछले कुछ सालों में जो रास्ता खोला है, वह वाकई उम्मीद जगाने वाला है, खासकर HPV और हेपेटाइटिस B वैक्सीन ने लाखों जिंदगियां बचाई हैं। लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि वैक्सीन एक मजबूत ढाल है, पूरा किला नहीं। वैज्ञानिक अब उन कैंसर के लिए भी वैक्सीन विकसित कर रहे हैं जो सीधे किसी वायरस से नहीं जुड़े हैं, जैसे कि पैंक्रियाज, फेफड़े, और कोलोरेक्टल कैंसर। इनमें मरीज के ट्यूमर के जेनेटिक्स के हिसाब से बनाई गई पर्सनलाइज्ड mRNA वैक्सीन (Personalized mRNA vaccines) शामिल हैं, जो अभी क्लिनिकल ट्रायल के दौर में काफी सकारात्मक नतीजे दे रही हैं।
CMRI कोलकाता में मरीजों को अक्सर हम एक कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ चेकअप की सलाह देते हैं, जिसमें हार्ट स्क्रीनिंग के साथ-साथ कैंसर से जुड़ी ज़रूरी जांचें भी शामिल होती हैं, ताकि एक ही विज़िट में पूरी तस्वीर सामने आ सके।
हां, HPV सिर्फ महिलाओं को नहीं बल्कि पुरुषों को भी गले, मुंह और जननांग से जुड़े कैंसर के खतरे में डालता है। लड़कों को वैक्सीन लगवाने से संक्रमण फैलने की चेन भी टूटती है, इसलिए डॉक्टर इसे दोनों के लिए सुझाते हैं।
बिल्कुल, वैक्सीन सभी HPV प्रकारों से सुरक्षा नहीं देती। इसलिए वैक्सीनेशन के बाद भी नियमित पैप स्मीयर या HPV DNA टेस्ट कराना जरूरी है, ताकि शुरुआती बदलाव समय पर पकड़े जा सके।
नहीं, अभी तक ऐसी कोई वैक्सीन नहीं है। मौजूदा वैक्सीन सिर्फ उन कैंसर से बचाती हैं जो वायरस से जुड़े होते हैं, जैसे HPV और हेपेटाइटिस B। बाकी कैंसर के लिए जीवनशैली और नियमित जांच ही बचाव का मुख्य ज़रिया हैं।
रिसर्च के अनुसार, जन्म के छह महीने के भीतर वैक्सीन लगवाने वालों में सुरक्षा कम से कम 30 साल तक बनी रहती है। ज्यादातर स्वस्थ लोगों में इसके बाद बूस्टर डोज़ की भी सामान्यतः ज़रूरत नहीं पड़ती।
महिलाओं के लिए पैप स्मीयर और मैमोग्राफी, सभी के लिए लिवर फंक्शन टेस्ट, कोलोनोस्कोपी (उचित उम्र के बाद) और सालाना फुल बॉडी हेल्थ चेकअप कैंसर को शुरुआती स्टेज में पकड़ने में मदद करते हैं।
ज्यादातर मामलों में साइड इफेक्ट हल्के होते हैं, जैसे इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द, हल्का बुखार या थकान, जो एक-दो दिन में अपने आप ठीक हो जाते हैं। गंभीर साइड इफेक्ट बेहद दुर्लभ हैं, फिर भी वैक्सीन लगवाने से पहले डॉक्टर से चर्चा करना सही रहता है।
लोग अक्सर पूछते हैं कि क्या भविष्य में एक ही वैक्सीन से सारे कैंसर से बचा जा सकेगा? इसका सीधा जवाब फिलहाल 'नहीं' है, क्योंकि कैंसर कोई एक बीमारी नहीं बल्कि 200 से अधिक अलग-अलग बीमारियों का समूह है। पर कैंसर वैक्सीन पर चल रहे ये आधुनिक शोध निश्चित रूप से मेडिकल साइंस में एक बहुत बड़ी उम्मीद की किरण हैं।
Written and Verified by:

Dr. Chanchal Goswami is a Consultant in Oncology at CMRI Hospital, Kolkata with over 36 years of experience. He specializes in breast, thoracic, head & neck, and genitourinary cancers, with expertise in both radiation and radiotherapy care.
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