क्या आपको रंग पहचानने में दिक्कत होती है? जानें कलर ब्लाइंडनेस के कारण, लक्षण और इलाज
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क्या आपको रंग पहचानने में दिक्कत होती है? जानें कलर ब्लाइंडनेस के कारण, लक्षण और इलाज

Table of Contents

Summary

  • कलर ब्लाइंडनेस यानी रंग पहचानने में दिक्कत ज्यादातर मामलों में जन्म से ही जेनेटिक समस्या होती है।
  • सबसे सामान्य प्रकार रेड-ग्रीन कलर ब्लाइंडनेस है, जो दुनियाभर में लगभग 8 प्रतिशत पुरुषों और 0.5 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करती है।
  • कलर ब्लाइंडनेस टेस्ट के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीका इशिहारा टेस्ट (Ishihara test) है, जो कुछ ही मिनटों में रंग पहचानने की क्षमता को परख लेता है।
  • जन्मजात कलर ब्लाइंडनेस (Genetic color blindness) का इलाज फिलहाल पूरी तरह संभव नहीं है, लेकिन इसे मैनेज करना संभव है।
  • डायबिटीज, ग्लूकोमा, उम्र बढ़ने या कुछ दवाओं की वजह से भी बाद में रंग पहचानने की क्षमता कम हो सकती है।

क्लास में टीचर ने पूछा, "पेड़ के पत्ते किस रंग के होते हैं?" सात साल के एक बच्चे ने बेफिक्री से जवाब दिया, "भूरे।" पूरी क्लास हंस पड़ी और टीचर ने भी इसे मजाक में टाल दिया। लेकिन शाम को जब मां ने उसकी ड्राइंग बुक देखी, तो चौंक गईं क्योंकि आसमान हरे रंग से रंगा था और घास भूरी थी। यही वह छोटा सा पल था, जहां पहली बार शक हुआ कि कुछ अलग है।

हमारे पास ऐसी कई कहानियां आई हैं। अक्सर यह समस्या बचपन में पकड़ में नहीं आती और सालों बाद ड्राइविंग लाइसेंस बनवाते वक्त या नौकरी के मेडिकल टेस्ट में सामने आती है। अगर आपको भी लाल और हरे रंग में फर्क करने, कपड़ों का मैच मिलाने या ट्रैफिक सिग्नल पहचानने में दिक्कत होती है, तो यह लापरवाही नहीं, बल्कि एक मेडिकल स्थिति हो सकती है, जिसे कलर ब्लाइंडनेस (Color Blindness) कहते हैं।

अगर आपको या आपके बच्चे को रंग पहचानने में थोड़ी भी उलझन होती है, तो खुद अंदाजा लगाने के बजाय हमारे अनुभवी नेत्र रोग विशेषज्ञ से अपॉइंटमेंट बुक करना ही सबसे सही पहला कदम है।

कलर ब्लाइंडनेस क्या है और यह कैसे होती है?

आम धारणा के विपरीत, कलर ब्लाइंडनेस का मतलब दुनिया को 'ब्लैक एंड व्हाइट' देखना नहीं है। चलिए इसे आसान भाषा में समझते हैं - 

  • आंखों का साइंस: हमारी आंख की रेटिना में तीन तरह की कोन कोशिकाएं (Cone Cells) होती हैं, जो लाल, हरे और नीले रंग को पहचानती हैं। ये कोशिकाएं मिलकर दिमाग को सिग्नल भेजती हैं, जिससे हमें सही रंग दिखाई देते हैं।
  • कमी क्यों होती है?: जब कोन कोशिकाओं में से कोई भी ठीक से काम नहीं करती या अनुपस्थित होती है, तो दिमाग को गलत सिग्नल मिलते हैं। इसे मेडिकल भाषा में कलर विजन डेफिशियेंसी कहा जाता है। दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ लोग इस स्थिति के साथ जी रहे हैं। अधिकतर मामले काफी हल्के होते हैं, इसलिए लोगों को इसका पता बहुत देर से चलता है।

रंग पहचानने में दिक्कत के सामान्य लक्षण

शुरुआत में इसके लक्षणों को सामान्य भूल समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 85% मामलों में बचपन में इसकी पहचान गलत रंग भरने या कपड़ों का रंग आपस में मिक्स करने से होती है।

वयस्कों (Adults) में इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • लाल-हरे में भ्रम: लाल और हरे रंग के बीच अंतर करने में अत्यधिक मुश्किल होना।
  • ट्रैफिक सिग्नल में दिक्कत: रंगों के बजाय लाइट की पोजीशन (ऊपर या नीचे) को देखकर अंदाजा लगाना।
  • दैनिक जीवन में रुकावट: करीब 70% प्रभावित लोगों को पके और कच्चे फलों का रंग पहचानने में दिक्कत होती है।
  • करियर और शौक में बाधा: मेकअप, पेंटिंग, इंटीरियर डिजाइनिंग या इलेक्ट्रिकल वायरिंग (कलर-कोडेड तार) जैसे कामों में परेशानी आना। कलर पहचानने वाली समस्या के साथ इन प्रोफेशन में काम करना बहुत मुश्किल होता है।

कलर ब्लाइंडनेस के कारण और प्रकार

कलर ब्लाइंडनेस के कारण (Causes of Color Blindness)

दुनिया भर में करीब 8% पुरुष और केवल 0.5% महिलाएं कलर ब्लाइंडनेस से प्रभावित हैं। ज्यादातर मामलों में कलर ब्लाइंडनेस (रंग अंधापन) जन्मजात यानी आनुवंशिक (Genetic) होती है। चलिए पहले इसके कारणों को समझते हैं - 

  • X-लिंक्ड इन्हेरिटेंस: इसके लिए जिम्मेदार जीन X क्रोमोसोम पर होते हैं। पुरुषों में केवल एक X क्रोमोसोम होने के कारण उनमें यह स्थिति ज्यादा देखी जाती है। 
  • एक्वायर्ड कारण (Acquired Causes): जन्मजात के अलावा बढ़ती उम्र, आंख की चोट, डायबिटीज, ग्लूकोमा (काला मोतिया), मोतियाबिंद या कुछ दवाओं के लंबे समय तक सेवन से भी यह समस्या बाद में विकसित हो सकती है।

कलर ब्लाइंडनेस के प्रकार (Types of Color Blindness)

यह मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है:

  • रेड-ग्रीन कलर ब्लाइंडनेस (सामान्य): सबसे सामान्य है रेड-ग्रीन कलर ब्लाइंडनेस, जिसमें लाल और हरे रंग के बीच भेद करना मुश्किल हो जाता है, और इसके भी दो उप-प्रकार हैं, प्रोटन और ड्यूटन। मेडिकल भाषा में इन्हें प्रोटानोपिया (Protanopia) और ड्यूटेरानोपिया (Deuteranopia) कहा जाता है। 
  • ब्लू-येलो कलर ब्लाइंडनेस (दुर्लभ): दूसरा प्रकार है ब्लू-येलो कलर ब्लाइंडनेस, जो काफी दुर्लभ है और इसमें नीले और पीले रंग में दिक्कत होती है। 
  • टोटल कलर ब्लाइंडनेस या अक्रोमेटोप्सिया (अत्यंत दुर्लभ): तीसरा और सबसे दुर्लभ प्रकार है कंप्लीट कलर ब्लाइंडनेस यानी अक्रोमेटोप्सिया, जिसमें व्यक्ति को दुनिया सिर्फ काले, सफेद और स्लेटी रंग में नजर आती है।

कलर ब्लाइंडनेस की जांच कैसे की जाती है?

अगर ऊपर बताए गए लक्षणों में से कोई भी अपने या अपने बच्चे में नजर आए, तो सबसे जरूरी कदम है सही कलर ब्लाइंडनेस टेस्ट करवाना। यह टेस्ट बहुत आसान है, सिर्फ कुछ मिनट लेता है, और शुरुआती स्क्रीनिंग के लिए बेहद कारगर माना जाता है।

यदि बच्चों या वयस्कों में रंग पहचानने की समस्या दिखे, तो तुरंत ये टेस्ट कराने चाहिए - 

  • इशिहारा टेस्ट (Ishihara Test): यह दुनिया का सबसे भरोसेमंद और सामान्य टेस्ट है। इसमें रंगीन बिंदुओं वाले चार्ट के बीच छिपे नंबर या आकार को पहचानना होता है। इस टेस्ट का उपयोग ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के लिए भी होता है।
  • एडवांस टेस्ट: जिन मामलों में ज्यादा गहराई से जांच की जरूरत होती है, वहां डॉक्टर Farnsworth D-15 टेस्ट या कोन कॉन्ट्रास्ट टेस्ट जैसे विकल्पों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, जो यह बताते हैं कि कलर ब्लाइंडनेस किस प्रकार की है और इसकी गंभीरता कितनी है।

आवश्यक सलाह: बच्चों में 4 से 5 साल की उम्र में यह जांच जरूर करा लेनी चाहिए ताकि स्कूल में उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो। इसके अलावा पायलट, ड्राइवर, डिफेंस और इलेक्ट्रीशियन जैसे करियर के लिए यह टेस्ट अनिवार्य होता है।

क्या कलर ब्लाइंडनेस का इलाज संभव है?

इस स्थिति का इलाज मुख्य रूप से इसके प्रकार पर निर्भर करता है। चलिए दोनों प्रकार के कलर ब्लाइंडनेस के प्रकार के आधार पर इनके इलाज की संभावना को समझते हैं - 

  • जन्मजात (Genetic): यहां सबसे ईमानदार जवाब यही है कि जन्मजात कलर ब्लाइंडनेस का इलाज, यानी इसे पूरी तरह खत्म करना, मौजूदा मेडिकल साइंस में अभी संभव नहीं है, क्योंकि यह आंख की कोन कोशिकाओं की बुनियादी संरचना से जुड़ी समस्या है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि कोई विकल्प मौजूद नहीं है। कुछ खास टिंटेड चश्मे, जैसे EnChroma, कलर कॉन्ट्रास्ट को बढ़ाकर कुछ लोगों को, खासकर हल्की डिग्री वाले रेड-ग्रीन डेफिशियेंसी में, रंगों को बेहतर तरीके से अलग करने में मदद कर सकते हैं।
  • एक्वायर्ड (Acquired): अगर कलर ब्लाइंडनेस एक्वायर्ड है, यानी डायबिटीज, ग्लूकोमा या मोतियाबिंद जैसी किसी बीमारी की वजह से हुई है, तो उस मूल बीमारी का सही इलाज करने पर रंग पहचानने की क्षमता में सुधार आने की संभावना रहती है।

कलर ब्लाइंडनेस के साथ रोजमर्रा की जिंदगी कैसे आसान बनाएं? 

कलर ब्लाइंडनेस के साथ कुछ आसान लाइफ-हैक अपनाकर बेहद सहज और सफल जिंदगी जी जा सकती है -

कलर ब्लाइंडनेस वाले लोगों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने वाले उपयोगी लाइफस्टाइल टिप्स और रंग पहचानने के तरीके।

  • कपड़ों की कोडिंग (Wardrobe Management): मैचिंग की उलझन से बचने के लिए कपड़ों पर कलर लेबल (Tags) लगाएं। या फिर अलमारी में मैचिंग कपड़ों के सेट्स को एक ही हैंगर में साथ रखें ताकि गलत कॉम्बिनेशन का डर न रहे।
  • ट्रैफिक सिग्नल ट्रिक: ड्राइविंग के समय रंगों के बजाय लाइट्स की पोजीशन याद रखें, सबसे ऊपर लाल (रुकना), बीच में पीला (तैयार होना) और सबसे नीचे हरा (चलना)।
  • क्लासरूम और वर्कप्लेस सपोर्ट: टीचर्स या सहकर्मियों को अपनी स्थिति पहले ही बता दें। इससे वे पढ़ाते या प्रेजेंटेशन बनाते समय केवल रंगों के बजाय आकृतियों (Shapes), पैटर्न्स या लेबल का इस्तेमाल करने लगेंगे।
  • स्मार्ट टेक्नोलॉजी: फोन और लैपटॉप की डिस्प्ले सेटिंग में 'Color Correction Mode' को ऑन करें। साथ ही 'Color Identifier' ऐप्स का उपयोग करें, जो कैमरे के जरिए किसी भी वस्तु का सटीक रंग तुरंत बता देते हैं।

निष्कर्ष

रंग पहचानने में दिक्कत होना न तो शर्म की बात है और न ही नजरअंदाज करने वाली बात। चाहे यह बचपन से हो या डायबिटीज, ग्लूकोमा जैसी किसी बीमारी की वजह से बाद में सामने आई हो, सही समय पर सही जांच और थोड़ी सी जागरूकता पूरी जिंदगी को आसान बना सकती है। कलर ब्लाइंडनेस को समझना, इसे स्वीकार करना और इसके साथ सही तरीके से तालमेल बैठाना, यही सबसे व्यावहारिक और स्वस्थ रास्ता है।

अगर आपको या आपके परिवार में किसी को रंग पहचानने में लगातार दिक्कत महसूस हो रही है, तो अंदाजा लगाने में समय बर्बाद न करें। सीधे सीके बिरला अस्पताल (CMRI), कोलकाता के नेत्र रोग विभाग के अनुभवी विशेषज्ञों से अपॉइंटमेंट बुक करें। सही जांच और सही सलाह न केवल स्थिति को साफ करेगी, बल्कि आपकी रोजमर्रा की जिंदगी को भी कहीं ज्यादा आसान बना देगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

सबसे सामान्य प्रकार की कलर ब्लाइंडनेस कौन-सी है?

सबसे सामान्य प्रकार रेड-ग्रीन कलर ब्लाइंडनेस है, जिसमें लाल और हरे रंग के बीच भेद करना मुश्किल होता है। यह दुनियाभर में लगभग 8 प्रतिशत पुरुषों और 0.5 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करती है।

क्या कलर ब्लाइंडनेस आनुवंशिक (Genetic) होती है?

हां, ज्यादातर मामलों में यह X गुणसूत्र पर मौजूद OPN1LW और OPN1MW जीन में बदलाव के कारण होती है। इसी वजह से यह पुरुषों में ज्यादा और महिलाओं में अधिकतर कैरियर के रूप में पाई जाती है।

क्या विशेष चश्मे या लेंस रंग पहचानने में मदद करते हैं?

कुछ खास टिंटेड चश्मे कलर कॉन्ट्रास्ट बढ़ाकर हल्के रेड-ग्रीन डेफिसिएन्सी में मदद कर सकते हैं। हालांकि यह इलाज नहीं है, असर व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग होता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह जरूरी है।

बच्चों में कलर ब्लाइंडनेस का पता कैसे लगाया जा सकता है?

चार से पांच साल की उम्र से Ishihara जैसे सरल कलर विजन टेस्ट से जांच की जा सकती है। स्कूल में दाखिले से पहले यह जांच करवाना सीखने के तरीके को समय पर बेहतर बनाने में मदद करता है।

क्या कलर ब्लाइंडनेस समय के साथ बढ़ सकती है?

जन्मजात कलर ब्लाइंडनेस आमतौर पर जिंदगी भर एक जैसी रहती है। लेकिन एक्वायर्ड कलर ब्लाइंडनेस डायबिटीज, ग्लूकोमा या उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे बिगड़ सकती है, इसलिए नियमित जांच जरूरी है।

क्या महिलाएं भी कलर ब्लाइंडनेस से प्रभावित हो सकती हैं?

हां, हालांकि दर बहुत कम, लगभग 0.5 प्रतिशत, होती है, क्योंकि महिलाओं को इसके लिए दोनों X क्रोमोसोम में बदलाव चाहिए होता है। ज्यादातर महिलाएं सिर्फ इस जीन की कैरियर होती हैं और खुद प्रभावित नहीं होती।

क्या ड्राइविंग लाइसेंस या कुछ नौकरियों के लिए कलर ब्लाइंडनेस टेस्ट जरूरी है?

हां, पायलट, ट्रेन ड्राइवर, डिफेंस सेवाओं और इलेक्ट्रीशियन जैसे पेशों में रंग पहचानने की क्षमता की जांच अनिवार्य होती है, क्योंकि इन कामों में रंग की सही पहचान सीधे सुरक्षा से जुड़ी होती है।

Written and Verified by:

Dr. Bhaskar Ray Chaudhuri

Dr. Bhaskar Ray Chaudhuri

Consultant - Ophthalmologist Exp: 36 Yr

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Dr. Bhaskar Ray Chaudhuri is a Consultant in Ophthalmology Dept. at CMRI, Kolkata, with over 25 years of experience. He specializes in cataract surgery, corneal transplants, keratoconus management, dry eye disease treatment, and glaucoma management.

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