पैरों की नसों में ब्लॉकेज: पेरिफेरल वैस्कुलर सर्जरी कब जरूरी होती है?
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पैरों की नसों में ब्लॉकेज: पेरिफेरल वैस्कुलर सर्जरी कब जरूरी होती है?

Summary

  • पैरों की नसों में ब्लॉकेज यानी पेरिफेरल वैस्कुलर रोग, पैरों तक खून पहुंचाने वाली धमनियों के सिकुड़ने या बंद होने से होता है।
  • शुरुआती लक्षणों में चलते समय पिंडली में दर्द, पैर का ठंडा रहना, घाव न भरना और सुन्नपन शामिल हैं।
  • डायबिटीज, स्मोकिंग, हाई कोलेस्ट्रॉल और हाई बीपी इसके सबसे बड़े कारण हैं।
  • शुरुआती स्टेज में दवाइयों और लाइफस्टाइल बदलाव से इलाज संभव है, लेकिन गंभीर ब्लॉकेज में एंजियोप्लास्टी या बाईपास सर्जरी की जरूरत पड़ती है।
  • समय पर जांच और इलाज न होने पर पैर गंवाने तक का खतरा हो सकता है, इसलिए लक्षण दिखते ही वैस्कुलर सर्जन से सलाह लेना जरूरी है।

क्या आपने कभी सीढ़ियां चढ़ते वक्त अचानक पिंडली में ऐसा दर्द महसूस किया है, जो थोड़ी देर बैठने के बाद अपने आप गायब हो जाए? या फिर सर्दियों में जब बाकी शरीर गर्म हो, लेकिन आपके पैर बर्फ जैसे ठंडे बने रहते हैं? ज्यादातर लोग इसे थकान, उम्र का असर या मौसम का बहाना मानकर टाल देते हैं। 

लेकिन कई बार यही मामूली सी तकलीफ पैरों की नसों में ब्लॉकेज यानी पेरिफेरल वैस्कुलर रोग का पहला इशारा होती है। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसके बारे में आज भी बहुत कम लोग खुलकर बात करते हैं। शर्म, डर या जानकारी की कमी के चलते मरीज अक्सर इलाज में देरी कर देते हैं, और यही देरी आगे चलकर गंभीर परेशानी बन सकती है। इस ब्लॉग में हम आपको इस विषय पर पूरी, आसान भाषा में और भरोसेमंद जानकारी देंगे, ताकि आप समय रहते सही कदम उठा सकें। अगर आपको या आपके परिवार में किसी को ऐसे लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो देर न करें और हमारे अनुभवी वैस्कुलर सर्जन से अपॉइंटमेंट बुक करें।

पैरों की नसों में ब्लॉकेज क्यों होता है? 

पेरिफेरल वैस्कुलर रोग क्या है, यह समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि हमारे पैरों तक खून धमनियों (आर्टरीज) के जरिए पहुंचता है। जब इन धमनियों की अंदरूनी दीवारों पर फैट, कोलेस्ट्रॉल और कैल्शियम की परतें जमने लगती हैं, तो इसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है। यही जमाव धीरे-धीरे रास्ता संकरा करता जाता है और खून का बहाव कम होने लगता है। इसी स्थिति को पेरिफेरल आर्टरी डिजीज भी कहा जाता है।

एक हालिया मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, टाइप 2 डायबिटीज वाले भारतीय मरीजों में पेरिफेरल आर्टरी डिजीज की औसत दर करीब 18 प्रतिशत तक पाई गई है, जबकि दक्षिण भारत के कुछ रिसर्च में बुजुर्ग आबादी में यह आंकड़ा 26 प्रतिशत से भी ऊपर देखा गया है। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि यह समस्या जितनी छिपी हुई मानी जाती है, असल में उतनी ही आम है।

पैरों की नसों में ब्लॉकेज

इसके पीछे मुख्य कारण इस तरह हैं - 

  • लंबे समय से अनियंत्रित डायबिटीज
  • धूम्रपान और तंबाकू का सेवन
  • हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल
  • मोटापा और शारीरिक गतिविधि की कमी
  • उम्र बढ़ने के साथ धमनियों का प्राकृतिक रूप से कमजोर होना
  • पारिवारिक इतिहास में हृदय या नसों से जुड़ी बीमारियां

दिलचस्प बात यह है कि जिन मरीजों को पहले से हृदय रोग या कोरोनरी आर्टरी डिजीज है, उनमें पैरों की नसों में ब्लॉकेज का खतरा भी काफी बढ़ जाता है, क्योंकि दोनों बीमारियों की जड़ एक जैसी ही होती है, यानी धमनियों में जमाव।

पैरों की नसों में ब्लॉकेज के कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं?

पैरों की नसों में ब्लॉकेज के लक्षण अक्सर शुरुआत में इतने हल्के होते हैं कि लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन समय के साथ ये लक्षण बढ़ते जाते हैं और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगते हैं।

सबसे आम शुरुआती संकेतों में शामिल हैं - 

  • चलते समय पिंडली, जांघ या कूल्हे में दर्द या ऐंठन होना, जो आराम करने पर कम हो जाता है, जिसे मेडिकल भाषा में इंटरमिटेंट क्लॉडिकेशन कहा जाता है। 
  • पैर या पंजे का ठंडा रहना, पैरों की त्वचा का रंग बदलना, पैरों पर बाल कम होना, नाखूनों का धीमी गति से बढ़ना, और छोटे-छोटे घावों का देर तक न भरना।
  • गंभीर स्थिति में मरीज को रात में सोते समय भी पैर में तेज दर्द महसूस हो सकता है, जिसे रेस्ट पेन कहा जाता है। 
  • कुछ मामलों में पैर की उंगलियों तक खून का बहाव इतना कम हो जाता है कि वहां घाव या अल्सर बनने लगते हैं, जो धीरे-धीरे गैंग्रीन का रूप भी ले सकते हैं। 

हमारे अस्पताल में ऐसे कई मरीज आ चुके हैं जिन्होंने शुरुआत में इसे सामान्य पैर दर्द समझकर नजरअंदाज किया, और बाद में जब वे जांच के लिए पहुंचे, तब तक ब्लॉकेज काफी बढ़ चुका था। ऐसे मामलों में समय पर इलाज शुरू करने से न सिर्फ पैर बचाया जा सका, बल्कि मरीज की सामान्य जिंदगी भी वापस लौट आई।

डायग्नोसिस: ब्लॉकेज की गंभीरता कैसे जांचें?

डायबिटीज के मरीजों को दर्द का अहसास कम होता है, इसलिए सही समय पर ये जांचें बेहद जरूरी हैं। पैरों की नसों में ब्लॉकेज की जांच के लिए निम्नलिखित टेस्ट का सुझाव दिया जा सकता है - 

  • एंकल-ब्रैकियल इंडेक्स (ABI): बांह और टखने के ब्लड प्रेशर की तुलना करके ब्लड फ्लो का मापना।
  • इमेजिंग टेस्ट: सटीक ब्लॉकेज का पता लगाने के लिए डॉपलर अल्ट्रासाउंड, सीटी एंजियोग्राफी और डिजिटल सबट्रैक्शन एंजियोग्राफी।

इन दो टेस्ट की मदद से पहचाना जा सकता है कि ब्लॉकेज कहां है और कितनी गंभीर है, जिसकी मदद से इलाज करने में सहायता मिल सकती है।

इलाज के विकल्प: दवा से लेकर सर्जरी तक

ब्लॉकेज की स्टेज के आधार पर डॉक्टर इलाज तय करते हैं और इस स्टेज की पुष्टि ऊपर बताए गए टेस्ट के परिणाम के आधार पर हो सकती है - 

  • जीवनशैली और दवाएं: धूम्रपान छोड़ना, सुपरवाइज्ड वॉकिंग, वजन नियंत्रण, और खून पतला करने या कोलेस्ट्रॉल कम करने की दवाएं।
  • एंजियोप्लास्टी: न्यूनतम चीरे वाली प्रक्रियाएं, जिसमें बैलून कैथेटर और स्टेंट के जरिए ब्लॉकेज को खोला जाता है।
  • बाईपास सर्जरी: ब्लॉकेज 70% से ज्यादा होने पर खुद की नस या सिंथेटिक ग्राफ्ट से खून के बहाव का नया रास्ता बनाना।

बुजुर्गों और डायबिटीज के मरीजों के लिए विशेष सावधानियां

डायबिटीज और बढ़ती उम्र के कारण पैरों की नसों में ब्लॉकेज (Peripheral Artery Disease) का खतरा काफी बढ़ जाता है। ऐसे मरीजों के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है - 

  • दर्द महसूस न होना (Neuropathy): डायबिटीज के कारण पैरों की नसें सुन्न हो सकती हैं। ऐसे में चोट, छाले या ब्लॉकेज का दर्द देर से महसूस होता है, जिससे स्थिति गंभीर हो सकती है।
  • रोजाना पैरों की जांच (Daily Foot Care): हर दिन अपने पैरों, उंगलियों के बीच और तलवों की जांच करें। त्वचा के रंग में बदलाव, कट या घाव दिखने पर उसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें।
  • शुगर और ब्लड प्रेशर पर सख्त नियंत्रण: अपने ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखकर नसों के ब्लॉकेज को तेजी से बढ़ने से रोका जा सकता है।
  • सही फुटवियर का चुनाव: हमेशा आरामदायक और सही फिटिंग वाले जूते पहनें। घर के अंदर भी नंगे पैर चलने से बचें ताकि किसी भी तरह की छोटी चोट से भी बचा जा सके।
  • नियमित प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग: लक्षण न होने पर भी, बुजुर्गों और डायबिटीज के मरीजों को साल में कम से कम एक बार प्रिवेंटिव वैस्कुलर चेकअप (जैसे ABI टेस्ट) जरूर करवाना चाहिए।

निष्कर्ष

पैरों की नसों में ब्लॉकेज कोई ऐसी बीमारी नहीं है, जिसे शर्म के कारण छुपाया जाए। यह एक मेडिकल स्थिति है, जिसका समय पर पता लगाकर पूरी तरह से प्रबंधन किया जा सकता है। अगर आपको चलते समय पैरों में दर्द, ठंडापन या घाव न भरने जैसी समस्याएं महसूस हो रही हैं, तो इसे मामूली न समझें। सही समय पर हमारे वैस्कुलर सर्जन से मिलना न केवल आपके पैर को बचा सकता है, बल्कि आपकी पूरी जीवन शैली को भी बेहतर बना सकता है। अपनी सेहत को प्राथमिकता दें और आज ही विशेषज्ञ से अपॉइंटमेंट बुक करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

हां, अगर समय पर इलाज न हो तो यह गंभीर घाव, इन्फेक्शन और कुछ मामलों में पैर काटने तक की नौबत ला सकता है। शुरुआती जांच और इलाज से इसे पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

Written and Verified by:

Dr. Ashish Airen

Dr. Ashish Airen

Senior Consultant Exp: 6 Yr

Vascular Surgery

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Dr. Ashish Airen is a Senior Consultant in the Department of Vascular Surgery at CK Birla Hospitals, Jaipur, with expertise in the diagnosis and treatment of diseases affecting the arteries, veins, and lymphatic system. He specializes in both minimally invasive endovascular procedures and advanced open vascular surgeries, offering comprehensive care for patients with simple to complex vascular conditions. 

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