
जिस बच्चे ने अभी दुनिया की पहली सांस ली है, उसके लिए हवा सिर्फ एक जरूरत नहीं बल्कि जिंदगी की नींव है। और जब यही हवा जहरीली हो, तो सवाल उठना लाजमी है, क्या प्रदूषित हवा में जन्मे नवजात को सच में ज्यादा खतरा होता है? इसका जवाब है, हाँ। नवजात शिशु का शरीर, खासकर उसके फेफड़े और इम्यून सिस्टम, अभी अधूरे विकास की अवस्था में होता है। यही वजह है कि प्रदूषित हवा से होने वाली बीमारी बड़ों की तुलना में उन्हें कहीं ज्यादा जल्दी और गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
अगर आपके घर में भी नन्हा मेहमान आने वाला है, या हाल ही में आया है, और आप शहर की खराब हवा को लेकर चिंतित हैं, तो यह घबराहट बिल्कुल स्वाभाविक है। यह चिंता स्वाभाविक है, लेकिन सही जानकारी और बचाव के तरीकों से जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इस ब्लॉग में हम आपको वो हर जानकारी देंगे जो एक जागरूक माता-पिता के तौर पर आपके पास होनी चाहिए। अगर आपको अपने बच्चे में किसी भी तरह के लक्षण नजर आ रहे हैं, तो देरी न करें, हमारे अनुभवी बाल रोग विशेषज्ञों से अभी अपॉइंटमेंट बुक करें।
नवजात शिशु का शरीर बड़ों के मुकाबले हर मिनट अपने शरीर के वजन के हिसाब से कहीं ज्यादा हवा अंदर लेता है। उनकी सांस लेने की दर तेज होती है, फेफड़ों की एयर सैक्स (एल्विओलाई) अभी बन ही रही होती हैं, और इम्यून सिस्टम भी संक्रमणों से लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होता। इसी वजह से PM2.5 जैसे बारीक कण, जो बालों से भी पतले होते हैं, सीधे उनके फेफड़ों में गहराई तक पहुंच जाते हैं और खून में भी मिल सकते हैं।
UNICEF और WHO की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में हर दिन लगभग 2,000 बच्चे पांच साल की उम्र से पहले वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों की वजह से अपनी जान गंवा देते हैं, और नवजात मृत्यु में करीब एक चौथाई मामलों का संबंध कहीं न कहीं प्रदूषण, कम जन्म वजन और समय से पहले प्रसव से जुड़ा पाया गया है। भारत के संदर्भ में भी आंकड़े चिंताजनक हैं, कई रिसर्च बताते हैं कि गर्भावस्था के आखिरी महीनों में मां का प्रदूषित हवा के संपर्क में रहना, बच्चे के कम वजन के साथ जन्म लेने और समय से पहले प्रसव के खतरे को बढ़ा देता है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि गर्भ में रहते हुए ही असर शुरू हो जाता है। जब गर्भवती महिला प्रदूषित हवा में सांस लेती है, तो हानिकारक तत्व प्लेसेंटा के जरिए भ्रूण तक भी पहुंच सकते हैं। इसका नतीजा होता है:
जन्म के बाद अगर बच्चा उसी तरह की प्रदूषित हवा में सांस लेता रहे, तो निमोनिया, ब्रोंकाइटिस, बार-बार सर्दी-जुकाम और अस्थमा जैसी सांस की बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
हर मां-बाप को यह पहचानना जरूरी है कि कौन से लक्षण मामूली हैं और कौन से इशारा करते हैं कि अब देर करना ठीक नहीं। नीचे दिए गए संकेतों को कभी नजरअंदाज न करें -

अगर इनमें से कोई भी लक्षण दिखे, तो घरेलू उपाय आजमाने में समय बर्बाद न करें। नवजात का शरीर बहुत नाजुक होता है और स्थिति कुछ ही घंटों में गंभीर हो सकती है।
नवजात को प्रदूषण से बचाने के उपाय अपनाना उतना मुश्किल नहीं जितना लगता है, बस थोड़ी सजगता और नियमितता चाहिए।
जब शहर का AQI गंभीर श्रेणी में पहुंच जाए, तो सिर्फ बच्चे का नहीं, पूरे घर के माहौल का ध्यान रखना जरूरी हो जाता है। बच्चे के कपड़े और बिस्तर बार-बार धोएं, क्योंकि प्रदूषक कण कपड़ों पर भी जमा हो जाते हैं। घर में आने वाले किसी भी व्यक्ति को कुछ देर हाथ-मुंह धोने के बाद ही बच्चे को गोद में लेने दें, खासकर अगर वे बाहर से सीधे आए हों। इसके अलावा बच्चे के कमरे में इंडोर पौधे रखने से बचें अगर आपको फंगस या नमी की समस्या रहती है, क्योंकि इससे भी हवा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। सबसे जरूरी बात है कि अपने खुद के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें, अगर मां को खांसी-जुकाम या सांस से जुड़ी कोई तकलीफ है, तो मास्क पहनकर ही बच्चे के पास जाएं।
निम्नलिखित लक्षण दिखने पर बिना देर किए हमारे अनुभवी विशेषज्ञों से परामर्श लें और अपने बच्चों के स्वास्थ्य का खास ख्याल रखें -
नवजात शिशु की देखभाल कैसे करें, यह सवाल हर नए माता-पिता के मन में सबसे पहले आता है, और आज के दौर में इसमें एक जरूरी अध्याय जुड़ गया है, प्रदूषण से बचाव का। खराब हवा को पूरी तरह रोक पाना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन अपने घर के अंदर एक सुरक्षित और साफ माहौल बनाना जरूर हमारे हाथ में है। थोड़ी सी सजगता, सही जानकारी और समय पर डॉक्टरी सलाह, यही तीन चीजें आपके नवजात को इस चुनौतीपूर्ण मौसम में सुरक्षित रखने की कुंजी है। अगर आपको अपने बच्चे को लेकर कोई भी शंका है, तो इंतजार न करें, सीके बिरला अस्पताल, जयपुर के अनुभवी बाल रोग विशेषज्ञों से परामर्श लें और अपने नन्हे मेहमान का भविष्य सुरक्षित बनाएं।
हां, प्रदूषण से बच्चों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया और बार-बार खांसी-जुकाम जैसी सांस की समस्याएं हो सकती हैं। नवजात के फेफड़े विकसित न होने के कारण उन पर असर और भी जल्दी पड़ता है।
घर के अंदर एयर प्यूरीफायर लगाएं, खराब AQI में बाहर ले जाने से बचें, स्तनपान कराएं, धूम्रपान से दूर रखें और नियमित सफाई से धूल-मिट्टी को कम करें।
हां, HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर PM2.5 जैसे बारीक कणों को काफी हद तक फिल्टर कर देता है, जिससे बच्चे के कमरे की हवा स्वच्छ और सुरक्षित बनी रहती है।
तेज सांस, पसलियों का धंसना, नाक फुलाकर सांस लेना, होंठ या चेहरे का नीला पड़ना, और दूध पीते समय सांस फूलना, ये सभी गंभीर संकेत हैं जिन पर तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।
बिल्कुल, मां के दूध में मौजूद एंटीबॉडीज नवजात के इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाती हैं और उसे संक्रमण व प्रदूषण के दुष्प्रभावों से लड़ने में मदद करती हैं।
खिड़कियां जरूरत पड़ने पर बंद रखें, धुएं और अगरबत्ती से दूरी बनाएं, गीली सफाई करें, बच्चे के कपड़े-बिस्तर नियमित धोएं और घर में आने वालों को पहले हाथ-मुंह धोने दें।
हां, प्रीमैच्योर बच्चों के फेफड़े और इम्यून सिस्टम सामान्य नवजात से भी ज्यादा कमजोर होते हैं, इसलिए उन्हें प्रदूषित हवा से बचाने में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
गर्भवती महिलाओं को खराब AQI के दौरान बाहर निकलने से बचना चाहिए, N95 मास्क पहनना चाहिए, घर के अंदर हवा साफ रखनी चाहिए और नियमित प्रसव पूर्व जांच करानी चाहिए।
Written and Verified by:

Dr. Shivani Swami is a highly accomplished pulmonologist with over 16 years of clinical experience, specializing in Pulmonology, Sleep Medicine, and Allergy & Immunology. She holds a MD, along with prestigious international fellowships including FCCP (USA) and Fellowship in Interventional Pulmonology (UK).
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