
हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा स्वस्थ रहे, समय पर चलना सीखे और अपनी मीठी बातों से घर को चहकाए। लेकिन, कभी-कभी माता-पिता को महसूस होता है कि उनका बच्चा अपनी उम्र के अन्य बच्चों की तुलना में थोड़ा पीछे है। क्या वह सही समय पर नहीं पलट रहा है? क्या उसने अभी तक पहला शब्द नहीं बोला है? यह खामोशी और यह देरी किसी भी माता-पिता के दिल में गहरी चिंता पैदा कर सकती हैं।
याद रखें, आपका बच्चा एक अनूठा व्यक्तित्व है, लेकिन उसके विकास की राह में आने वाली बाधाओं को पहचानना आपकी जिम्मेदारी है। बच्चों के विकास में होने वाली किसी भी देरी को नजरअंदाज करना उसके भविष्य की संभावनाओं को सीमित कर सकता है। यह ब्लॉग आपकी उन सभी शंकाओं को दूर करने और आपको एक सही दिशा दिखाने के लिए तैयार किया गया है, ताकि आपका बच्चा अपनी पूरी क्षमता के साथ विकसित हो सके।
विकासात्मक देरी या समस्या का अर्थ है कि बच्चा अपनी उम्र के अनुसार वैसा व्यवहार नहीं कर रहा है, जैसे उसके उम्र के बच्चे कर रहे हैं। इन समस्याओं को चार भाग में बांटा गया है -
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और CDC के हालिया आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग 15% से 17% बच्चे किसी न किसी प्रकार की विकासात्मक देरी का सामना करते हैं। भारत में भी यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसका मुख्य कारण जागरूकता की कमी और स्क्रीनिंग में देरी है। विकास संबंधी समस्या का मतलब यह नहीं है कि बच्चा कभी नहीं सीख पाएगा, बल्कि इसका मतलब है कि उसे सीखने के लिए एक अलग तरीके और थोड़े अतिरिक्त सहारे की आवश्यकता है।
जब माता-पिता को पता चलता है कि विकास में देरी है, तो पहला सवाल होता है कि "ऐसा क्यों हुआ है?" इसके पीछे कई जैविक और पर्यावरणीय कारण हो सकते हैं जैसे कि -
विकास के संकेतों को समय पर पहचानना ही सबसे बड़ा इलाज है। यहां कुछ विशिष्ट क्षेत्रों के चेतावनी संकेत दिए गए हैं -
शिशु के पहले 12 महीने सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। शिशुओं में विकासात्मक देरी के संकेत तब स्पष्ट होते हैं जब -
शारीरिक विकास का सीधा संबंध हड्डियों और मांसपेशियों (Gross & Fine Motor Skills) से है। बच्चों के शारीरिक विकास में देरी तब मानी जाती है, जब बच्चा 18 महीने तक चलना शुरू न करे, हमेशा पंजों के बल चले, या उसके हाथ-पैर बहुत ज्यादा सख्त या एकदम ढीले महसूस हों।
क्या आपका बच्चा खिलौनों के साथ उद्देश्यपूर्ण तरीके से खेलता है? बच्चों के मानसिक विकास के लक्षण में कमी तब दिखती है, जब बच्चा साधारण पहेलियां हल न कर पाए, अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेल के नियम न समझ सके, या वस्तुओं को उनके नाम से पहचानने में असमर्थ हो।
आजकल 'स्क्रीन टाइम' (मोबाइल/टीवी) का बढ़ना स्पीच डिले के कारण में सबसे प्रमुख बन गया है। इसके अतिरिक्त, सुनने की अक्षमता, जीभ के नीचे का हिस्सा जुड़ा होना, या न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी इसका कारण होती हैं। यदि 2 साल का बच्चा कम से कम 50 शब्द नहीं बोल रहा है, तो यह चिंता का विषय है।
ऑटिज्म एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है। बच्चों में ऑटिज्म की स्थिति में निम्न लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं -
डॉक्टर या बाल रोग विशेषज्ञ विकास की जांच के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाते हैं -
इलाज का मुख्य उद्देश्य बच्चे की बाधाओं को कम करना और उसकी आत्मनिर्भरता बढ़ाना है। आधुनिक चिकित्सा में इसके कई विकल्प मौजूद हैं:
इंतजार करना हमेशा सही नहीं होता। यदि आपको नीचे दिए गए 'रेड फ्लैग्स' दिखें, तो तुरंत विशेषज्ञ से मिलें -
माता-पिता की सजगता ही बच्चे के लिए सबसे बड़ी औषधि है।
बच्चों के विकास की प्रक्रिया जटिल हो सकती है, लेकिन यह असंभव नहीं है। एक समाज और माता-पिता के रूप में, हमारा कर्तव्य है कि हम विकास में देरी को कलंक न मानें, बल्कि इसे एक चुनौती की तरह स्वीकार करें। सही समय पर किया गया उपचार न केवल बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य को सुधारता है, बल्कि उसके आत्मविश्वास को भी नई उड़ान देता है। यदि आपको अपने बच्चे में कोई भी असामान्य संकेत दिखता है, तो संकोच न करें, एक विशेषज्ञ की सलाह आपके बच्चे के जीवन में उजाला ला सकती है।
हां, विकास की एक रेंज होती है। लेकिन यदि बच्चा उस रेंज के अंतिम पड़ाव को भी पार कर चुका है और कौशल हासिल नहीं कर पाया, तो पेशेवर जांच जरूरी है।
मुख्य कारणों में ऑटिज्म, सुनने की समस्या, घर में भाषा का कम उपयोग, या न्यूरोलॉजिकल देरी शामिल हो सकती है।
नियमित अंतराल पर (9, 18, 24 और 30 महीने) स्क्रीनिंग कराना सबसे अच्छा है, भले ही कोई समस्या न दिख रही हो।
पोषण, प्यार, तनाव-मुक्त वातावरण और माता-पिता के साथ गुणवत्तापूर्ण समय (Quality Time) सबसे महत्वपूर्ण है।
निश्चित रूप से, आयोडीन, आयरन और विटामिन की गंभीर कमी शारीरिक और मानसिक विकास को पूरी तरह बाधित कर सकती है।
Written and Verified by:
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Dr. Ruchi Golash is a Consultant in Paediatrics Dept. at CMRI Hospital, Kolkata with over 28 years of experience. She specializes in childhood malignancies, paediatric blood and liver disorders, rheumatology, and nutrition including pre-enteral feeding.
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