
“रिपोर्ट में शुगर थोड़ी ज्यादा निकली? इसे "थोड़ा-सा ज्यादा" समझकर मत टालिए”
डॉक्टर ने रिपोर्ट देखी, माथे पर थोड़ी शिकन आई और कहा "आपकी शुगर थोड़ी बॉर्डर लाइन पर है।" और आपने सोचा, "अरे, डायबिटीज तो नहीं है ना, फिर क्या चिंता?"
यही वो गलती है जो लाखों भारतीय हर साल करते हैं। जो स्थिति डॉक्टर ने "बॉर्डर लाइन" कही, उसका असली नाम है प्री-डायबिटीज (Prediabetes) और यह एक ऐसी स्थिति है जो चुपचाप, बिना किसी तकलीफ के आपके शरीर में टाइप-2 डायबिटीज की नींव रख रही होती है।
लेकिन यहां एक बड़ी राहत की बात भी है। प्री-डायबिटीज वह आखिरी मौका है, जब आप सही कदम उठाकर डायबिटीज को आने से पूरी तरह रोक सकते हैं। यह एक चेतावनी है, सजा नहीं।
इस ब्लॉग में हम प्री-डायबिटीज क्या होता है, इसके लक्षण, कारण, डाइट प्लान और इलाज के बारे में सब कुछ बताएंगे। अगर आप या आपके परिवार में किसी की रिपोर्ट में शुगर बॉर्डर लाइन आई है, तो सीके बिरला हॉस्पिटल, कोलकाता (CMRI) के एंडोक्रिनोलॉजी विशेषज्ञों से आज ही परामर्श बुक करें, क्योंकि यह वक्त कार्रवाई का है, इंतजार का नहीं।
प्री-डायबिटीज का मतलब यह है कि आपके खून में शुगर (ग्लूकोज) का स्तर सामान्य से ज्यादा हो गया है, लेकिन अभी वह टाइप-2 डायबिटीज की श्रेणी में नहीं आया। एक प्रतिष्ठित संस्थान के अनुसार, एक स्वस्थ व्यक्ति का फास्टिंग ब्लड शुगर 70 से 99 mg/dL होता है। प्री-डायबिटीज में यही रीडिंग 100 से 125 mg/dL के बीच रहती है। जब यह 126 mg/dL या उससे ऊपर चली जाए, तो टाइप-2 डायबिटीज की पुष्टि हो जाती है।
HbA1c (Glycated Hemoglobin) के पैमाने पर देखें तो:
इसकी मूल वजह है इंसुलिन प्रतिरोध (Insulin Resistance)। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो खाने के बाद खून में से शुगर को कोशिकाओं तक पहुंचाता है। जब मांसपेशियां, लीवर और वसा कोशिकाएं इंसुलिन के संकेत को ठीक से प्रतिक्रिया नहीं करतीं, तो ग्लूकोज खून में ही जमा रहने लगता है। शुरुआत में अग्न्याशय (Pancreas) ज्यादा इंसुलिन बनाकर इसकी भरपाई करता है, लेकिन एक वक्त आता है, जब यह संतुलन बिगड़ जाता है और ब्लड शुगर बढ़ने लगती है।
2025 में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक भारत में 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज से ग्रस्त हैं। यह अमेरिका की पूरी आबादी के करीब आधे के बराबर है और 2023 के HbA1c आधारित एक बड़े रिसर्च में पाया गया कि जांचे गए लोगों में 22 प्रतिशत से ज्यादा प्री-डायबिटीज की श्रेणी में थे। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इनमें से अधिकांश को इसकी खबर ही नहीं थी।
यहीं से असली चुनौती शुरू होती है। ज्यादातर मामलों में प्री-डायबिटीज के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। रिपोर्ट बताती है कि 10 में से 8 से ज्यादा लोग जिन्हें प्री-डायबिटीज है, उन्हे इसका पता ही नहीं होता है।
हालांकि कुछ संकेत ऐसे होते हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए:
चूंकि लक्षण अक्सर नजर नहीं आते, इसलिए 30 साल की उम्र के बाद साल में एक बार फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c जांच जरूर करानी चाहिए। अगर परिवार में डायबिटीज की मेडिकल हिस्ट्री हो, मोटापा हो या बैठे रहने वाली जीवनशैली हो तो जांच और जल्दी शुरू करें।
यह सवाल बहुत जरूरी है क्योंकि लोग अक्सर दोनों को एक ही मान लेते हैं, जो सही नहीं है। इन दोनों के बीच के अंतर को आप आसानी से इस इंफोग्राफिक की मदद से समझ सकते हैं -

सबसे बड़ा फर्क यही है कि प्री-डायबिटीज की अवस्था में शरीर अभी भी पूरी तरह वापस आ सकता है। एक बार टाइप-2 डायबिटीज हो जाए तो उसे सिर्फ नियंत्रित किया जा सकता है, पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता।
जी हाँ, और यही इस पूरे ब्लॉग का सबसे जरूरी जवाब है। अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन (American Diabetes Association) की रिसर्च बताती है कि जो लोग अपने वजन का 5 से 7 प्रतिशत कम करते हैं और हफ्ते में 150 मिनट की मध्यम कसरत करते हैं, उनमें टाइप-2 डायबिटीज होने का खतरा 58 प्रतिशत तक कम हो जाता है। 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में यह आंकड़ा 71 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।
प्री-डायबिटीज रिवर्स करने के तीन मुख्य स्तंभ हैं:
खानपान में बदलाव सबसे तेज और सबसे असरदार तरीका है।
क्या खाएं:
क्या कम करें या बंद करें:
नोट: कुछ लोगों को लगता है कि सिर्फ मीठा बंद करके वह डायबिटीज की समस्या से निजात पा सकते हैं, लेकिन शुगर के साथ-साथ उन्हे तला भुना खाना भी छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि अत्यधिक तला-भुना खाना शरीर में इंसुलिन प्रतिरोध (Insulin Resistance) को बढ़ाता है, जिससे इंसुलिन अपना काम ठीक से नहीं कर पाता।
प्री-डायबिटीज में गुड़ के बारे में एक जरूरी बात: यह सवाल बहुत आम है। गुड़ सफेद चीनी से थोड़ा कम प्रसंस्कृत होता है और इसमें कुछ खनिज भी होते हैं, लेकिन इसकी शुगर की मात्रा उतनी ही होती है। प्री-डायबिटीज में गुड़ भी बहुत सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए और डॉक्टर की सलाह के बाद। यह स्वस्थ विकल्प नहीं है।
व्यायाम मांसपेशियों को इंसुलिन के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाता है, जो सीधे ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है।
पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी इंसुलिन प्रतिरोध को बढ़ाती है। वजन में 5 से 10 प्रतिशत की कमी भी बड़ा फर्क डालती है। साथ ही क्रोनिक तनाव कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ाता है, जो ब्लड शुगर को ऊपर ले जाता है। ध्यान, नींद और सामाजिक जुड़ाव इस दिशा में मदद करते हैं।
घरेलू बदलाव जरूरी है, लेकिन कुछ स्थितियों में डॉक्टर से मिलना न टालें -
प्री-डायबिटीज एक खतरे की घंटी है, लेकिन यह अंत नहीं है। यह शरीर का वो दरवाजा है, जो अभी भी बंद किया जा सकता है, बशर्ते आप उस पर ध्यान दें।
भारत में 13.6 करोड़ लोग इस स्थिति में हैं और उनमें से ज्यादातर को इसका पता तक नहीं है। अगर आप उन चंद लोगों में हैं जिन्हें पता है, तो यह जानकारी ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है। प्री-डायबिटीज डाइट प्लान अपनाएं, रोज चलें, वजन पर नजर रखें और जरूरत पड़े तो विशेषज्ञ से मिलें। यह सिर्फ शुगर कंट्रोल करने की बात नहीं है, यह आपके आने वाले 20-30 साल की सेहत को बचाने की बात है।
हां, ज्यादातर मामलों में सही डाइट, नियमित व्यायाम और वजन घटाने से प्री-डायबिटीज बिना दवा के ठीक हो सकती है। जीवनशैली में बदलाव डायबिटीज का खतरा 58 प्रतिशत तक कम करता है।
बिना किसी बदलाव के, प्री-डायबिटीज 3 से 5 साल में टाइप-2 डायबिटीज बन सकती है। कुछ मामलों में यह और जल्दी भी हो सकता है, खासकर अगर वजन ज्यादा हो और जीवनशैली खराब हो।
हां, रोज 30 मिनट की मध्यम कसरत मांसपेशियों की इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाती है और ब्लड शुगर को नियंत्रित करती है। डाइट के साथ मिलाकर यह सबसे असरदार तरीका है।
पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं, लेकिन बहुत सीमित करना जरूरी है। सफेद चीनी, मिठाइयां, कोल्ड ड्रिंक और पैकेटबंद जूस से बचें। प्राकृतिक मिठास जैसे फलों में मौजूद शुगर सीमित मात्रा में ठीक है।
हां, TOFI यानी "Thin Outside Fat Inside" एक वास्तविक स्थिति है। पेट के अंदर जमा आंत की चर्बी (Visceral Fat) उन लोगों में भी हो सकती है जो दिखने में पतले हों। बैठे रहने की आदत और खराब खान-पान किसी को भी प्रभावित कर सकते हैं।
सफेद मैदा, सफेद चावल की ज्यादा मात्रा, मीठे पेय, पैकेटबंद स्नैक्स, तला हुआ खाना, फास्ट फूड और मिठाइयों से परहेज करें। ये सब तेजी से ब्लड शुगर बढ़ाते हैं।
गुड़ चीनी का विकल्प नहीं है। इसमें शुगर की मात्रा लगभग उतनी ही होती है। प्री-डायबिटीज में गुड़ बहुत कम मात्रा में और केवल डॉक्टर की सलाह पर लें।
30 साल की उम्र के बाद साल में एक बार फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c जांच जरूर कराएं। अगर परिवार में डायबिटीज का इतिहास हो या BMI 25 से ज्यादा हो तो 25 साल की उम्र से ही शुरू करें।
Written and Verified by:
-Dr.-Kallyan-Kumar-Gangopadhya-(-Endocrinology-).webp&w=256&q=75)
Consultant - Diabetes & Endocrinology Exp: 34 Yr
Endocrinology
Dr. Kalyan Kumar Gangopadhyay is a Consultant in Diabetes & Endocrinology Dept. at CMRI Hospital, Kolkata. He specializes in diabetes management, thyroid disorders, lipid disorders, and metabolic diseases.
Similar Endocrinology Blogs
Book Your Appointment TODAY
© 2024 CMRI Kolkata. All Rights Reserved.