
क्या आपने कभी सीढ़ियां चढ़ते वक्त अचानक पिंडली में ऐसा दर्द महसूस किया है, जो थोड़ी देर बैठने के बाद अपने आप गायब हो जाए? या फिर सर्दियों में जब बाकी शरीर गर्म हो, लेकिन आपके पैर बर्फ जैसे ठंडे बने रहते हैं? ज्यादातर लोग इसे थकान, उम्र का असर या मौसम का बहाना मानकर टाल देते हैं।
लेकिन कई बार यही मामूली सी तकलीफ पैरों की नसों में ब्लॉकेज यानी पेरिफेरल वैस्कुलर रोग का पहला इशारा होती है। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसके बारे में आज भी बहुत कम लोग खुलकर बात करते हैं। शर्म, डर या जानकारी की कमी के चलते मरीज अक्सर इलाज में देरी कर देते हैं, और यही देरी आगे चलकर गंभीर परेशानी बन सकती है। इस ब्लॉग में हम आपको इस विषय पर पूरी, आसान भाषा में और भरोसेमंद जानकारी देंगे, ताकि आप समय रहते सही कदम उठा सकें। अगर आपको या आपके परिवार में किसी को ऐसे लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो देर न करें और हमारे अनुभवी वैस्कुलर सर्जन से अपॉइंटमेंट बुक करें।
पेरिफेरल वैस्कुलर रोग क्या है, यह समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि हमारे पैरों तक खून धमनियों (आर्टरीज) के जरिए पहुंचता है। जब इन धमनियों की अंदरूनी दीवारों पर फैट, कोलेस्ट्रॉल और कैल्शियम की परतें जमने लगती हैं, तो इसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है। यही जमाव धीरे-धीरे रास्ता संकरा करता जाता है और खून का बहाव कम होने लगता है। इसी स्थिति को पेरिफेरल आर्टरी डिजीज भी कहा जाता है।
एक हालिया मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, टाइप 2 डायबिटीज वाले भारतीय मरीजों में पेरिफेरल आर्टरी डिजीज की औसत दर करीब 18 प्रतिशत तक पाई गई है, जबकि दक्षिण भारत के कुछ रिसर्च में बुजुर्ग आबादी में यह आंकड़ा 26 प्रतिशत से भी ऊपर देखा गया है। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि यह समस्या जितनी छिपी हुई मानी जाती है, असल में उतनी ही आम है।

इसके पीछे मुख्य कारण इस तरह हैं -
दिलचस्प बात यह है कि जिन मरीजों को पहले से हृदय रोग या कोरोनरी आर्टरी डिजीज है, उनमें पैरों की नसों में ब्लॉकेज का खतरा भी काफी बढ़ जाता है, क्योंकि दोनों बीमारियों की जड़ एक जैसी ही होती है, यानी धमनियों में जमाव।
पैरों की नसों में ब्लॉकेज के लक्षण अक्सर शुरुआत में इतने हल्के होते हैं कि लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन समय के साथ ये लक्षण बढ़ते जाते हैं और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगते हैं।
सबसे आम शुरुआती संकेतों में शामिल हैं -
हमारे अस्पताल में ऐसे कई मरीज आ चुके हैं जिन्होंने शुरुआत में इसे सामान्य पैर दर्द समझकर नजरअंदाज किया, और बाद में जब वे जांच के लिए पहुंचे, तब तक ब्लॉकेज काफी बढ़ चुका था। ऐसे मामलों में समय पर इलाज शुरू करने से न सिर्फ पैर बचाया जा सका, बल्कि मरीज की सामान्य जिंदगी भी वापस लौट आई।
डायबिटीज के मरीजों को दर्द का अहसास कम होता है, इसलिए सही समय पर ये जांचें बेहद जरूरी हैं। पैरों की नसों में ब्लॉकेज की जांच के लिए निम्नलिखित टेस्ट का सुझाव दिया जा सकता है -
इन दो टेस्ट की मदद से पहचाना जा सकता है कि ब्लॉकेज कहां है और कितनी गंभीर है, जिसकी मदद से इलाज करने में सहायता मिल सकती है।
ब्लॉकेज की स्टेज के आधार पर डॉक्टर इलाज तय करते हैं और इस स्टेज की पुष्टि ऊपर बताए गए टेस्ट के परिणाम के आधार पर हो सकती है -
डायबिटीज और बढ़ती उम्र के कारण पैरों की नसों में ब्लॉकेज (Peripheral Artery Disease) का खतरा काफी बढ़ जाता है। ऐसे मरीजों के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है -
पैरों की नसों में ब्लॉकेज कोई ऐसी बीमारी नहीं है, जिसे शर्म के कारण छुपाया जाए। यह एक मेडिकल स्थिति है, जिसका समय पर पता लगाकर पूरी तरह से प्रबंधन किया जा सकता है। अगर आपको चलते समय पैरों में दर्द, ठंडापन या घाव न भरने जैसी समस्याएं महसूस हो रही हैं, तो इसे मामूली न समझें। सही समय पर हमारे वैस्कुलर सर्जन से मिलना न केवल आपके पैर को बचा सकता है, बल्कि आपकी पूरी जीवन शैली को भी बेहतर बना सकता है। अपनी सेहत को प्राथमिकता दें और आज ही विशेषज्ञ से अपॉइंटमेंट बुक करें।
हां, अगर समय पर इलाज न हो तो यह गंभीर घाव, इन्फेक्शन और कुछ मामलों में पैर काटने तक की नौबत ला सकता है। शुरुआती जांच और इलाज से इसे पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।
जी हां, जब धमनियों में ब्लॉकेज के कारण खून का बहाव कम हो जाता है, तो पैर या पंजे ठंडे महसूस हो सकते हैं, खासकर दूसरे पैर की तुलना में।
अगर चलते समय दर्द होता है और आराम करने पर ठीक हो जाता है, तो यह पेरिफेरल वैस्कुलर रोग का शुरुआती संकेत हो सकता है, इसकी जांच जरूर करवाएं।
आमतौर पर 70 प्रतिशत से अधिक ब्लॉकेज होने पर, खासकर लक्षण गंभीर होने की स्थिति में, डॉक्टर एंजियोप्लास्टी या सर्जरी की सलाह देते हैं।
हां, लंबे समय तक अनियंत्रित डायबिटीज धमनियों को नुकसान पहुंचाती है, जिससे पेरिफेरल आर्टरी डिजीज का खतरा काफी बढ़ जाता है।
शुरुआती स्टेज में लाइफस्टाइल में बदलाव, दवाइयों और नियमित वॉकिंग से इसे नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन गंभीर मामलों में सर्जरी ही एकमात्र प्रभावी विकल्प रहती है।
नहीं, हालांकि उम्र के साथ खतरा बढ़ता है, लेकिन जो लोग धूम्रपान करते हैं या जिन्हें कम उम्र में डायबिटीज है, उनमें भी यह समस्या हो सकती है।
Written and Verified by:

Dr. Ashish Airen is a Senior Consultant in the Department of Vascular Surgery at CK Birla Hospitals, Jaipur, with expertise in the diagnosis and treatment of diseases affecting the arteries, veins, and lymphatic system. He specializes in both minimally invasive endovascular procedures and advanced open vascular surgeries, offering comprehensive care for patients with simple to complex vascular conditions.
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