
क्लास में टीचर ने पूछा, "पेड़ के पत्ते किस रंग के होते हैं?" सात साल के एक बच्चे ने बेफिक्री से जवाब दिया, "भूरे।" पूरी क्लास हंस पड़ी और टीचर ने भी इसे मजाक में टाल दिया। लेकिन शाम को जब मां ने उसकी ड्राइंग बुक देखी, तो चौंक गईं क्योंकि आसमान हरे रंग से रंगा था और घास भूरी थी। यही वह छोटा सा पल था, जहां पहली बार शक हुआ कि कुछ अलग है।
हमारे पास ऐसी कई कहानियां आई हैं। अक्सर यह समस्या बचपन में पकड़ में नहीं आती और सालों बाद ड्राइविंग लाइसेंस बनवाते वक्त या नौकरी के मेडिकल टेस्ट में सामने आती है। अगर आपको भी लाल और हरे रंग में फर्क करने, कपड़ों का मैच मिलाने या ट्रैफिक सिग्नल पहचानने में दिक्कत होती है, तो यह लापरवाही नहीं, बल्कि एक मेडिकल स्थिति हो सकती है, जिसे कलर ब्लाइंडनेस (Color Blindness) कहते हैं।
अगर आपको या आपके बच्चे को रंग पहचानने में थोड़ी भी उलझन होती है, तो खुद अंदाजा लगाने के बजाय हमारे अनुभवी नेत्र रोग विशेषज्ञ से अपॉइंटमेंट बुक करना ही सबसे सही पहला कदम है।
आम धारणा के विपरीत, कलर ब्लाइंडनेस का मतलब दुनिया को 'ब्लैक एंड व्हाइट' देखना नहीं है। चलिए इसे आसान भाषा में समझते हैं -
शुरुआत में इसके लक्षणों को सामान्य भूल समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 85% मामलों में बचपन में इसकी पहचान गलत रंग भरने या कपड़ों का रंग आपस में मिक्स करने से होती है।
वयस्कों (Adults) में इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:
दुनिया भर में करीब 8% पुरुष और केवल 0.5% महिलाएं कलर ब्लाइंडनेस से प्रभावित हैं। ज्यादातर मामलों में कलर ब्लाइंडनेस (रंग अंधापन) जन्मजात यानी आनुवंशिक (Genetic) होती है। चलिए पहले इसके कारणों को समझते हैं -
यह मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है:
अगर ऊपर बताए गए लक्षणों में से कोई भी अपने या अपने बच्चे में नजर आए, तो सबसे जरूरी कदम है सही कलर ब्लाइंडनेस टेस्ट करवाना। यह टेस्ट बहुत आसान है, सिर्फ कुछ मिनट लेता है, और शुरुआती स्क्रीनिंग के लिए बेहद कारगर माना जाता है।
यदि बच्चों या वयस्कों में रंग पहचानने की समस्या दिखे, तो तुरंत ये टेस्ट कराने चाहिए -
आवश्यक सलाह: बच्चों में 4 से 5 साल की उम्र में यह जांच जरूर करा लेनी चाहिए ताकि स्कूल में उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो। इसके अलावा पायलट, ड्राइवर, डिफेंस और इलेक्ट्रीशियन जैसे करियर के लिए यह टेस्ट अनिवार्य होता है।
इस स्थिति का इलाज मुख्य रूप से इसके प्रकार पर निर्भर करता है। चलिए दोनों प्रकार के कलर ब्लाइंडनेस के प्रकार के आधार पर इनके इलाज की संभावना को समझते हैं -
कलर ब्लाइंडनेस के साथ कुछ आसान लाइफ-हैक अपनाकर बेहद सहज और सफल जिंदगी जी जा सकती है -

रंग पहचानने में दिक्कत होना न तो शर्म की बात है और न ही नजरअंदाज करने वाली बात। चाहे यह बचपन से हो या डायबिटीज, ग्लूकोमा जैसी किसी बीमारी की वजह से बाद में सामने आई हो, सही समय पर सही जांच और थोड़ी सी जागरूकता पूरी जिंदगी को आसान बना सकती है। कलर ब्लाइंडनेस को समझना, इसे स्वीकार करना और इसके साथ सही तरीके से तालमेल बैठाना, यही सबसे व्यावहारिक और स्वस्थ रास्ता है।
अगर आपको या आपके परिवार में किसी को रंग पहचानने में लगातार दिक्कत महसूस हो रही है, तो अंदाजा लगाने में समय बर्बाद न करें। सीधे सीके बिरला अस्पताल (CMRI), कोलकाता के नेत्र रोग विभाग के अनुभवी विशेषज्ञों से अपॉइंटमेंट बुक करें। सही जांच और सही सलाह न केवल स्थिति को साफ करेगी, बल्कि आपकी रोजमर्रा की जिंदगी को भी कहीं ज्यादा आसान बना देगी।
सबसे सामान्य प्रकार रेड-ग्रीन कलर ब्लाइंडनेस है, जिसमें लाल और हरे रंग के बीच भेद करना मुश्किल होता है। यह दुनियाभर में लगभग 8 प्रतिशत पुरुषों और 0.5 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करती है।
हां, ज्यादातर मामलों में यह X गुणसूत्र पर मौजूद OPN1LW और OPN1MW जीन में बदलाव के कारण होती है। इसी वजह से यह पुरुषों में ज्यादा और महिलाओं में अधिकतर कैरियर के रूप में पाई जाती है।
कुछ खास टिंटेड चश्मे कलर कॉन्ट्रास्ट बढ़ाकर हल्के रेड-ग्रीन डेफिसिएन्सी में मदद कर सकते हैं। हालांकि यह इलाज नहीं है, असर व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग होता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह जरूरी है।
चार से पांच साल की उम्र से Ishihara जैसे सरल कलर विजन टेस्ट से जांच की जा सकती है। स्कूल में दाखिले से पहले यह जांच करवाना सीखने के तरीके को समय पर बेहतर बनाने में मदद करता है।
जन्मजात कलर ब्लाइंडनेस आमतौर पर जिंदगी भर एक जैसी रहती है। लेकिन एक्वायर्ड कलर ब्लाइंडनेस डायबिटीज, ग्लूकोमा या उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे बिगड़ सकती है, इसलिए नियमित जांच जरूरी है।
हां, हालांकि दर बहुत कम, लगभग 0.5 प्रतिशत, होती है, क्योंकि महिलाओं को इसके लिए दोनों X क्रोमोसोम में बदलाव चाहिए होता है। ज्यादातर महिलाएं सिर्फ इस जीन की कैरियर होती हैं और खुद प्रभावित नहीं होती।
हां, पायलट, ट्रेन ड्राइवर, डिफेंस सेवाओं और इलेक्ट्रीशियन जैसे पेशों में रंग पहचानने की क्षमता की जांच अनिवार्य होती है, क्योंकि इन कामों में रंग की सही पहचान सीधे सुरक्षा से जुड़ी होती है।
Written and Verified by:
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Dr. Bhaskar Ray Chaudhuri is a Consultant in Ophthalmology Dept. at CMRI, Kolkata, with over 25 years of experience. He specializes in cataract surgery, corneal transplants, keratoconus management, dry eye disease treatment, and glaucoma management.
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